भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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२६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तरह श्रीशंकराचार्यने अपने भाष्यमें मायाका लक्षण देते हुए कहा है, कि “ सर्वज्ञ- श्‍वरस्याऽऽत्मभूते इवाऽविद्याकल्पिते नामरूपे तत्त्वान्यत्वाभ्यामनिर्वचनीये संसार- प्रपंचबीजभूते सर्वज्ञस्येश्वरस्य ‘माया’ ‘शक्तिः’ ‘प्रकृति’ रिति च श्रुतिस्मृत्योरभि- लप्येते ” (वे. सू. शां. भा. २. १. १४)। इसका भावार्थ यह है, कि – “ (इंद्रियोंके) अज्ञानसे मूल ब्रह्ममें कल्पित नामरूपोंकोही श्रुति और स्मृति-ग्रंथोंमें सर्वज्ञ ईश्वरकी ‘माया’, ‘शक्ति’ अथवा ‘प्रकृति’ कहते हैं। ये नामरूप सर्वज्ञ परमेश्वरके आत्म- भूत-से जान पड़ते हैं, परंतु इनके जड़ होनेके कारण यह नहीं कहा जा सकता, कि ये परब्रह्मसे भिन्न हैं या अभिन्न ( तत्त्वान्यत्व ) ? और यही जड़ सृष्टि ( दृश्य )के विस्तारके मूल हैं”; और “ इस मायाके योगसेही यह सृष्टि परमेश्वर-निर्मित दीख पड़ती है; इस कारण यह माया चाहे विनाशी हो; तथापि दृश्य सृष्टिकी उत्पत्तिके लिये आवश्यक और अत्यंत उपयुक्त है; तथा इसीको उपनिषदोंमें अव्यक्त, आकाश, अक्षर इत्यादि नाम दिये गये हैं ” ( वे. सू. शां. भा. १. ४. ३)। इससे दीख पड़ेगा, कि चिन्मय ( पुरुष ) और अचेतन माया ( प्रकृति ) इन दोनों तत्त्वोंको सांख्यवादी स्वयंभू, स्वतंत्र और अनादि मानते हैं; पर मायाका अनादित्व यद्यपि वेदान्ती एक तरहसे स्वीकार करते हैं तथापि यह उन्हें मान्य नहीं, कि माया स्वयंभू और स्वतंत्र है। और इसी कारण संसारात्मक मायाका वृक्षरूपसे वर्णन करते समय गीतामें ( गीता १५. ३ ) कहा गया है, कि “ न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ” – इस संसारवृक्षका रूप, अंत, आदि मूल अथवा ठौर नहीं मिलता। इसी प्रकार तीसरे अध्यायमें ऐसे जो वर्णन हैं, कि “ कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ” ( गीता ३. १५ ) – ब्रह्मसे कर्म उत्पन्न हुआ; “ यज्ञः कर्मसमुद्भवः ” ( गीता ३. १४ ) – यज्ञभी तो कर्मसेही उत्पन्न होता है। अथवा “ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा ” ( गीता ३. १० ) – ब्रह्मादेवने प्रजा ( सृष्टि ) और यज्ञ ( कर्म ), दोनोंको साथही निर्माण किया; इन सबका तात्पर्यभी यही है, कि “ कर्म अथवा कर्मरूपी यज्ञ और सृष्टि अर्थात् प्रजा, ये सब साथही उत्पन्न हुए हैं। ” फिर चाहे इस सृष्टिको प्रत्यक्ष ब्रह्मादेवसे निर्मित कहो अथवा मीमांसकोंकी नाईं यह कहो, कि उस ब्रह्मादेवने नित्य वेद-शब्दोंसे उसको बनाया – दोनोंका अर्थ एकही है ( मभा. शां. २३१; मनु. १. २१ )। सारांश, दृश्य सृष्टिका निर्माण होनेके समय मूल निर्गुण ब्रह्ममें जो व्यापार दीख पड़ता है; वही कर्म है। इस व्यापारकोही नाम-रूपात्मक माया कहा गया है; और इस मूल कर्मसेही सूर्य-चंद्र आदि सृष्टिके सब पदार्थोंके व्यापार आगे परंपरासे उत्पन्न हुए हैं ( बृ. ३. ८. ९)। ज्ञानी पुरुषोंने अपनी बुद्धिसे निश्चित किया है, कि संसारके सारे व्यापारोंका मूलभूत जो यह सृष्ट्युत्पत्ति-कालका कर्म अथवा