श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र जैसे कृपालु प्राण इस बातको नहीं सोचता, कि राजाके शरीरको चलाऊँ और रंकके शरीरको गिराऊँ; जैसे जल यह भेद नहीं करता, कि गोकी तृषा बुझाऊँ और व्याघ्रके लिये विष बनकर उसका नाश करूँ, वैसेही सब प्राणियोंके विषयमें जिसकी एकसी मित्रता है, जो स्वयं कृपाकी मूर्ति है, और जो 'मैं' और 'मेरा'का व्यवहार नहीं जानता और जिसे सुखदुःखका भानभी नहीं होता" इत्यादि (ज्ञा. १२ १३)। अध्यात्मविद्यासे जो कुछ अंतमें प्राप्त करना है, वह यही है। उपर्युक्त विवेचनसे विदित होगा, कि सारे मोक्षधर्मके मूलभूत अध्यात्मज्ञानकी परंपरा हमारे यहाँ उपनिषदोंसे लगाकर ज्ञानेश्वर, तुकाराम, रामदास, कबीर- दास, सूरदास, तुलसीदास इत्यादि आधुनिक साधु-पुरुषोंतक किस प्रकार अव्याहत चली आ रही है। परंतु उपनिषदोंकेभी पहले यानी अत्यंत प्राचीन कालमेंभी हमारे देशमें इस ज्ञानका प्रादुर्भाव हुआ था; और तबसे क्रमक्रमसे आगे उपनिषदोंके विचारोंकी उन्नति होती चली गई है। यह बात पाठकोंको भलीभाँति समझा देनेके लिये ऋग्वेदका एक प्रसिद्ध सूक्त भाषांतरसहित यहाँ अंतमें दिया गया है, जो उपनिषदान्तर्गत ब्रह्मविद्याका आधारस्तंभ है। सृष्टिके अगम्य मूलतत्त्व और उससे विविध दृश्य सृष्टिकी उत्पत्तिके विषयमें जैसे विचार इस सूक्तमें प्रदर्शित किये गये हैं, वैसे प्रगल्भ, स्वतंत्र और मूल तककी खोज करनेवाले तत्त्वज्ञानके मार्मिक विचार अन्य किसीभी धर्मके मूल ग्रंथमें दिखाई नहीं देते। इतनाही नहीं, किंतु ऐसे अध्यात्मविचारोंसे परिपूर्ण और इतना प्राचीन लेखभी अबतक कहीं उपलब्ध नहीं हुआ है। इसलिये अनेक पश्चिमी पंडितोंने धार्मिक इतिहासकी दृष्टिसेभी इस सूक्तको अत्यंत महत्त्वपूर्ण जान कर आश्चर्यचकित हो अपनी अपनी भाषाओंमें इसका अनुवाद यह दिखलानेके लिये किया है, कि मनुष्यके मनकी प्रवृत्ति इस नाशवान् और नामरूपात्मक सृष्टिके परे नित्य और अचिंत्य ब्रह्मशक्तिकी ओर सहजही कैसे झुक जाया करती है। यह ऋग्वेदके दसवें मंडलका १२९ वाँ सूक्त है; और इसके प्रारंभिक शब्दोंसे इसे 'नासदीय सूक्त' कहते हैं। यही सूक्त तैत्तिरीय ब्राह्मणमें (तै. ब्रा. २. ८. ९) लिया गया है; और महाभारतांतर्गत नारायणीय या भागवत धर्ममें इसी सूक्तके आधारपर यह बात बतलाई गई है, कि भगवानकी इच्छासे पहले पहल सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई (महा. शां. ३४२. ८)। सर्वानुक्रमणिकाके अनुसार इस सूक्तका ऋषि परमेष्टि प्रजापति है; और देवता परमात्मा है; तथा इसमें त्रिष्टुप् वृत्तके यानी ग्यारह अक्षरोंके चार चरणोंकी सात ऋचाएँ हैं। 'सत्' और 'असत्' शब्दोंके दो दो अर्थ होते हैं। अतएव सृष्टिके मूल द्रव्यको 'सत्' कहनेके विषयमें उपनिषत्कारोंके जिस मतभेदका उल्लेख पहले हम इस प्रकरणमें कर चुके हैं, वही मतभेद ऋग्वेदमेंभी पाया जाता है। उदाहरणार्थ, इस मूलकारणके विषयमें कहीं तो यह कहा है, कि "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (ऋ. १. १६४. ४६) अथवा "एकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति" (ऋ. १०. ११४. ५)-