श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
DevanagariHindipublished956 पृष्ठ
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भक्तिमान्, (गीता १२. १३-२०), या त्रिगुणातीत (गीता १४. २२-२७) पुरुषोंके विषयमें भगवद्गीतामें जो वर्णन हैं, वेभी इसी अवस्थाके हैं। यह नहीं समझना चाहिये, कि जैसे सांख्यवादी 'त्रिगुणातीत' पदसे प्रकृति और पुरुष दोनोंको स्वतंत्र मानकर पुरुषके केवलपन या 'कैवल्य'को मोक्ष मानते हैं, वैसाही मोक्ष गीताकोभी संमत है। किंतु गीताका अभिप्राय है, कि अध्यात्मशास्त्रमें कही गई ब्राह्मी अवस्था - "अहं ब्रह्मास्मि" - मैंही ब्रह्म हूँ (बृ. १. ४. १०) - कभी भक्तिमार्गसे, तो कभी चित्तनिरोधरूप पातंजलयोगमार्गसे और कभी गुणागुण- विवेचनरूप सांख्यमार्गसेभी प्राप्त होती है। इन मार्गोंमेंसे अध्यात्मविचार केवल बुद्धिगम्य मार्ग है। इसलिये गीतामें कहा है, कि सामान्य मनुष्योंको परमेश्वर स्वरूपका ज्ञान होनेके लिये भक्तिही सुगम साधन है। इस साधनका विस्तारपूर्वक विचार हमने आगे चलकर तेरहवें प्रकरणमें किया है। साधन कुछभी हो; इतनी बात निर्विवाद है, कि ब्रह्मात्मैक्यका अर्थात् सच्चे परमेश्वरस्वरूपका ज्ञान होना, संसार सब प्राणियोंमें एकही आत्मा पहचानना और उसी भावके अनुसार बर्ताव करनाही अध्यात्मज्ञानकी परमावधि है; तथा यह अवस्था जिसे प्राप्त हो जाय, वही पुरुष धन्य तथा कृतकृत्य होता है। यह पहलेही बतला चुके हैं, कि केवल इंद्रियसुख पशुओं और मनुष्योंमें एकही समान होता है। इसलिये मनुष्यजन्मकी सार्थकता अथवा मनुष्यकी मनुष्यता ज्ञानप्राप्तिहीमें होती है। सब प्राणियोंके विषयमें काया-वाचा-मनसे सदैव ऐसीही साम्यबुद्धि रखकर अपने सब कर्मोंको करते रहनाही नित्यमुक्तावस्था, पूर्णयोग या सिद्धावस्था है। इस अवस्थाके जो वर्णन गीतामें हैं, उनमेंसे बारहवें अध्यायवाले भक्तिमान् पुरुषके वर्णनपर टीका करते हुए ज्ञानेश्वर* महाराजने अनेक दृष्टान्त देकर ब्रह्मभूत पुरुषकी साम्यावस्थाका अत्यंत मनोहर और चटकीला निरूपण किया है। और यह कहनेमें कोई हर्ज नहीं कि इस निरूपणमें गीताके चारों स्थानोंमें वर्णित ब्राह्मी अवस्थाका सार आ गया है; यथा :- "हे पार्थ ! जिसके हृदयमें विषमताका नामतक नहीं है, जो शत्रु और मित्र दोनोंको समानही मानता है; अथवा हे पांडव ! दीपकके समान जो इस बातका भेदभाव नहीं जानता, कि यह मेरा घर है, इसलिये यहाँ प्रकाश करूँ; और वह पराया घर है, इसलिये वहाँ अंधेरा करूँ। बीज बोनेवाले पर और पेड़ काटनेवालेपरभी वृक्ष जैसे समभावसे छाया करता है"; इत्यादि (ज्ञा. १२. १८)। इसी प्रकार "पृथिवीके समान वह इस बातका भेद बिलकुल नहीं जानता, कि उत्तमको ग्रहण करना चाहिये और अधमका त्याग करना चाहिये।
- ज्ञानेश्वर महाराजके 'ज्ञानेश्वरी' ग्रंथका हिंदी अनुवाद श्रीयुत रघुनाथ माधव भगाडे, बी. ए., सबजज्ज, नागपूरने किया है; और वह ग्रंथ उन्हींसे मिल सकता है।