श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २६९ जाय, उसे अगले जन्ममें भोगना पड़ता है - इस तरह यह भवचक्र सदैव चलता रहता है। मनुस्मृति तथा महाभारतमें ( मनु. ४. १७३; मभा. आ. ८०. ३ ) तो कहा गया है, कि इन कर्मफलोंको न केवल हमें, किंतु कभी कभी हमारी नामरूपात्मक देहसे उत्पन्न हमारे लड़कों और नातियोंतककोभी भोगना पड़ता है। शांतिपर्वमें भीष्म युधिष्ठिरसे कहते हैं :- पापं कर्म कृतं किंचिद्यदि तस्मिन्न दृश्यते । नृपते तस्य पुत्रेषु पौत्रेष्वपि च नप्तृषु ॥ अर्थात् " हे राजा ! यदि किसी आदमीको उसके पाप-कर्मोंका फल मिलते हुए न दीख पड़े; उसके पुत्रों, पौत्रों और प्रपौत्रोंतकको उसे भोगना पड़ता है" ( मभा. शां. १२९. २१ )। हम लोग प्रत्यक्ष देखा करते हैं, कि कोई कोई असाध्य रोग वंशपरंपरासे प्रचलित रहते हैं। इसी तरह कोई जन्मसेही दरिद्री होता है; और कोई वैभवपूर्ण राजकुलमें उत्पन्न होता है। इन सब बातोंकी उपपत्ति केवल कर्मवादसेही लगाई जा सकती है; और बहुतोंका मत है, कि यही कर्मवादकी सच्चाईका प्रमाण है। कर्मका यह चक्र जब एक बार आरंभ हो जाता है, तब फिर उसे परमेश्वरभी नहीं रोक सकता। यदि इस दृष्टिसे देखें, कि सारी सृष्टि परमेश्वरकी इच्छासेही चल रही है; तो कहना न होगा कि, कर्म-फलका देनेवाला परमेश्वरसे भिन्न कोई दूसरा हो नहीं सकता ( वे. सू. ३. २. ३८; कौ. ३. ८ )। और इसीलिये भगवान्ने कहा है, कि "लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान्" ( गीता. ७. २२ ) - मैं जिस फलका निश्चय कर दिया करता हूँ, वही इच्छित फल मनुष्यको मिलता है। परंतु कर्म-फलको निश्चित कर देनेका काम यद्यपि ईश्वरका है, तथापि वेदान्तशास्त्रका यह सिद्धान्त है, कि ये फल हर एकके खरे-खोटे कर्मोंकी अर्थात् कर्म-अकर्मकी योग्यताके अनुरूपही निश्चित किये जाते हैं; इसीलिये परमेश्वर इस संबंधमें वस्तुतः उदासीनही है। अतः यदि मनुष्योंमें भले-बुरेका भेद हो जाता है, तो उसके लिये परमेश्वर वैषम्य ( विषम बुद्धि ) और नैर्घृण्य ( निर्दयता ) दोषोंको पात्र नहीं होता ( वे. सू. २. १. ३४ )। इसी आशयको लेकर गीतामेंभी कहा है, कि "समोऽहं सर्वभूतेषु" ( गीता ९. २९ ) अर्थात् ईश्वर सबके लिये समान है; अथवा :- नादत्ते कस्यचित् पापं न चैवं सुकृतं विभुः ॥ " परमेश्वर न तो किसीके पापको लेता है, न पुण्यको; कर्म या मायाके स्वभावका चक्र चलता रहता है; जिससे प्राणिमात्रको अपने अपने कर्मानुसार सुख-दुःख भोगने पड़ते हैं," ( गीता ५. १४, १५)। सारांश, यद्यपि मानवी बुद्धिसे इस बातका पता नहीं लगता, कि परमेश्वरकी इच्छासे संसारके कर्मका आरंभ कब हुआ और तदंगभूत मनुष्य कर्मके बंधनमें पहले पहल कैसे फँस गया ? तथापि जब हम देखते हैं, कि कर्मके आगामी परिणाम या फल केवल कर्मके नियमोंसेही उत्पन्न हुआ करते