श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २६७ माया है, सो ब्रह्मकीही कोई न कोई अतर्क्य लीला है, स्वतंत्र वस्तु नहीं है।* परंतु ज्ञानी पुरुषोंकी गति यहांपर कुंठित हो जाती है इसलिये इस बातका पता नहीं लगता, कि यह लीला, नामरूप अथवा मायात्मक कर्म 'कब' उत्पन्न हुआ ? अतः केवल कर्म-सृष्टिकाही विचार जब करना होता है, तब इस परतंत्र और विनाशी मायाको तथा मायाके साथही तदंगभूत कर्मकोभी वेदान्तशास्त्रमें 'अनादि' कहा करते हैं ( वे. सू. २. १. ३५)। स्मरण रहे, कि जैसा सांख्यवादी कहते हैं, उस प्रकार, अनादिका यह मतलब नहीं है, कि माया मूलमेंही परमेश्वरकी बराबरीकी, निरारंभ और स्वतंत्र है - परंतु यहाँ अनादि शब्दका यह अर्थ विवक्षित है कि वह दुर्ज्ञेयारंभ है - अर्थात् उसका आदि ( आरंभ ) मालूम नहीं होता । परंतु यद्यपि हमें इस बातका पता नहीं लगता, कि चिद्रूप ब्रह्म कर्मात्मक अर्थात् दृश्य सृष्टि-रूप कब और क्यों होने लगा ? तथापि इस मायात्मक कर्मके अगले सब व्यापारोंके नियम निश्चित हैं; और उनमेंसे बहुतेरे नियमोंको हम निश्चित रूपसे जानभी सकते हैं। आठवें प्रकरणमें सांख्यशास्त्रके अनुसार इस बातका विवेचन किया गया है, कि मूल प्रकृतिसे अर्थात् अनादि मायात्मक कर्मसेही आगे चलकर सृष्टिके नाम-रूपात्मक विविध पदार्थ किस क्रमसे निर्मित हुए; और वहीं आधुनिक आधिभौतिक शास्त्रके सिद्धान्तभी तुलनाके लिये बतलाये गये हैं। यह सच है, कि वेदान्तशास्त्र प्रकृतिको परब्रह्मकी तरह स्वयंभू नहीं मानता; परंतु प्रकृतिके अगले विस्तारका जो क्रम सांख्यशास्त्रमें कहा गया है, वही वेदान्तकोभी मान्य है; इसलिये यहाँ उसकी पुनरुक्ति नहीं की जाती। कर्मात्मक मूल प्रकृतिसे विश्वकी उत्पत्तिका जो क्रम पहले बतलाया गया है, उसमें, उन सामान्य नियमोंका कुछभी विचार नहीं हुआ, कि जिनके अनुसार मनुष्यको कर्म-फल भोगने पड़ते हैं। इसलिये अब उन नियमोंका विवेचन करना आवश्यक है। इसीको 'कर्मविपाक' कहते हैं। इस कर्मविपाकका पहला नियम यह है, कि जहाँ एक बार कर्मका आरंभ हुआ कि फिर उसका व्यापार आगे बराबर अखंड जारी रहता है; और जब ब्रह्म- हराका दिन समाप्त होनेपर सृष्टिका संहार होता है, तबभी यह कर्म बीजरूपसे बना रहता है, एवं फिर जब सृष्टिका आरंभ होने लगता है, तब उसी कर्मबीजसे फिर पूर्ववत् अंकुर फूटने लगते हैं। महाभारतका कथन है, कि :- येषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे । तान्येव प्रतिपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥ अर्थात् "पूर्वकी सृष्टिमें प्रत्येक प्राणीने जो जो कर्म किये होंगे, ठीक वेही कर्म उसे (चाहे उसकी इच्छा हो या न हो) फिर यथापूर्व प्राप्त होते रहते हैं" (मभा.
- "What belongs to mere appearance is necessarily subordina- ted by reason to the nature of the thing in itself." Kant's Metaphy- sic of Morals ( Abbot's trans. in Kant's Theory of Ethics, p. 81 ).