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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

भक्तिमान्, (गीता १२. १३-२०), या त्रिगुणातीत (गीता १४. २२-२७) पुरुषोंके विषयमें भगवद्गीतामें जो वर्णन हैं, वेभी इसी अवस्थाके हैं। यह नहीं समझना चाहिये, कि जैसे सांख्यवादी 'त्रिगुणातीत' पदसे प्रकृति और पुरुष दोनोंको स्वतंत्र मानकर पुरुषके केवलपन या 'कैवल्य'को मोक्ष मानते हैं, वैसाही मोक्ष गीताकोभी संमत है। किंतु गीताका अभिप्राय है, कि अध्यात्मशास्त्रमें कही गई ब्राह्मी अवस्था - "अहं ब्रह्मास्मि" - मैंही ब्रह्म हूँ (बृ. १. ४. १०) - कभी भक्तिमार्गसे, तो कभी चित्तनिरोधरूप पातंजलयोगमार्गसे और कभी गुणागुण- विवेचनरूप सांख्यमार्गसेभी प्राप्त होती है। इन मार्गोंमेंसे अध्यात्मविचार केवल बुद्धिगम्य मार्ग है। इसलिये गीतामें कहा है, कि सामान्य मनुष्योंको परमेश्वर स्वरूपका ज्ञान होनेके लिये भक्तिही सुगम साधन है। इस साधनका विस्तारपूर्वक विचार हमने आगे चलकर तेरहवें प्रकरणमें किया है। साधन कुछभी हो; इतनी बात निर्विवाद है, कि ब्रह्मात्मैक्यका अर्थात् सच्चे परमेश्वरस्वरूपका ज्ञान होना, संसार सब प्राणियोंमें एकही आत्मा पहचानना और उसी भावके अनुसार बर्ताव करनाही अध्यात्मज्ञानकी परमावधि है; तथा यह अवस्था जिसे प्राप्त हो जाय, वही पुरुष धन्य तथा कृतकृत्य होता है। यह पहलेही बतला चुके हैं, कि केवल इंद्रियसुख पशुओं और मनुष्योंमें एकही समान होता है। इसलिये मनुष्यजन्मकी सार्थकता अथवा मनुष्यकी मनुष्यता ज्ञानप्राप्तिहीमें होती है। सब प्राणियोंके विषयमें काया-वाचा-मनसे सदैव ऐसीही साम्यबुद्धि रखकर अपने सब कर्मोंको करते रहनाही नित्यमुक्तावस्था, पूर्णयोग या सिद्धावस्था है। इस अवस्थाके जो वर्णन गीतामें हैं, उनमेंसे बारहवें अध्यायवाले भक्तिमान् पुरुषके वर्णनपर टीका करते हुए ज्ञानेश्वर* महाराजने अनेक दृष्टान्त देकर ब्रह्मभूत पुरुषकी साम्यावस्थाका अत्यंत मनोहर और चटकीला निरूपण किया है। और यह कहनेमें कोई हर्ज नहीं कि इस निरूपणमें गीताके चारों स्थानोंमें वर्णित ब्राह्मी अवस्थाका सार आ गया है; यथा :- "हे पार्थ ! जिसके हृदयमें विषमताका नामतक नहीं है, जो शत्रु और मित्र दोनोंको समानही मानता है; अथवा हे पांडव ! दीपकके समान जो इस बातका भेदभाव नहीं जानता, कि यह मेरा घर है, इसलिये यहाँ प्रकाश करूँ; और वह पराया घर है, इसलिये वहाँ अंधेरा करूँ। बीज बोनेवाले पर और पेड़ काटनेवालेपरभी वृक्ष जैसे समभावसे छाया करता है"; इत्यादि (ज्ञा. १२. १८)। इसी प्रकार "पृथिवीके समान वह इस बातका भेद बिलकुल नहीं जानता, कि उत्तमको ग्रहण करना चाहिये और अधमका त्याग करना चाहिये।

  • ज्ञानेश्वर महाराजके 'ज्ञानेश्वरी' ग्रंथका हिंदी अनुवाद श्रीयुत रघुनाथ माधव भगाडे, बी. ए., सबजज्ज, नागपूरने किया है; और वह ग्रंथ उन्हींसे मिल सकता है।

२५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र जैसे कृपालु प्राण इस बातको नहीं सोचता, कि राजाके शरीरको चलाऊँ और रंकके शरीरको गिराऊँ; जैसे जल यह भेद नहीं करता, कि गोकी तृषा बुझाऊँ और व्याघ्रके लिये विष बनकर उसका नाश करूँ, वैसेही सब प्राणियोंके विषयमें जिसकी एकसी मित्रता है, जो स्वयं कृपाकी मूर्ति है, और जो 'मैं' और 'मेरा'का व्यवहार नहीं जानता और जिसे सुखदुःखका भानभी नहीं होता" इत्यादि (ज्ञा. १२ १३)। अध्यात्मविद्यासे जो कुछ अंतमें प्राप्त करना है, वह यही है। उपर्युक्त विवेचनसे विदित होगा, कि सारे मोक्षधर्मके मूलभूत अध्यात्मज्ञानकी परंपरा हमारे यहाँ उपनिषदोंसे लगाकर ज्ञानेश्वर, तुकाराम, रामदास, कबीर- दास, सूरदास, तुलसीदास इत्यादि आधुनिक साधु-पुरुषोंतक किस प्रकार अव्याहत चली आ रही है। परंतु उपनिषदोंकेभी पहले यानी अत्यंत प्राचीन कालमेंभी हमारे देशमें इस ज्ञानका प्रादुर्भाव हुआ था; और तबसे क्रमक्रमसे आगे उपनिषदोंके विचारोंकी उन्नति होती चली गई है। यह बात पाठकोंको भलीभाँति समझा देनेके लिये ऋग्वेदका एक प्रसिद्ध सूक्त भाषांतरसहित यहाँ अंतमें दिया गया है, जो उपनिषदान्तर्गत ब्रह्मविद्याका आधारस्तंभ है। सृष्टिके अगम्य मूलतत्त्व और उससे विविध दृश्य सृष्टिकी उत्पत्तिके विषयमें जैसे विचार इस सूक्तमें प्रदर्शित किये गये हैं, वैसे प्रगल्भ, स्वतंत्र और मूल तककी खोज करनेवाले तत्त्वज्ञानके मार्मिक विचार अन्य किसीभी धर्मके मूल ग्रंथमें दिखाई नहीं देते। इतनाही नहीं, किंतु ऐसे अध्यात्मविचारोंसे परिपूर्ण और इतना प्राचीन लेखभी अबतक कहीं उपलब्ध नहीं हुआ है। इसलिये अनेक पश्चिमी पंडितोंने धार्मिक इतिहासकी दृष्टिसेभी इस सूक्तको अत्यंत महत्त्वपूर्ण जान कर आश्चर्यचकित हो अपनी अपनी भाषाओंमें इसका अनुवाद यह दिखलानेके लिये किया है, कि मनुष्यके मनकी प्रवृत्ति इस नाशवान् और नामरूपात्मक सृष्टिके परे नित्य और अचिंत्य ब्रह्मशक्तिकी ओर सहजही कैसे झुक जाया करती है। यह ऋग्वेदके दसवें मंडलका १२९ वाँ सूक्त है; और इसके प्रारंभिक शब्दोंसे इसे 'नासदीय सूक्त' कहते हैं। यही सूक्त तैत्तिरीय ब्राह्मणमें (तै. ब्रा. २. ८. ९) लिया गया है; और महाभारतांतर्गत नारायणीय या भागवत धर्ममें इसी सूक्तके आधारपर यह बात बतलाई गई है, कि भगवानकी इच्छासे पहले पहल सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई (महा. शां. ३४२. ८)। सर्वानुक्रमणिकाके अनुसार इस सूक्तका ऋषि परमेष्टि प्रजापति है; और देवता परमात्मा है; तथा इसमें त्रिष्टुप् वृत्तके यानी ग्यारह अक्षरोंके चार चरणोंकी सात ऋचाएँ हैं। 'सत्' और 'असत्' शब्दोंके दो दो अर्थ होते हैं। अतएव सृष्टिके मूल द्रव्यको 'सत्' कहनेके विषयमें उपनिषत्कारोंके जिस मतभेदका उल्लेख पहले हम इस प्रकरणमें कर चुके हैं, वही मतभेद ऋग्वेदमेंभी पाया जाता है। उदाहरणार्थ, इस मूलकारणके विषयमें कहीं तो यह कहा है, कि "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (ऋ. १. १६४. ४६) अथवा "एकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति" (ऋ. १०. ११४. ५)-

अध्यात्म २५३

वह एक और सत् यानी सदैव स्थिर रहनेवाला है; परंतु उसीको लोग अनेक नामोंसे पुकारते हैं। और कहीं कहीं इसके विरुद्ध यहभी कहा है, कि “ देवानां पूर्व्य युगेऽसतः सदजायत ” (ऋ. १०. ७२. ७) - देवताओंकेभी पहले असतसे अर्थात् अव्यक्तसे 'सत्' अर्थात् व्यक्त सृष्टि उत्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त, किसी-न- किसी एक दृश्य तत्त्वसे सृष्टिकी उत्पत्ति होनेके विषयमें ऋग्वेदहीमें भिन्न भिन्न अनेक वर्णन पाये जाते हैं। जैसे सृष्टिके आरंभमें मूल हिरण्यगर्भ था। अमृत और मृत्यु दोनों उसकीही छायाएं हैं; और आगे उसीसे सारी सृष्टि निर्मित हुई है (ऋ. १०. १२१. १, २)। पहले विराड्रूपी पुरुष था; और उससे यज्ञके द्वारा सारी सृष्टि उत्पन्न हुई (ऋ. १०. ९०)। पहले पानी (आप) था। उसमें प्रजापति उत्पन्न हुआ (ऋ. १०. ७२. ६; १०. ८२. ६)। ऋत और सत्य पहले उत्पन्न हुए, फिर रात्रि (अंधकार) और उसके बाद समुद्र (पानी), संवत्सर इत्यादि उत्पन्न हुए (ऋ. १०. १९०. १)। ऋग्वेदमें वर्णित इन्हीं मूल द्रव्योंका आगे अन्यान्य स्थानोंमें इस प्रकार उल्लेख किया गया है। जैसे :-(१) जलका, तैत्तिरीय ब्राह्मणमें “ आपो वा इदमग्रे सलिलमासीत् ” - यह सब पहले पतला पानी था (तै. ब्रा. १. १. ३. ५)। (२) असतका, तैत्तिरीय उपनिषदमें “ असद्वा इदमग्र आसीत् ” - यह पहले असत् था (तै. २. ७)। (३) सतका, छांदोग्यमें “ सदेव सौम्येदमग्र आसीत् ” - यह सब पहले सतही था (छां. ६. २)। अथवा (४) आकाशका, “आकाशः परायणम् ” - आकाशही सब बातोंका मूल है (छां. १. ९); (५) मृत्युका, बृहदारण्यकमें “नैवेह किंचनाग्र आसीन्मृत्यु- नैवेदमावृतमासीत् ” - पहले यह कुछभी न था, मृत्युसे सब आच्छादित था (बृह. १. २. १); और (६) तमका, मैत्र्युपनिषदमें “तमो वा इदमग्र आसीदेकम् ”

  • पहले यह सब अकेला तम (तमोगुणी, अंधकार) था - आगे उससे रज और सत्त्व हुआ (मै. ५. २) - अंतमें इन्हीं वेदवचनोंका अनुकरण करके मनुस्मृतिमें सृष्टिके आरंभका वर्णन इस प्रकार किया गया है :- आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ अर्थात् “ यह सब पहले तमसे यानी अंधकारसे व्याप्त था। भेदाभेद नहीं जाना जाता था इतना अगम्य और निद्रित था। फिर आगे इसमें अव्यक्त परमेश्वरने प्रवेश करके पहले पानी उत्पन्न किया ” (मनु. १. ५-८)। सृष्टिके आरंभके मूल द्रव्यके संबंधमें उक्त वर्णन या ऐसेही भिन्न भिन्न वर्णन नासदीय सूक्तके समयभी अवश्य प्रचलित रहे होंगे; और उस समयभी यही प्रश्न उपस्थित हुआ होगा, कि इनमेंसे कौन-सा मूलद्रव्य सत्य माना जावे ? अतएव उसके सत्यांशके विषयमें इस सूक्तके ऋषि यह कहते हैं, कि :-

२५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सूक्त अनुवाद नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं १. तब अर्थात् मूलारंभमें असत् नहीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् । था और सत्‌भी नहीं था ! अंतरिक्ष नहीं किमावरीवः कुह कस्य शर्म- था और उसके परेका आकाशभी न था । न्छम्भः किमासीद्गहनं गभीरम् ॥१॥ ( ऐसी अवस्थामें ) किसने ( किसपर ) आवरण डाला ? कहाँ ? किसके सुखके लिये ? अगाध और गहन जल ( भी ) कहाँ था ? * न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि २. तब मृत्यु अर्थात् मृत्युग्रस्त नाश- न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः । वान् दृश्य सृष्टि न थी, अतएव ( दूसरा ) आनीदवातं स्वधया तदेकम् । अमृत अर्थात् अविनाशी नित्य पदार्थ तस्माद्धान्यन्न परः किंचनास ॥२॥ ( यह भेद ) भी न था । ( इसी प्रकार ) रात्रि और दिनका भेद समझनेके लिये कोई साधन ( = प्रकेत ) न था। ( जो कुछ था ) वह अकेला एकही अपनी शक्ति ( स्वधा ) से वायुके बिना श्वोसोच्छ्वास लेता अर्थात् स्फूर्तिमान् होता रहा । इसके अतिरिक्त या इसके परे और कुछ भी न था। तम आसीत्तमसा गूढमग्रे- ३. जो ( यत् ) ऐसा कहा जाता है, प्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् । कि अंधकार था, आरंभमें यह सब अंध- तुच्छेनाभ्वपिहितं यदासीत् कारसे व्याप्त ( और ) भेदाभेदरहित तपसस्तन्महिनाऽजायतैकम् ॥३॥ जल था ( या ) आभु अर्थात् सर्वव्यापी ब्रह्म ( पहलेही ) तुच्छसे अर्थात् झूठी मायासे आच्छादित था, वह ( तत् ) मूलमें एक ( ब्रह्मही ) तपकी महिमासे ( आगे रूपांतरसे ) प्रकट हुआ था। †

  • ऋचा पहली – चौथे चरणमें 'आसीत् किम्' यह अन्वय करके हमने उक्त अर्थ दिया है; और उसका भावार्थ है, 'पानी तब नहीं था' ( तै. ब्रा. २. २. ९) । † ऋचा तीसरी – कुछ लोग इसके प्रथम तीन चरणोंको स्वतंत्र मानकर उनका ऐसा विधानात्मक अर्थ करते हैं, कि सृष्टिके आरंभमें "अंधकार, अंधकारसे व्याप्त पानी, या तुच्छसे आच्छादित आभु ( पोलापन ) था।" परंतु हमारे मतसे यह भूल है। क्योंकि पहली दो ऋचाओंमें जब कि ऐसी स्पष्ट उक्ति है, कि मूलारंभमें

अध्यात्म २५५ कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥ ४. इसके मनका जो रेत अर्थात् बीज प्रथमतः निकला, वही आरंभमें काम ( अर्थात् सृष्टि निर्माण करनेकी प्रवृत्ति या शक्ति ) हुआ । ज्ञाताओने अंतःकरणमें विचार करके बुद्धिसे निश्चित किया, कि ( यही ) असत्में अर्थात् मूल परब्रह्ममें सत्का का यानी विनाशी दृश्यसृष्टिका ( पहला ) संबंध है । तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषां अधः स्विदासीदुपरि स्विदासीत् । रेतोधा आसन् महिमान आसन् स्वधा अवस्तात् प्रयतिः परस्तात् ॥५॥ ५. ( यह ) रश्मि या किरण या धागा इनमें आड़ा फैल गया; और यदि कहें, कि यह नीचे था, तो यह ऊपरभी था। ( इनमेंसे कुछ ) रेतोधा अर्थात् बीजप्रद हुए; और ( बढ़कर ) बड़ेभी हुए । उन्हींकी स्वशक्ति इस ओर रही; और प्रयति अर्थात् प्रभाव उस ओर ( व्याप्त ) रहा । को अद्धा वेद क इह प्र वोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः । अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेना- थ को वेद यत आबभूव ॥६॥ ६. ( सत्का ) यह विसर्ग यानी पसारा किससे या कहाँसे आया ? यह ( इससे अधिक ) प्र यानी विस्तारपूर्वक यहाँ कौन कहेगा ? इसे कौन निश्चया- त्मक जानता है ? देवभी इस ( सत् सृष्टिके ) विसर्गके पश्चात् हुए हैं। फिर वह जहांसे ( उत्पन्न ) हुई, उसे कौन जानेगा ? कुछभी न था; तब उसके विपरीत इसी सूक्तमें यह कहा जाना संभव नहीं, कि मूलारंभमें अंधकार या पानी था । अच्छा; यदि वैसा अर्थ करेंगे; तो तीसरे चरणके यत् शब्दको निरर्थक मानना होगा । अतएव तीसरे चरणके 'यत्'का चौथे चरणके 'तत्'से संबंध लगाकर, ( जैसा कि हमने ऊपर किया है ) अर्थ करना आवश्यक है। “ मूलारंभमें पानी वगैरह पदार्थ थे " ऐसा कहनेवालोंको उत्तर देनेके लिये इस सूक्तमें यह ऋचा आई है। और इसमें ऋषिका उद्देश्य यह बतलानेका है, कि तुम्हारे कथनानुसार मूलमें तम, पानी इत्यादि पदार्थ न थे; किंतु एक ब्रह्मकाही आगे यह सब विस्तार हुआ है। 'तुच्छ' और 'आभु' ये शब्द एक दूसरेके प्रतियोगी हैं। अतएव तुच्छ के विपरीत 'आभु' शब्दका अर्थ बड़ा या समर्थ होता है; और ऋग्वेदमें जहाँ अन्य दो स्थानोंमें इस शब्दका प्रयोग हुआ है, वहाँ सायणाचार्यनेभी

२५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न दधे। यो अस्याध्यक्षःपरमे व्योमन् सो अंग वेद यदि वा न वेद ॥७॥ ७. (सत्का) यह विसर्ग अर्थात् फैलाव जहाँसे हुआ अथवा निर्मित किया गया या नहीं किया गया-उसे परम आकाशमें रहनेवाला इस सृष्टिका जो अध्यक्ष (हिरण्यगर्भ) है, वही जानता होगा; या न भी जानता हो ! (कौन कह सके ?) सारे वेदान्तशास्त्रका रहस्य यही है, कि नेत्रोंको या सामान्यतः सब इंद्रियोंको गोचर होनेवाले विकारी और विनाशी नामरूपात्मक अनेक दृश्योंके फंदेमें फँस न रह कर ज्ञानदृष्टिसे यह जानना चाहिये, कि इस दृश्यके परे कोई न कोई एक और अमृत तत्त्व है। इस मक्खनके गोलेकोही पानेके लिये उक्त सूक्तके ऋषिकी बुद्धि एकदम दौड़ पड़ी है, इससे यह स्पष्ट दीख पड़ता है, कि उसका अंतर्ज्ञान कितना तीव्र था। मूलारंभमें अर्थात् सृष्टिके सारे पदार्थोंके उत्पन्न होनेके पहले जो कुछ था, वह सत् था या असत्; मृत्यु था या अमर; आकाश था या जल; प्रकाश था या अंधकार ? - ऐसे अनेक प्रश्न करनेवालोंके साथ वादविवाद न करते हुए, उक्त ऋषि सबके आगे दौड़ कर यह कहता है, कि सत् और असत्, मर्त्य और अमर, अंधकार और प्रकाश, आच्छादन करनेवाला और आच्छादित, सुख देनेवाला और उसका अनुभव करनेवाला द्वैतकी यह परस्परसापेक्ष भाषा दृश्य सृष्टिकी उत्पत्तिके अनंतरकी है; अतएव सृष्टिके इन द्वंद्वोंके उत्पन्न होनेके पूर्व अर्थात् जब "एक और दूसरा" यह भेदही न था, तब कौन किसे आच्छादित करता ? इसलिये आरंभहीमें इस सूक्तका ऋषि निर्भय होकर यह कहता है, कि मूलारंभके एकरूप द्रव्यको सत् या असत्, आकाश या जल, प्रकाश या अंधकार, अमृत या मृत्यु, इत्यादि कोईभी परस्पर-सापेक्ष नाम देना उचित नहीं। जो कुछ था, वह इन सब पदार्थोंसे विलक्षण था और वह अकेलाही चारों ओर अपनी अपरंपार शक्तिसे स्फूर्तिमान् था। उसके साथ या उसे आच्छादित करनेवाला अन्य कुछभी न था। दूसरी ऋचामें 'आनीत्' क्रियापदके 'अन्' धातुका अर्थ है श्वासोच्छ्वास लेना या स्फुरण होना; और 'प्राण' शब्दभी उसी धातुसे बना है। परंतु जो न सत् है और न असत्, उसके विषयमें कौन कह सकता है, कि वह सजीव प्राणियोंके समान श्वासोच्छ्वास लेता था ? और श्वासोच्छ्वासके लिये वहाँ वायुही कहाँ है ? अतएव उसका यही अर्थ किया है (ऋ. १०. २७. १, ४)। पंचदशीमें (चित्र. १२९, १३०) तुच्छ शब्दका उपयोग मायाके लिये किया गया है (नृसिं. उत्त. ९)। अर्थात् 'आभु'का अर्थ पोलापन न होकर 'परब्रह्म' ही होता है। ("सर्वं आः इदम्" -यहाँ आः (अ + अस्) अस् धातुका भूतकाल है; और इसका अर्थ 'आसीत्' होता है।

अध्यात्म २५७ 'आनीत्' पदके साथही - 'अवातं' = विना वायुके, और 'स्वधया' = स्वयं अपनीही, महिमासे - इन दोनों पदोंको जोड़कर "सृष्टिका मूल तत्त्व जड़ नहीं था" यह अद्वैता- वस्थाका अर्थ द्वैतकी भाषा में बड़ी युक्तिसे इस प्रकार बतलाया है, कि "वह अकेला बिना वायुके केवल अपनी ही शक्तिसे श्वासोच्छ्वास लेता या स्फूर्तिमान् होता था!" इसमें बाह्य दृष्टिसे जो विरोध दिखाई देता है, वह द्वैती भाषाकी अपूर्णतासे उत्पन्न हुआ है। 'नेति नेति' 'एकमेवाद्वितीयम्' या "स्वे महिम्नि प्रतिष्ठितः" (छां. ७. २४. १)। - अपनीही महिमासे अर्थात् अन्य किसीकी अपेक्षा न रखते हुए अकेलाही रहनेवाला - इत्यादि परब्रह्मके जो वर्णन उपनिषदोंमें पाये जाते हैं, वेभी उपरोक्त अर्थकेही द्योतक हैं। सारी सृष्टिके मूलारंभमें चारों ओर जिस एक अनिर्वाच्य तत्त्वके स्फुरण होनेकी बात इस सूक्तमें कही गई है, वही तत्त्व सभी दृश्य सृष्टिका प्रलय होनेपरभी निःसंदेह शेष रहेगा। अतएव गीतामें इसी परब्रह्मका कुछ पर्यायसे इस प्रकार वर्णन किया है, कि "सब पदार्थोंका नाश होनेपरभी जिसका नाश नहीं होता" (गीता ८. २०) और आगे इसी सूक्तके अनुसार स्पष्ट कहा है, कि "वह सत्भी नहीं है; और असत्भी नहीं है" (गीता १३. १२)। परंतु प्रश्न यह है, कि जब सृष्टिके मूलारंभमें निर्गुण ब्रह्मके सिवा और कुछभी न था; तो फिर वेदोंमें जो ऐसे वर्णन पाये जाते हैं, कि "आरंभमें पानी, अंधकार, या आभु और तुच्छकी जोड़ी थी" उनकी क्या व्यवस्था होगी? अतएव तीसरी ऋचामें कविने कहा है, कि - सृष्टिके आरंभमें अंधकार था या अंधकारसे आच्छादित पानी था, या आभु (ब्रह्म) और उसको आच्छादित करनेवाली माया (तुच्छ), ये दोनों पहलेसेही थे - इत्यादि) जितने वर्णन हैं वे सब उस समयके हैं, जब कि अकेले मूल परब्रह्मके तपमहात्म्यसे उसका विविध रूपोंसे फैलाव हो गया था। ये वर्णन मूलारंभकी स्थितिके नहीं हैं। इस ऋचाके शब्दसे तप मूल ब्रह्मकी ज्ञानमय विलक्षण शक्ति विवक्षित है; और उसीका वर्णन चौथी ऋचामें किया गया है (मुं. १. १. ९)। "एतावान् अस्य महिमाऽतो ज्यायांश्च पूरुषः" (ऋ. १०. ९०. ३)। इस न्यायसे, सारी सृष्टिही जिसकी महिमा कहलाई, उस मूल द्रव्यके विषयमें यह कहना आवश्यक नहीं है, कि वह इन सबके परे, सबसे श्रेष्ठ और भिन्न है। परंतु दृश्य वस्तु और द्रष्टा, भोक्ता और भोग्य, आच्छादन करनेवाला और आच्छाद्य, अंधकार और प्रकाश, मर्त्य और अमर इत्यादि सारे द्वैतोंको इस प्रकार अलग कर यद्यपि यह निश्चय किया गया, कि केवल एक निर्मल चिद्रूपी विलक्षण परब्रह्मही मूलारंभमें था; तथापि जब यह बतलानेका समय आया, कि इस अनिर्वाच्य, निर्गुण, अकेले एक तत्त्वसे आकाश, जल इत्यादि द्वंद्वात्मक विनाशी सगुण नामरूपात्मक विविध सृष्टि या इस सृष्टिकी मूलभूत त्रिगुणात्मक प्रकृति कैसे उत्पन्न हुई, तब तो प्रस्तुत ऋषिनेभी मन, काम, असत् और सत् जैसी द्वैती भाषाकाही उपयोग किया है और अंतमें गी. र. १७

२५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र स्पष्ट कह दिया है, कि यह प्रश्न मानवी बुद्धिकी पहुँचसे बाहर है। चौथी ऋचामें मूल ब्रह्मकोही ‘असत्’ कहा है; परंतु उसका अर्थ ‘कुछ नहीं’ यह नहीं मान सकते । क्योंकि दूसरीही ऋचामें स्पष्ट कहा है, कि ‘वह है’। न केवल इसी सूक्तमें, किंतु अन्यत्रभी व्यावहारिक भाषाको स्वीकार करकेही ऋग्वेद और वाजसनेयी संहिताओंमें गहन विषयोंका विचार निम्न प्रश्नोंके द्वारा किया गया है। (ऋ. १०. ३१. ७; १०. ८१. ४; वाज. सं. १७. २०) – जैसे दृश्य सृष्टिको यज्ञकी उपमा देकर प्रश्न किया है, कि इस यज्ञके संपन्न करनेके लिये आवश्यक घृत, समिधा इत्यादि सामग्री प्रथम कहाँसे आई ? (ऋ. १०. १३०. ३) अथवा घरका दृष्टान्त लेकर प्रश्न किया है कि मूल एक निर्गुणसे, नेत्रोंको प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाली आकाश- पृथ्वीकी इस भव्य इमारतको बनानेके लिये लकड़ी (मूल प्रकृति) कैसे मिली ? – “किं स्विद्वनं क उ स वृक्ष आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः ।” इन प्रश्नोंका उत्तर उपर्युक्त सूक्तकी चौथी और पाँचवीं ऋचामें जो कुछ कहा गया, है उससे अधिक दिया जाना संभव नहीं है (वाज. सं. ३३. ७४); और वह उत्तर यही है, कि उस अनिर्वाच्य अकेले ब्रह्महीके मनमें सृष्टि निर्माण करनेका ‘काम’-रूपी तत्त्व किसी-न-किसी तरह उत्पन्न हुआ; और वस्त्रके धागोंके समान या सूर्य- प्रकाशके समान उसीकी शाखाएँ तुरंत नीचे, ऊपर और चहुँ ओर फैल गईं। तथा सत्‌का सारा फैलाव हो गया – अर्थात् आकाश-पृथ्वीकी यह भव्य इमारत बन गई। उपनिषदोंमें इस सूक्तके अर्थको इस प्रकारही प्रकट किया गया है, कि “सोऽकामयत। बहु स्यां प्रजायेयेति ।” (तै. २. ६; छां. ६. २. ३) – उस पर- ब्रह्मकोही अनेकरूप होनेकी इच्छा हुई (बृ. १. ४); और अथर्व वेदमेंभी ऐसा वर्णन है, कि इस सारी दृश्य सृष्टिके मूलभूत द्रव्यसेही पहले पहल ‘काम’ हुआ (अथर्व. ९. २. १९)। परंतु इस सूक्तकी विशेषता यह है, कि निर्गुणसे सगुणकी असत्‌से सत्‌की, निर्द्वंद्वसे द्वंद्वकी अथवा असंगसे संगकी उत्पत्तिका प्रश्न मानवी बुद्धिके लिये अगम्य समझकर सांख्योंके समान केवल तर्कवश हो मूल प्रकृतिकोही या उसके सदृश किसी दूसरे तत्त्वको स्वयंभू और स्वतंत्र नहीं माना है। किंतु इस सूक्तका ऋषि कहता है, कि जो बात समझमें नहीं आती, उसके लिये साफ़ साफ़ कह दो, कि यह समझमें नहीं आती। परंतु उसके लिये शुद्ध बुद्धिसे और आत्मप्रतीतिसे निश्चित किये गये अनिर्वाच्य ब्रह्मकी योग्यताको दृश्य सृष्टिरूप मायाकी योग्यताके बराबर मत समझो; और न परब्रह्मके विषयमें अपने अद्वैत- भावकोही छोड़ो। इसके सिवा यहभी सोचना चाहिये कि, यद्यपि प्रकृतिको एक भिन्न त्रिगुणात्मक स्वतंत्र पदार्थ मानभी लिया जावे; तथापि इस प्रश्नका उत्तर तो दिया नहीं जा सकता, कि उसमें सृष्टिको निर्माण करनेके लिये प्रथमतः बुद्धि (महान्) या अहंकार कैसे उत्पन्न हुआ ? और, जब कि यह दोष कभी टलही नहीं सकता है, तो फिर प्रकृतिको स्वतंत्र मान लेनेमें क्या लाभ है ?

अध्यात्म २४९ सिर्फ़ इतना कहो, कि यह बात समझमें नहीं आती. कि मूल ब्रह्मसे प्रकृति अर्थात् सत् कैसे निर्मित हुआ। इसके लिये प्रकृतिको स्वतंत्र पण लेनेकी कुछ आवश्यकता नहीं है। मनुष्यकी बुद्धिकी कौन कहे, परंतु देवताओंकी दिव्य बुद्धिसेभी मत्की उत्पत्तिका रहस्य समझमें आ जाना संभव नहीं। क्योंकि देवताभी दृश्य सृष्टिके आरंभ होनेपर उत्पन्न हुए हैं; उन्हें पिछला हाल क्या मालूम ? ( गीता १०. २.)। परंतु ऋग्वेदमेंही कहा है, कि हिरण्यगर्भ देवताओंसेभी बहुत प्राचीन और श्रेष्ठ है और आरंभमें वह अकेलाही “ भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ” ( ऋ. १०. १२१. १ ) – और सारी सृष्टिका 'पति' अर्थात् राजा या अध्यक्ष था। फिर उसे यह बात क्योंकर मालूम न होगी ? और यदि उसे मालूम होगी; तो फिर कोई पूछ सकता है, कि इस बातको दुर्बोध या अगम्य क्यों कहते हो ? अतएव उस सूक्तके ऋषिने पहले तो उक्त प्रश्नका यह औपचारिक उत्तर दिया है, कि “ हाँ, वह इस बातको जानता होगा।” परंतु अपनी बुद्धिसे ब्रह्मदेव- केभी ज्ञान-सागरकी थाह लेनेवाले इस ऋषिने आश्चर्यसे साशंक हो अंतमें तुरंतही कह दिया है, कि “ अथवा न भी जानता हो ! कौन कह सकता है ? क्योंकि वहभी सत्‌हीकी श्रेणीमें है। इसलिये 'परम' कहलानेपरभी 'आकाश' हीमें रहनेवाले जगतके इस अध्यक्षको सत्, असत्, आकाश और जलकेभी पूर्वकी बातोंका ज्ञान निश्चित रूपसे कैसे हो सकता है ?” परंतु यद्यपि यह बात समझमें नहीं आती, कि एक 'असत्' अर्थात् अव्यक्त और निर्गुण द्रव्यहीके साथ विविध नामरूपात्मक सत्‌का अर्थात् मूल प्रकृतिका संबंध कैसे हो गया ? तथापि मूल ब्रह्मके एकत्वके विषयमें ऋषिने अपने अद्वैत भावको डिगने नहीं दिया है। यह इस बातका एक उत्तम उदाहरण है, कि सात्त्विक श्रद्धा और निर्मल प्रतिभाके बलपर मनुष्यकी बुद्धि अचिंत्य वस्तुओंके सघन वनमें सिंहके समान निर्भय होकर कैसे संचार किया करती है और वहाँकी अतर्क्य बातोंका यथाशक्ति कैसे निश्चय किया करती है। यह सच- मुचही आश्चर्य तथा गौरवकी बात है, कि ऐसा सूक्त ऋग्वेदमें पाया जाता है ! हमारे देशमें इस सूक्तकेही विषयका आगे ब्राह्मणोंमें ( तैत्ति. ब्रा. २. ८. ९), उपनिषदों और अनंतरके वेदान्तशास्त्रके ग्रंथोंमें सूक्ष्म रीतिसे विवेचन किया गया है; और पश्चिमी देशोंमेंभी अर्वाचीन कालके कांट इत्यादि तत्त्वज्ञानियोंनेभी उसीका अत्यंत सूक्ष्म परीक्षण किया है। परंतु स्मरण रहे, कि उक्त सूक्तमें इस ऋषिकी पवित्र बुद्धिमें जिन परम सिद्धान्तकी स्फूर्ति हुई है, वेही सिद्धान्त आगे प्रतिपक्षि- योंको विवर्त-वादके समान उचित उत्तर देकर औरभी दृढ, स्पष्ट या तर्कदृष्टिसे निःसंदेह किये गये हैं। इसके परे अभीतक न कोई बढ़ा है और न बढ़नेकी विशेष आशाही की जा सकती है । अध्यात्म-प्रकरण समाप्त हुआ। अब आगे चलनेके पहले 'केसरी'की चालके अनुसार उस मार्गका कुछ निरीक्षण हो जाना चाहिये, कि जो यहाँतक चल

आये हैं। कारण यह है, कि यदि इस प्रकार सिंहावलोकन न किया जावे, तो विषया- नुसंधानके चूक जानेसे संभव है, कि और किसी अन्य मार्गमें संचार होने लगे। ग्रंथारंभमें पाठकोंका विषयमें प्रवेश कराके कर्मजिज्ञासाका संक्षिप्त स्वरूप बतलाया है; और तीसरे प्रकरणमें यह दिखलाया है, कि कर्मयोगशास्त्रही गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है; अनंतर चौथें, पाँचवें और छठे प्रकरणमें सुखदुःख-विवेकपूर्वक यह बतलाया है, कि कर्मयोगशास्त्रकी आधिभौतिक उपपत्ति एकदेशीय तथा अपूर्ण है; और आधिदैविक उपपत्ति लँगड़ी है। फिर, कर्मयोगकी आध्यात्मिक उपपत्ति बतलानेके पहले - यह जाननेके लिये, कि आत्मा किसे कहते हैं - छठे प्रकरणमेंही पहले - क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार और आगे सातवें तथा आठवें प्रकरणमें सांख्यशास्त्रां- तर्गत द्वैतके अनुसार क्षर-अक्षर विचार किया गया है। और फिर इस प्रकरणमें, इस विषयका निरूपण किया गया है, कि आत्माका स्वरूप क्या है ? तथा पिंड और ब्रह्मांडमें दोनों ओर एकही अमृत और निर्गुण आत्मतत्त्व किस प्रकार ओत- प्रोत और निरंतर व्याप्त है। इसी प्रकार यहभी निश्चित किया गया है, कि ऐसा समबुद्धि-योग प्राप्त करके - कि सब प्राणियोंमें एकही आत्मा है - और उसे सदैव जागृत रखनाही आत्मज्ञानकी और आत्मसुखकी पराकाष्ठा है। और फिर यह बतलाया गया है, कि अपनी बुद्धिको इस प्रकार शुद्ध आत्मनिष्ठ अवस्थामें पहुँचा देनेमेंही मनुष्यका मनुष्यत्व अर्थात् नर-देहकी सार्थकता या मनुष्यका परम पुरुषार्थ है। इस प्रकार मनुष्यजातिके आध्यात्मिक परम साध्यका निर्णय हो जानेपर कर्मयोगशास्त्रके इस मुख्य प्रश्नकाभी निर्णय आप-ही-आप हो जाता है, कि संसारमें हमें प्रतिदिन जो व्यवहार करने पड़ते हैं, वे किस नीतिसे किये जावें ? अथवा जिस शुद्ध बुद्धिसे उन सांसारिक व्यवहारोंको करना चाहिये, उसका यथार्थ स्वरूप क्या है ? क्योंकि अब यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि ये सारे व्यवहार उसीसे किये जाने चाहिये, जिससे कि वे परिणाममें ब्रह्मात्मैक्यरूप समबुद्धिके पोषक या अविरोधी हों। भगवद्गीतामें कर्मयोगके इसी आध्यात्मिक तत्त्वका उपदेश अर्जुनको किया गया है। परंतु कर्मयोगका प्रतिपादन केवल इतनेहीसे पूरा नहीं होता। क्योंकि कुछ लोगोंका कहना है, कि नामरूपात्मक सृष्टिके व्यवहार आत्म- ज्ञानके विरुद्ध हैं, अतएव ज्ञानी पुरुष उनको छोड़ दें। और यदि यही बात सत्य हो, तो संसारके सारे व्यवहार त्याज्य समझें जायेंगे; और फिर कर्म-अकर्मशास्त्रभी निरर्थक हो जावेगा ! अतएव इस विषयका निर्णय करनेके लिये कर्मयोगशास्त्रमें ऐसे प्रश्नोंकाभी विचार अवश्य करना पड़ता है, कि कर्मके नियम कौनसे हैं ? और उनका परिणाम क्या होता है ? अथवा बुद्धिकी शुद्धता होनेपरभी व्यवहार अर्थात् कर्म क्यों करना चाहिये ? भगवद्गीतामें ऐसा विचार कियाभी गया है। संन्यास-मार्गवाले लोगोंको इन प्रश्नोंका कुछभी महत्त्व नहीं जान पड़ता; अतएव ज्योंही भगवद्गीताका वेदान्त या भक्तिका निरूपण समाप्त हुआ, त्योंही प्रायः वे

अध्यात्म २६१ लोग अपनी पोथी समेटने लग जाते हैं। परंतु ऐसा करना, हमारे मतसे, गीताके मुख्य उद्देश्यकी ओरही दुर्लक्ष करना है। अतएव अब आगे क्रमसे इस बातका विचार किया जायगा, कि भगवद्गीतामें उपर्युक्त प्रश्नोंके क्या उत्तर दिये गये हैं।

दसवाँ प्रकरण कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते । *

  • महाभारत, शांति. २४०. ७ यद्यपि यह सिद्धान्त अंतमें सच है, कि इस संसारमें जो कुछ है, वह परब्रह्मही है; परब्रह्मको छोड़कर अन्य कुछ नहीं है; तथापि मनुष्यकी इंद्रियोंको गोचर होनेवाली दृश्य सृष्टिके पदार्थोंका अध्यात्मशास्त्रकी चलनीसे जब हम संशोधन करने लगते हैं, तब उनके नित्य-अनित्यरूपी दो विभाग या समूह हो जाते हैं। एक तो उन पदार्थोंका नामरूपात्मक दृश्य है, जो इंद्रियोंको प्रत्यक्ष दीख पड़ता है; परंतु हमेशा बदलनेवाला होनेके कारण अनित्य है। और दूसरा परमात्म-तत्त्व है, जो नाम रूपोंसे आच्छादित होनेके कारण अदृश्य, परंतु नित्य है। यह सच है, कि रसायन शास्त्रमें जिस प्रकार सब पदार्थोंका पृथक्करण करके उनके घटक- द्रव्य अलग अलग निकाल लिये जाते हैं, उसी प्रकार ये दो विभाग आँखोंके सामने पृथक् पृथक् नहीं रखे जा सकते; परंतु ज्ञानदृष्टिसे उन दोनोंको अलग करके शास्त्रीय उपपादनके सुभीतेके लिये उनको क्रमशः 'ब्रह्म' और 'माया' तथा कभी कभी 'ब्रह्मसृष्टि' और 'मायासृष्टि' इस प्रकार नाम दिये जाते हैं। तथापि स्मरण रहे, कि ब्रह्म मूलसेही नित्य और सत्य है। इस कारण उसके साथ सृष्टि शब्द ऐसे अवसरपर अनुप्रासार्थ लगा रहता है; और 'ब्रह्मसृष्टि' शब्दसे यह मतलब नहीं है, कि ब्रह्मको किसीने उत्पन्न किया है। इन दो सृष्टियोंमेंसे दिक्काल आदि नाम-रूपोंसे अमर्यादित, अनादि, नित्य, अविनाशी, अमृत, स्वतंत्र और सारी दृश्य सृष्टिके लिये आधारभूत होकर उसके भीतर रहनेवाली ब्रह्म-सृष्टिमें ज्ञानचक्षुसे संचार करके आत्माके शुद्ध स्वरूप अथवा अपने परम साध्यका विचार पिछले प्रकरणमें किया गया। और सच पूछिये तो शुद्ध अध्यात्मशास्त्र वहीं समाप्त हो गया। परंतु, मनुष्यका आत्मा यद्यपि आदिमें ब्रह्म-सृष्टिका है, तथापि दृश्य सृष्टिकी अन्य वस्तुओंकी तरह वहभी नाम-रूपात्मक देहेंद्रियोंसे आच्छादित है; और ये देहेंद्रियाँ आदिक नाम-रूप विनाशी हैं। इसलिये प्रत्येक मनुष्यकी यह स्वाभाविक इच्छा होती है, कि इनसे मुक्त होकर अमृतत्व कैसे प्राप्त करूँ? और, इस इच्छाकी पूर्तिके लिये मनुष्यको व्यवहारमें कैसे चलना चाहिये ? - कर्मयोग- शास्त्रके इस विषयका विचार करनेके लिये, कर्मके कायदोंसे बँधी हुई अनित्य
  • "कर्मसे प्राणी बाँधा जाता है; और विद्यासे उसका छुटकारा हो जाता है।"

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २६३ माया-सृष्टिके द्वैती क्षेत्रमेंही अब हमें उतरना चाहिये। पिंड और ब्रह्मांड, दोनोंके मूलमें यदि एकही नित्य और स्वतंत्र आत्मा है, तो अब सहजही प्रश्न उत्पन्न होता है, कि पिंडके आत्माको ब्रह्मांडके आत्माकी पहचान हो जानेमें कौन-सी अड़चन रहती है ? और वह दूर कैसे हो ? इन प्रश्नोंको हल करनेके लिये नामरूपोंका विवेचन करना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि वेदान्तकी दृष्टिसे सब पदार्थोंके दो वर्ग होते हैं : एक आत्मा अथवा परमात्मा; और दूसरा उसके ऊपरका नाम- रूपोंका आवरण। इसलिये नामरूपात्मक आवरणके सिवा अब अन्य कुछभी शेष नहीं रहता। वेदान्तशास्त्रका मत है, कि नामरूपोंका यह आवरण किसी जगह घना, तो किसी जगह विरल होनेके कारण दृश्य सृष्टिके पदार्थोंमें सचेतन और अचेतन; तथा सचेतनमेंभी पशु, पक्षी, मनुष्य, देव, गंधर्व और राक्षस इत्यादि भेद हो जाते हैं। यह नहीं, कि आत्मरूपी ब्रह्म किसी स्थानमें न हो - वह सभी जगह है - वह पत्थरमें है और मनुष्यमेंभी है। परंतु दीपकके एक होनेपरभी किसी लोहेके बक्समें अथवा न्यूनाधिक स्वच्छ काँचकी लालटेनमें उसके रखनेसे जिस प्रकार उसके प्रकाशमें अंतर पड़ता है, उसी प्रकार आत्मतत्त्वके सर्वत्र एकही होनेपरभी उसके ऊपरके कोश - अर्थात् नामरूपात्मक आवरणके तारतम्य भेदसे - अचेतन और सचेतन जैसे भेद हो जाया करते हैं। और तो क्या ? यही कारण है, कि सचेतनमें मनुष्यों और पशुओंमें ज्ञानसंपादन करनेकी एक समानही सामर्थ्य क्यों नहीं होती। आत्मा सर्वत्र एकही है सही; परंतु वह मूलमेंही निर्गुण और उदासीन होनेके कारण मन, बुद्धि इत्यादि नाम-रूपात्मक साधनोंके बिना स्वयं कुछभी नहीं कर सकता; और वे साधन मनुष्य-योनिको छोड़ अन्य किसीभी योनिमें उसे पूर्णतया प्राप्त नहीं होते। इसलिये मनुष्य-जन्म सबसे श्रेष्ठ कहा गया है। इस श्रेष्ठ जन्ममें आनेपर आत्माके नामरूपात्मक आवरणके स्थूल और सूक्ष्म, दो भेद होते हैं। इनमेंसे स्थूल आवरण मनुष्यकी स्थूल देहही है, कि जो शुक्र, शोणित आदिसे बनी है। इस शुक्रसे आगे चलकर स्नायु, अस्थि और मज्जा; तथा शोणित अर्थात् रक्तसे त्वचा, मांस और केश उत्पन्न होते हैं - ऐसा समझकर, इन सबको वेदान्ती 'अन्नमय कोश' कहते हैं। इस स्थूल कोशको छोड़कर जब हम यह देखने लगते हैं, कि इसके अंदर क्या है ? तब क्रमशः वायुरूपी प्राण अर्थात् 'प्राणमय कोश', मन अर्थात् 'मनोमय कोश', बुद्धि अर्थात् 'ज्ञानमय कोश', और अंतमें 'आनंदमय कोश' मिलता है। आत्मा उससेभी परे है। इसलिये तैत्तिरीयोपनिषदमें अन्नमय कोशसे आगे बढ़ते बढ़ते अंतमें आनंदमय कोश बतला- कर वरुणने भृगुको आत्म-स्वरूपकी पहचान करा दी है (तै. २. १-५; ३. २-६)। इन सब कोशोंमेंसे स्थूलदेहका कोश छोड़ बाकी रहे हुए प्राणादि कोशों, सूक्ष्म इंद्रियों और पंचतन्मात्राओंको वेदान्ती 'लिंग' अथवा 'सूक्ष्म' शरीर कहते हैं। वे लोग, "एकही आत्माको भिन्न भिन्न योनियोंमें जन्म कैसे प्राप्त होता है ?" -

२६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इसकी उपपत्ति, सांख्यशास्त्रकी तरह बुद्धिके अनेक 'भाव' मानकर नहीं लगाते; किंतु इस विषयमें उनका यह सिद्धान्त है, कि यह सब कर्मविपाकका अथवा कर्मके फलोंका परिणाम है। गीतामें, वेदान्तसूत्रोंमें और उपनिषदोंमें स्पष्ट कहा है, कि यह कर्म लिंग-शरीरके आश्रयसे अर्थात् आधारसे रहा करता है; और जब आत्मा स्थूल देह छोड़कर जाने लगता है, तब यह कर्मभी लिंग-शरीरद्वारा उसके साथ जाकर उसको बार बार भिन्न भिन्न जन्म लेनेके लिये बाध्य करता है। इसलिये नाम-रूपात्मक जन्ममरणके चक्करसे मुक्त होकर नित्य परब्रह्म-रूपी होनेमें अथवा मोक्षकी प्राप्तिमें पिंडके आत्माको जो अड़चन हुआ करती है, उसका विचार करते समय लिंग-शरीर और कर्म इन दोनोंकाभी विचार करना पड़ता है। इनमेंसे लिंग-शरीरका सांख्य और वेदान्त, दोनों दृष्टियोंसे पहलेही विचार किया जा चुका है। इसलिये यहाँ फिर उसकी चर्चा नहीं की जाती। इस प्रकरणमें सिर्फ इसी बातका विवेचन किया गया है, कि जिस कर्मके कारण आत्माको ब्रह्मज्ञान न होते हुए अनेक जन्मोंके चक्करमें पड़ना होता है, उस कर्मका स्वरूप क्या है ? और उससे छूट कर आत्माको अमृतत्व प्राप्त होनेके लिये मनुष्यको इस संसारमें कैसे चलना चाहिये ? सृष्टिके आरंभकालमें मूल अव्यक्त और निर्गुण परब्रह्म जिस देशकाल आदि नाम-रूपात्मक सगुण शक्तिसे व्यक्त अर्थात् दृश्य सृष्टिरूप हुआ-सा दीख पड़ता है, उसीको वेदान्तशास्त्रमें 'माया' कहते हैं (गीता ७. २४, २५); और उसीमें कर्मकाभी समावेश होता है (बृ. १. ६. १)। इतनाही नहीं तो यहभी कहा जा सकता है, कि 'माया' और 'कर्म' दोनों समानार्थक हैं। क्योंकि पहले कुछ-न-कुछ कर्म अर्थात् व्यापार हुए बिना अव्यक्तका व्यक्त होना अथवा निर्गुणका सगुण होना संभव नहीं। इसीलिये पहले यह कह कर, कि मैं अपनी मायासे प्रकृतिमें उत्पन्न होता हूँ (गीता ४. ६); फिर आगे आठवें अध्यायमें गीतामेंही कर्मका यह लक्षण दिया है, कि "अक्षर परब्रह्मसे पंचमहाभूतादि विविध सृष्टि निर्माण होनेकी जो क्रिया है, वही कर्म है" (गीता ८. ३)। कर्म कहते हैं व्यापार अथवा क्रियाको -फिर वह मनुष्यकृत हो, सृष्टिके अन्य पदार्थोंकी क्रिया हो अथवा मूल सृष्टिके उत्पन्न होनेकीही हो - इतना व्यापक अर्थ इस जगह विवक्षित है। परंतु कर्म कोई हो; उसका परिणाम सदैव केवल इतनाही होता है, कि एक प्रकारका नामरूप बदल कर उसकी जगह दूसरा नामरूप उत्पन्न किया जाय। क्योंकि इन नामरूपोंसे आच्छादित मूल द्रव्य कभी नहीं बदलता - वह सदा एक-साही रहता है। उदा- हरणार्थ, बुननेकी क्रियासे 'सूत' यह नाम बदलकर उसी द्रव्यको 'वस्त्र' नाम मिल जाता है; और कुम्हारके व्यापारसे 'मिट्टी' नामके स्थानमें 'घट' नाम प्राप्त हो जाता है। इसलिये मायाकी व्याख्या देते समय कर्मको न लेकर नाम और रूपकोही कई बार माया कहा है। तथापि कर्मका जब स्वतंत्र विचार करना पड़ता है, तब यह कहना पड़ता है, कि कर्मस्वरूप और मायास्वरूप एकही हैं। इसलिये आरंभहीमें

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २६५

यह कह देना अधिक सुभीतेकी बात होगी, कि माया, नामरूप और कर्म, ये तीनों मूलमें एकस्वरूपीही हैं। हाँ; उसमेंभी यह विशिष्टार्थक सूक्ष्म भेद किया जा सकता है, कि माया एक सामान्य शब्द है; और उसीके दिखावेको नामरूप तथा व्यापारको कर्म कहते हैं। पर साधारणतया यह भेद दिखलानेकी आवश्यकता नहीं होती। इसीलिये इन तीनों शब्दोंका बहुधा समान अर्थमेंही प्रयोग किया जाता है। परब्रह्मके एक भागपर विनाशी मायाका जो आच्छादन (अथवा उपाधि = ऊपरका उड़ौना) हमारी आँखोंको दिखता है, उसीको सांख्यशास्त्रमें ‘त्रिगुणात्मक प्रकृति’ कहा गया है। सांख्यवादी पुरुष और प्रकृति, इन दोनों तत्त्वोंको स्वयंभू, स्वतंत्र और अनादि मानते हैं; परंतु माया, नामरूप अथवा कर्म, क्षण-क्षणमें बदलते रहते हैं। इसलिये उनको नित्य और अविकारी परब्रह्मकी योग्यताका – अर्थात् स्वयंभू और स्वतंत्र मानना न्याय-दृष्टिसे अनुचित है। क्योंकि नित्य और अनित्य, ये दोनों कल्पनाएँ परस्पर-विरुद्ध हैं; और इसलिये दोनोंका अस्तित्व एकही कालमें संभव नहीं माना जा सकता। इसलिये वेदान्तियोंने यह निश्चित किया है, कि विनाशी प्रकृति अथवा कर्मात्मक माया स्वतंत्र नहीं है; किंतु एक नित्य, सर्वव्यापी और निर्गुण परब्रह्ममेंही, मनुष्यकी दुर्बल इंद्रियोंको सगुण मायाका दिखावा दीख पड़ता है। परंतु केवल इतनाही कह देनेसे काम नहीं चल जाता, कि माया परतंत्र है; और निर्गुण परब्रह्ममेंही यह दृश्य दिखाई देता है। गुणपरिणामसे न सही; तोभी विवर्तवादसे निर्गुण और नित्य ब्रह्ममें विनाशी सगुण नामरूपोंका – अर्थात् मायाका दृश्य दिखना चाहे संभव हो; तथापि यहाँ एक और प्रश्न उपस्थित होता है, कि मनुष्यकी इंद्रियोंको दीखनेवाला यह सगुण दृश्य निर्गुण परब्रह्ममें पहलें पहल किस क्रमसे, कब और क्यों दीखने लगा? अथवा यही अर्थ व्यावहारिक भाषामें इस प्रकार कहा जा सकता है, कि नित्य और चिद्रूपी परमेश्वरने नामरूपात्मक, विनाशी और जड़ सृष्टि कब और क्यों उत्पन्न की? परंतु ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें जैसा कि वर्णन किया गया है, यह विषय मनुष्यकेही लिये नहीं; किंतु देवताओंके लिये और वेदोंके लियेभी अगम्य है (ऋ. १०. १२९; तै. ब्रा. २. ८. ९)। इसलिये उक्त प्रश्नका इससे अधिक और कुछ उत्तर नहीं दिया जा सकता, कि "ज्ञानदृष्टिसे निश्चित किये हुए निर्गुण पर- ब्रह्मकीही यह एक अतर्क्य लीला है” (वे. सू. २. १. ३३)। अतएव इतना मान करही आगे चलना पड़ता है, कि जबसे हम देखते आये हैं, तबसे निर्गुण ब्रह्मके साथही नामरूपात्मक विनाशी कर्म अथवा सगुण माया हमें दृग्गोचर होती आई है। इसीलिये वेदान्तसूत्रमें कहा है, कि मायात्मक कर्म अनादि है (वे. सू. २. १. ३५-३७); और भगवद्गीतामेंभी भगवानने पहले यह वर्णन करके, कि प्रकृति स्वतंत्र नहीं है – “मेरीही माया है” (गीता ७. १४); – फिर आगे कहा है, कि प्रकृति अर्थात् माया, और पुरुष, दोनों ‘अनादि’ हैं (गीता १३. १९)। इसी

२६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तरह श्रीशंकराचार्यने अपने भाष्यमें मायाका लक्षण देते हुए कहा है, कि “ सर्वज्ञ- श्‍वरस्याऽऽत्मभूते इवाऽविद्याकल्पिते नामरूपे तत्त्वान्यत्वाभ्यामनिर्वचनीये संसार- प्रपंचबीजभूते सर्वज्ञस्येश्वरस्य ‘माया’ ‘शक्तिः’ ‘प्रकृति’ रिति च श्रुतिस्मृत्योरभि- लप्येते ” (वे. सू. शां. भा. २. १. १४)। इसका भावार्थ यह है, कि – “ (इंद्रियोंके) अज्ञानसे मूल ब्रह्ममें कल्पित नामरूपोंकोही श्रुति और स्मृति-ग्रंथोंमें सर्वज्ञ ईश्वरकी ‘माया’, ‘शक्ति’ अथवा ‘प्रकृति’ कहते हैं। ये नामरूप सर्वज्ञ परमेश्वरके आत्म- भूत-से जान पड़ते हैं, परंतु इनके जड़ होनेके कारण यह नहीं कहा जा सकता, कि ये परब्रह्मसे भिन्न हैं या अभिन्न ( तत्त्वान्यत्व ) ? और यही जड़ सृष्टि ( दृश्य )के विस्तारके मूल हैं”; और “ इस मायाके योगसेही यह सृष्टि परमेश्वर-निर्मित दीख पड़ती है; इस कारण यह माया चाहे विनाशी हो; तथापि दृश्य सृष्टिकी उत्पत्तिके लिये आवश्यक और अत्यंत उपयुक्त है; तथा इसीको उपनिषदोंमें अव्यक्त, आकाश, अक्षर इत्यादि नाम दिये गये हैं ” ( वे. सू. शां. भा. १. ४. ३)। इससे दीख पड़ेगा, कि चिन्मय ( पुरुष ) और अचेतन माया ( प्रकृति ) इन दोनों तत्त्वोंको सांख्यवादी स्वयंभू, स्वतंत्र और अनादि मानते हैं; पर मायाका अनादित्व यद्यपि वेदान्ती एक तरहसे स्वीकार करते हैं तथापि यह उन्हें मान्य नहीं, कि माया स्वयंभू और स्वतंत्र है। और इसी कारण संसारात्मक मायाका वृक्षरूपसे वर्णन करते समय गीतामें ( गीता १५. ३ ) कहा गया है, कि “ न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ” – इस संसारवृक्षका रूप, अंत, आदि मूल अथवा ठौर नहीं मिलता। इसी प्रकार तीसरे अध्यायमें ऐसे जो वर्णन हैं, कि “ कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ” ( गीता ३. १५ ) – ब्रह्मसे कर्म उत्पन्न हुआ; “ यज्ञः कर्मसमुद्भवः ” ( गीता ३. १४ ) – यज्ञभी तो कर्मसेही उत्पन्न होता है। अथवा “ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा ” ( गीता ३. १० ) – ब्रह्मादेवने प्रजा ( सृष्टि ) और यज्ञ ( कर्म ), दोनोंको साथही निर्माण किया; इन सबका तात्पर्यभी यही है, कि “ कर्म अथवा कर्मरूपी यज्ञ और सृष्टि अर्थात् प्रजा, ये सब साथही उत्पन्न हुए हैं। ” फिर चाहे इस सृष्टिको प्रत्यक्ष ब्रह्मादेवसे निर्मित कहो अथवा मीमांसकोंकी नाईं यह कहो, कि उस ब्रह्मादेवने नित्य वेद-शब्दोंसे उसको बनाया – दोनोंका अर्थ एकही है ( मभा. शां. २३१; मनु. १. २१ )। सारांश, दृश्य सृष्टिका निर्माण होनेके समय मूल निर्गुण ब्रह्ममें जो व्यापार दीख पड़ता है; वही कर्म है। इस व्यापारकोही नाम-रूपात्मक माया कहा गया है; और इस मूल कर्मसेही सूर्य-चंद्र आदि सृष्टिके सब पदार्थोंके व्यापार आगे परंपरासे उत्पन्न हुए हैं ( बृ. ३. ८. ९)। ज्ञानी पुरुषोंने अपनी बुद्धिसे निश्चित किया है, कि संसारके सारे व्यापारोंका मूलभूत जो यह सृष्ट्युत्पत्ति-कालका कर्म अथवा

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २६७ माया है, सो ब्रह्मकीही कोई न कोई अतर्क्य लीला है, स्वतंत्र वस्तु नहीं है।* परंतु ज्ञानी पुरुषोंकी गति यहांपर कुंठित हो जाती है इसलिये इस बातका पता नहीं लगता, कि यह लीला, नामरूप अथवा मायात्मक कर्म 'कब' उत्पन्न हुआ ? अतः केवल कर्म-सृष्टिकाही विचार जब करना होता है, तब इस परतंत्र और विनाशी मायाको तथा मायाके साथही तदंगभूत कर्मकोभी वेदान्तशास्त्रमें 'अनादि' कहा करते हैं ( वे. सू. २. १. ३५)। स्मरण रहे, कि जैसा सांख्यवादी कहते हैं, उस प्रकार, अनादिका यह मतलब नहीं है, कि माया मूलमेंही परमेश्वरकी बराबरीकी, निरारंभ और स्वतंत्र है - परंतु यहाँ अनादि शब्दका यह अर्थ विवक्षित है कि वह दुर्ज्ञेयारंभ है - अर्थात् उसका आदि ( आरंभ ) मालूम नहीं होता । परंतु यद्यपि हमें इस बातका पता नहीं लगता, कि चिद्रूप ब्रह्म कर्मात्मक अर्थात् दृश्य सृष्टि-रूप कब और क्यों होने लगा ? तथापि इस मायात्मक कर्मके अगले सब व्यापारोंके नियम निश्चित हैं; और उनमेंसे बहुतेरे नियमोंको हम निश्चित रूपसे जानभी सकते हैं। आठवें प्रकरणमें सांख्यशास्त्रके अनुसार इस बातका विवेचन किया गया है, कि मूल प्रकृतिसे अर्थात् अनादि मायात्मक कर्मसेही आगे चलकर सृष्टिके नाम-रूपात्मक विविध पदार्थ किस क्रमसे निर्मित हुए; और वहीं आधुनिक आधिभौतिक शास्त्रके सिद्धान्तभी तुलनाके लिये बतलाये गये हैं। यह सच है, कि वेदान्तशास्त्र प्रकृतिको परब्रह्मकी तरह स्वयंभू नहीं मानता; परंतु प्रकृतिके अगले विस्तारका जो क्रम सांख्यशास्त्रमें कहा गया है, वही वेदान्तकोभी मान्य है; इसलिये यहाँ उसकी पुनरुक्ति नहीं की जाती। कर्मात्मक मूल प्रकृतिसे विश्वकी उत्पत्तिका जो क्रम पहले बतलाया गया है, उसमें, उन सामान्य नियमोंका कुछभी विचार नहीं हुआ, कि जिनके अनुसार मनुष्यको कर्म-फल भोगने पड़ते हैं। इसलिये अब उन नियमोंका विवेचन करना आवश्यक है। इसीको 'कर्मविपाक' कहते हैं। इस कर्मविपाकका पहला नियम यह है, कि जहाँ एक बार कर्मका आरंभ हुआ कि फिर उसका व्यापार आगे बराबर अखंड जारी रहता है; और जब ब्रह्म- हराका दिन समाप्त होनेपर सृष्टिका संहार होता है, तबभी यह कर्म बीजरूपसे बना रहता है, एवं फिर जब सृष्टिका आरंभ होने लगता है, तब उसी कर्मबीजसे फिर पूर्ववत् अंकुर फूटने लगते हैं। महाभारतका कथन है, कि :- येषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे । तान्येव प्रतिपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥ अर्थात् "पूर्वकी सृष्टिमें प्रत्येक प्राणीने जो जो कर्म किये होंगे, ठीक वेही कर्म उसे (चाहे उसकी इच्छा हो या न हो) फिर यथापूर्व प्राप्त होते रहते हैं" (मभा.

  • "What belongs to mere appearance is necessarily subordina- ted by reason to the nature of the thing in itself." Kant's Metaphy- sic of Morals ( Abbot's trans. in Kant's Theory of Ethics, p. 81 ).

२६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र शां. २३१. ४८, ४९ और गीता ८. १८ तथा १९) । गीतामें (गीता ४. १७) कहा है, कि "गहना कर्मणो गतिः" - कर्मकी गति कठिन है, इतनाही नहीं; किंतु कर्मका बंधनभी बड़ा कठिन है। कर्म किसीसेभी नहीं छूट सकता । वायु कर्मसेही चलती है; सूर्य-चंद्रादिक कर्मसेही घूमा करते हैं; और ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सगुण देवताभी कर्मोंमेंही बँधे हुए हैं। फिर इंद्र आदिकोंका क्या पूछना है ? सगुणका अर्थ है नामरूपात्मक; और नामरूपात्मकका अर्थ है कर्म या कर्मका परिणाम । जब कि यही बतलाया नहीं जा सकता, कि मायात्मक कर्म आरंभमें कैसे उत्पन्न हुआ; तब यह कैसे बतलाया जावे, कि तदंगभूत मनुष्य इस कर्म-चक्रमें पहले पहल कैसे फँस गया ? परंतु किसीभी रीतिसे क्यों न हो; जब वह एक बार कर्म- बंधनमें पड़ चुका, तब फिर आगे चलकर उसकी एक नामरूपात्मक देहका नाश होनेपर कर्मके परिणामके कारण उसे इस सृष्टिमें भिन्न भिन्न रूपोंका मिलना कभी नहीं छूटता । क्योंकि आधुनिक आधिभौतिक शास्त्रकारोंनेभी अब यह निश्चित किया है,* कि कर्मशक्तिका कभीभी नाश नहीं होता; किंतु जो शक्ति आज किसी एक नामरूपसे दीख पड़ती है, वही शक्ति उस नामरूपके नाश होनेपर दूसरे नाम- रूपसे प्रकट हो जाती है। और जब कि किसी एक नामरूपके नाश होनेपर उसको भिन्न भिन्न नामरूप प्राप्त हुआही करते हैं, तब यहभी नहीं माना जा सकता, कि ये भिन्न भिन्न नामरूप निर्जीवही होंगे; अथवा ये भिन्न प्रकारके होही नहीं सकते । अध्यात्मदृष्टिसे इस नामरूपात्मक परंपराकोही जन्म-मरणका चक्र या संसार कहते हैं। और इन नामरूपोंकी आधारभूत शक्तिको समष्टिरूपसे ब्रह्म, और व्यष्टि रूपसे जीवात्मा कहा करते हैं। वस्तुतः देखनेसे यह विदित होगा, कि यह आत्मा न तो जन्म धारण करता है; और न मरताही है। अर्थात् यह नित्य अथवा स्थायी है। परंतु कर्मबंधनमें पड़ जानेके कारण एक नामरूपके नाश हो जाने पर उसीको दूसरे नामरूपोंका प्राप्त होना टल नहीं सकता । आजका कर्म कल भोगना पड़ताहै, और कलका परसों । इतनाही नहीं; किंतु इस जन्ममें जो कुछ किया

  • यह बात नहीं, कि पुनर्जन्मकी इस कल्पनाको केवल हिंदुधर्मने या केवल आस्तिकवादियोनेही माना हो । यद्यपि बौद्ध लोग आत्माको नहीं मानते, तथापि वैदिक धर्ममें वर्णित पुनर्जन्मकी कल्पनाको उन्होंने अपने धर्ममें पूर्ण रीतिसे स्थान दिया है; और बीसवीं शताब्दीमें "परमेश्वर मर गया" कहनेवाले पक्के निरीश्वर- वादी जर्मन पंडित नित्शेनेभी पुनर्जन्मवादको स्वीकार किया है। उसने लिखा है, कि कर्म-शक्तिके जो हमेशा रूपांतर हुआ करते हैं, वे मर्यादित हैं; तथा काल अनंत है; इसलिये कहना पड़ता है, कि एक बार जो नामरूप हो चुके हैं, वेही फिर आगे यथापूर्व कभी न कभी अवश्य उत्पन्न होतेही हैं, और इसीसे कर्मका चक्र अर्थात् बंधन केवल आधिभौतिक दृष्टिसेही सिद्ध हो जाता है। उसने यहभी लिखा है, कि यह कल्पना और उपपत्ति मुझे अपनी स्फूर्तिसे मालूम हुई है ! Nietzsche's Eternal Recurrence (Complete Works, Engl. Trans., Vol. XVI, pp. 235-256).

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २६९ जाय, उसे अगले जन्ममें भोगना पड़ता है - इस तरह यह भवचक्र सदैव चलता रहता है। मनुस्मृति तथा महाभारतमें ( मनु. ४. १७३; मभा. आ. ८०. ३ ) तो कहा गया है, कि इन कर्मफलोंको न केवल हमें, किंतु कभी कभी हमारी नामरूपात्मक देहसे उत्पन्न हमारे लड़कों और नातियोंतककोभी भोगना पड़ता है। शांतिपर्वमें भीष्म युधिष्ठिरसे कहते हैं :- पापं कर्म कृतं किंचिद्यदि तस्मिन्न दृश्यते । नृपते तस्य पुत्रेषु पौत्रेष्वपि च नप्तृषु ॥ अर्थात् " हे राजा ! यदि किसी आदमीको उसके पाप-कर्मोंका फल मिलते हुए न दीख पड़े; उसके पुत्रों, पौत्रों और प्रपौत्रोंतकको उसे भोगना पड़ता है" ( मभा. शां. १२९. २१ )। हम लोग प्रत्यक्ष देखा करते हैं, कि कोई कोई असाध्य रोग वंशपरंपरासे प्रचलित रहते हैं। इसी तरह कोई जन्मसेही दरिद्री होता है; और कोई वैभवपूर्ण राजकुलमें उत्पन्न होता है। इन सब बातोंकी उपपत्ति केवल कर्मवादसेही लगाई जा सकती है; और बहुतोंका मत है, कि यही कर्मवादकी सच्चाईका प्रमाण है। कर्मका यह चक्र जब एक बार आरंभ हो जाता है, तब फिर उसे परमेश्वरभी नहीं रोक सकता। यदि इस दृष्टिसे देखें, कि सारी सृष्टि परमेश्वरकी इच्छासेही चल रही है; तो कहना न होगा कि, कर्म-फलका देनेवाला परमेश्वरसे भिन्न कोई दूसरा हो नहीं सकता ( वे. सू. ३. २. ३८; कौ. ३. ८ )। और इसीलिये भगवान्‌ने कहा है, कि "लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान्" ( गीता. ७. २२ ) - मैं जिस फलका निश्चय कर दिया करता हूँ, वही इच्छित फल मनुष्यको मिलता है। परंतु कर्म-फलको निश्चित कर देनेका काम यद्यपि ईश्वरका है, तथापि वेदान्तशास्त्रका यह सिद्धान्त है, कि ये फल हर एकके खरे-खोटे कर्मोंकी अर्थात् कर्म-अकर्मकी योग्यताके अनुरूपही निश्चित किये जाते हैं; इसीलिये परमेश्वर इस संबंधमें वस्तुतः उदासीनही है। अतः यदि मनुष्योंमें भले-बुरेका भेद हो जाता है, तो उसके लिये परमेश्वर वैषम्य ( विषम बुद्धि ) और नैर्घृण्य ( निर्दयता ) दोषोंको पात्र नहीं होता ( वे. सू. २. १. ३४ )। इसी आशयको लेकर गीतामेंभी कहा है, कि "समोऽहं सर्वभूतेषु" ( गीता ९. २९ ) अर्थात् ईश्वर सबके लिये समान है; अथवा :- नादत्ते कस्यचित् पापं न चैवं सुकृतं विभुः ॥ " परमेश्वर न तो किसीके पापको लेता है, न पुण्यको; कर्म या मायाके स्वभावका चक्र चलता रहता है; जिससे प्राणिमात्रको अपने अपने कर्मानुसार सुख-दुःख भोगने पड़ते हैं," ( गीता ५. १४, १५)। सारांश, यद्यपि मानवी बुद्धिसे इस बातका पता नहीं लगता, कि परमेश्वरकी इच्छासे संसारके कर्मका आरंभ कब हुआ और तदंगभूत मनुष्य कर्मके बंधनमें पहले पहल कैसे फँस गया ? तथापि जब हम देखते हैं, कि कर्मके आगामी परिणाम या फल केवल कर्मके नियमोंसेही उत्पन्न हुआ करते

२७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र हैं; तब हम अपनी बुद्धिसे इतना तो अवश्य निश्चय कर सकते हैं, कि संसारके आरंभसे प्रत्येक प्राणी नामरूपात्मक अनादि कर्मकी कैदमें बँध-सा गया है। “कर्मणा बध्यते जन्तुः” - ऐसा जो इस प्रकरणके आरंभमेंही वचन दिया हुआ है, उसका अर्थभी यही है। इस अनादि कर्मप्रवाहके औरभी दूसरे अनेक नाम हैं, जैसे संसार, प्रकृति, माया, दृश्य सृष्टि, सृष्टिके कायदे या नियम इत्यादि। क्योंकि सृष्टिशास्त्रके नियम नामरूपोंमें होनेवाले परिवर्तनोंकेही नियम हैं। और यदि इस दृष्टिसे देखें, तो सब आधिभौतिक शास्त्र नाम-रूपात्मक मायाके प्रपंचमेंही आ जाते हैं। इस मायाके नियम तथा बंधन सुदृढ एवं सर्वव्यापी हैं। इसीलिये हेकेल जैसे आधिभौतिक शास्त्रज्ञोंने - जो इस नामरूपात्मक माया अथवा दृश्य सृष्टिके मूलमें अथवा उससे परे किसी नित्य तत्त्वका अस्तित्व नहीं मानते; यह सिद्धान्त किया है, कि यह सृष्टि-चक्र मनुष्यको जिधर ढकेलता जायेगा, उधरही उसे जाना पड़ता है। इन पंडितोंका कथन है, कि प्रत्येक मनुष्यको जो ऐसा मालूम होता रहता है, कि नामरूपात्मक विनाशी स्वरूपसे मेरी मुक्ति होनी चाहिये; अथवा अमुक काम करनेसे मुझे अमृतत्व मिलेगा - यह सब केवल भ्रम है। आत्मा या परमात्मा कोई स्वतंत्र पदार्थ नहीं है; और अमृतत्वभी झूठ है; इतनाही नहीं, किंतु इस संसारमें कोईभी मनुष्य अपनी इच्छासे कुछ काम करनेको स्वतंत्र नहीं है। मनुष्य आज जो कुछ कार्य करता है, वह पूर्वकालमें किये गये स्वयं उसके या उसके पूर्वजोंके कर्मोंका परिणाम है, इससे उक्त कार्यका करना या न करनाभी उसकी इच्छापर कभी अवलंबित नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ, किसीकी एक-आध उत्तम वस्तुको देखकर, पूर्वकर्मोंसे अथवा वंशपरंपरागत संस्कारोंसे, उसे चुरा लेनेकी बुद्धि, कई लोगोंके मनमें इच्छा न रहनेपरभी, उत्पन्न हो जाती है; और वे उस वस्तुको चुरा लेनेके लिये प्रवृत्त हो जाते हैं। अर्थात् इन आधिभौतिक पंडितोंके मतका सारांश यही है, कि गीतामें जो यह तत्त्व बतलाया गया है, कि “अनिच्छन् अपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः” (गीता ३. ३६) - इच्छाके न रहनेपरभी मनुष्य पाप करता है ! वही तत्त्व सभी जगह एक समान उपयोगी है, उसके लिये एकभी अपवाद नहीं है; और उससे बचनेकाभी कोई उपाय नहीं है। इस मतके अनुसार यदि देखा जाय, तो मानना पड़ेगा कि मनुष्यकी जो बुद्धि या इच्छा आज उत्पन्न होती है, वह कलके कर्मोंका फल है; तथा कल जो बुद्धि उत्पन्न हुई थी, वह परसोंके कर्मोंका फल था; और ऐसा होते होते इस कारणपरंपराका कभी अंतही नहीं होगा; तथा यह मानना पड़ेगा कि मनुष्य अपनी स्वतंत्र बुद्धिसे कभी कुछभी नहीं कर सकता - जो कुछ होता है वह सब पूर्व-कर्म अर्थात् दैवकाभी फल है। क्योंकि प्राक्तन-कर्मकोही लोग दैव कहा करते हैं। इस प्रकार यदि किसी कर्मको करने अथवा न करनेकी मुष्यको कोई स्वतंत्रताही नहीं है; तो फिर यह कहनाही व्यर्थ