भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 310

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २६५

यह कह देना अधिक सुभीतेकी बात होगी, कि माया, नामरूप और कर्म, ये तीनों मूलमें एकस्वरूपीही हैं। हाँ; उसमेंभी यह विशिष्टार्थक सूक्ष्म भेद किया जा सकता है, कि माया एक सामान्य शब्द है; और उसीके दिखावेको नामरूप तथा व्यापारको कर्म कहते हैं। पर साधारणतया यह भेद दिखलानेकी आवश्यकता नहीं होती। इसीलिये इन तीनों शब्दोंका बहुधा समान अर्थमेंही प्रयोग किया जाता है। परब्रह्मके एक भागपर विनाशी मायाका जो आच्छादन (अथवा उपाधि = ऊपरका उड़ौना) हमारी आँखोंको दिखता है, उसीको सांख्यशास्त्रमें ‘त्रिगुणात्मक प्रकृति’ कहा गया है। सांख्यवादी पुरुष और प्रकृति, इन दोनों तत्त्वोंको स्वयंभू, स्वतंत्र और अनादि मानते हैं; परंतु माया, नामरूप अथवा कर्म, क्षण-क्षणमें बदलते रहते हैं। इसलिये उनको नित्य और अविकारी परब्रह्मकी योग्यताका – अर्थात् स्वयंभू और स्वतंत्र मानना न्याय-दृष्टिसे अनुचित है। क्योंकि नित्य और अनित्य, ये दोनों कल्पनाएँ परस्पर-विरुद्ध हैं; और इसलिये दोनोंका अस्तित्व एकही कालमें संभव नहीं माना जा सकता। इसलिये वेदान्तियोंने यह निश्चित किया है, कि विनाशी प्रकृति अथवा कर्मात्मक माया स्वतंत्र नहीं है; किंतु एक नित्य, सर्वव्यापी और निर्गुण परब्रह्ममेंही, मनुष्यकी दुर्बल इंद्रियोंको सगुण मायाका दिखावा दीख पड़ता है। परंतु केवल इतनाही कह देनेसे काम नहीं चल जाता, कि माया परतंत्र है; और निर्गुण परब्रह्ममेंही यह दृश्य दिखाई देता है। गुणपरिणामसे न सही; तोभी विवर्तवादसे निर्गुण और नित्य ब्रह्ममें विनाशी सगुण नामरूपोंका – अर्थात् मायाका दृश्य दिखना चाहे संभव हो; तथापि यहाँ एक और प्रश्न उपस्थित होता है, कि मनुष्यकी इंद्रियोंको दीखनेवाला यह सगुण दृश्य निर्गुण परब्रह्ममें पहलें पहल किस क्रमसे, कब और क्यों दीखने लगा? अथवा यही अर्थ व्यावहारिक भाषामें इस प्रकार कहा जा सकता है, कि नित्य और चिद्रूपी परमेश्वरने नामरूपात्मक, विनाशी और जड़ सृष्टि कब और क्यों उत्पन्न की? परंतु ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें जैसा कि वर्णन किया गया है, यह विषय मनुष्यकेही लिये नहीं; किंतु देवताओंके लिये और वेदोंके लियेभी अगम्य है (ऋ. १०. १२९; तै. ब्रा. २. ८. ९)। इसलिये उक्त प्रश्नका इससे अधिक और कुछ उत्तर नहीं दिया जा सकता, कि "ज्ञानदृष्टिसे निश्चित किये हुए निर्गुण पर- ब्रह्मकीही यह एक अतर्क्य लीला है” (वे. सू. २. १. ३३)। अतएव इतना मान करही आगे चलना पड़ता है, कि जबसे हम देखते आये हैं, तबसे निर्गुण ब्रह्मके साथही नामरूपात्मक विनाशी कर्म अथवा सगुण माया हमें दृग्गोचर होती आई है। इसीलिये वेदान्तसूत्रमें कहा है, कि मायात्मक कर्म अनादि है (वे. सू. २. १. ३५-३७); और भगवद्गीतामेंभी भगवानने पहले यह वर्णन करके, कि प्रकृति स्वतंत्र नहीं है – “मेरीही माया है” (गीता ७. १४); – फिर आगे कहा है, कि प्रकृति अर्थात् माया, और पुरुष, दोनों ‘अनादि’ हैं (गीता १३. १९)। इसी

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक) · पृष्ठ 310, कुल 956 में से · BharatKosha