श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र शां. २३१. ४८, ४९ और गीता ८. १८ तथा १९) । गीतामें (गीता ४. १७) कहा है, कि "गहना कर्मणो गतिः" - कर्मकी गति कठिन है, इतनाही नहीं; किंतु कर्मका बंधनभी बड़ा कठिन है। कर्म किसीसेभी नहीं छूट सकता । वायु कर्मसेही चलती है; सूर्य-चंद्रादिक कर्मसेही घूमा करते हैं; और ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सगुण देवताभी कर्मोंमेंही बँधे हुए हैं। फिर इंद्र आदिकोंका क्या पूछना है ? सगुणका अर्थ है नामरूपात्मक; और नामरूपात्मकका अर्थ है कर्म या कर्मका परिणाम । जब कि यही बतलाया नहीं जा सकता, कि मायात्मक कर्म आरंभमें कैसे उत्पन्न हुआ; तब यह कैसे बतलाया जावे, कि तदंगभूत मनुष्य इस कर्म-चक्रमें पहले पहल कैसे फँस गया ? परंतु किसीभी रीतिसे क्यों न हो; जब वह एक बार कर्म- बंधनमें पड़ चुका, तब फिर आगे चलकर उसकी एक नामरूपात्मक देहका नाश होनेपर कर्मके परिणामके कारण उसे इस सृष्टिमें भिन्न भिन्न रूपोंका मिलना कभी नहीं छूटता । क्योंकि आधुनिक आधिभौतिक शास्त्रकारोंनेभी अब यह निश्चित किया है,* कि कर्मशक्तिका कभीभी नाश नहीं होता; किंतु जो शक्ति आज किसी एक नामरूपसे दीख पड़ती है, वही शक्ति उस नामरूपके नाश होनेपर दूसरे नाम- रूपसे प्रकट हो जाती है। और जब कि किसी एक नामरूपके नाश होनेपर उसको भिन्न भिन्न नामरूप प्राप्त हुआही करते हैं, तब यहभी नहीं माना जा सकता, कि ये भिन्न भिन्न नामरूप निर्जीवही होंगे; अथवा ये भिन्न प्रकारके होही नहीं सकते । अध्यात्मदृष्टिसे इस नामरूपात्मक परंपराकोही जन्म-मरणका चक्र या संसार कहते हैं। और इन नामरूपोंकी आधारभूत शक्तिको समष्टिरूपसे ब्रह्म, और व्यष्टि रूपसे जीवात्मा कहा करते हैं। वस्तुतः देखनेसे यह विदित होगा, कि यह आत्मा न तो जन्म धारण करता है; और न मरताही है। अर्थात् यह नित्य अथवा स्थायी है। परंतु कर्मबंधनमें पड़ जानेके कारण एक नामरूपके नाश हो जाने पर उसीको दूसरे नामरूपोंका प्राप्त होना टल नहीं सकता । आजका कर्म कल भोगना पड़ताहै, और कलका परसों । इतनाही नहीं; किंतु इस जन्ममें जो कुछ किया
- यह बात नहीं, कि पुनर्जन्मकी इस कल्पनाको केवल हिंदुधर्मने या केवल आस्तिकवादियोनेही माना हो । यद्यपि बौद्ध लोग आत्माको नहीं मानते, तथापि वैदिक धर्ममें वर्णित पुनर्जन्मकी कल्पनाको उन्होंने अपने धर्ममें पूर्ण रीतिसे स्थान दिया है; और बीसवीं शताब्दीमें "परमेश्वर मर गया" कहनेवाले पक्के निरीश्वर- वादी जर्मन पंडित नित्शेनेभी पुनर्जन्मवादको स्वीकार किया है। उसने लिखा है, कि कर्म-शक्तिके जो हमेशा रूपांतर हुआ करते हैं, वे मर्यादित हैं; तथा काल अनंत है; इसलिये कहना पड़ता है, कि एक बार जो नामरूप हो चुके हैं, वेही फिर आगे यथापूर्व कभी न कभी अवश्य उत्पन्न होतेही हैं, और इसीसे कर्मका चक्र अर्थात् बंधन केवल आधिभौतिक दृष्टिसेही सिद्ध हो जाता है। उसने यहभी लिखा है, कि यह कल्पना और उपपत्ति मुझे अपनी स्फूर्तिसे मालूम हुई है ! Nietzsche's Eternal Recurrence (Complete Works, Engl. Trans., Vol. XVI, pp. 235-256).