श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र हैं; तब हम अपनी बुद्धिसे इतना तो अवश्य निश्चय कर सकते हैं, कि संसारके आरंभसे प्रत्येक प्राणी नामरूपात्मक अनादि कर्मकी कैदमें बँध-सा गया है। “कर्मणा बध्यते जन्तुः” - ऐसा जो इस प्रकरणके आरंभमेंही वचन दिया हुआ है, उसका अर्थभी यही है। इस अनादि कर्मप्रवाहके औरभी दूसरे अनेक नाम हैं, जैसे संसार, प्रकृति, माया, दृश्य सृष्टि, सृष्टिके कायदे या नियम इत्यादि। क्योंकि सृष्टिशास्त्रके नियम नामरूपोंमें होनेवाले परिवर्तनोंकेही नियम हैं। और यदि इस दृष्टिसे देखें, तो सब आधिभौतिक शास्त्र नाम-रूपात्मक मायाके प्रपंचमेंही आ जाते हैं। इस मायाके नियम तथा बंधन सुदृढ एवं सर्वव्यापी हैं। इसीलिये हेकेल जैसे आधिभौतिक शास्त्रज्ञोंने - जो इस नामरूपात्मक माया अथवा दृश्य सृष्टिके मूलमें अथवा उससे परे किसी नित्य तत्त्वका अस्तित्व नहीं मानते; यह सिद्धान्त किया है, कि यह सृष्टि-चक्र मनुष्यको जिधर ढकेलता जायेगा, उधरही उसे जाना पड़ता है। इन पंडितोंका कथन है, कि प्रत्येक मनुष्यको जो ऐसा मालूम होता रहता है, कि नामरूपात्मक विनाशी स्वरूपसे मेरी मुक्ति होनी चाहिये; अथवा अमुक काम करनेसे मुझे अमृतत्व मिलेगा - यह सब केवल भ्रम है। आत्मा या परमात्मा कोई स्वतंत्र पदार्थ नहीं है; और अमृतत्वभी झूठ है; इतनाही नहीं, किंतु इस संसारमें कोईभी मनुष्य अपनी इच्छासे कुछ काम करनेको स्वतंत्र नहीं है। मनुष्य आज जो कुछ कार्य करता है, वह पूर्वकालमें किये गये स्वयं उसके या उसके पूर्वजोंके कर्मोंका परिणाम है, इससे उक्त कार्यका करना या न करनाभी उसकी इच्छापर कभी अवलंबित नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ, किसीकी एक-आध उत्तम वस्तुको देखकर, पूर्वकर्मोंसे अथवा वंशपरंपरागत संस्कारोंसे, उसे चुरा लेनेकी बुद्धि, कई लोगोंके मनमें इच्छा न रहनेपरभी, उत्पन्न हो जाती है; और वे उस वस्तुको चुरा लेनेके लिये प्रवृत्त हो जाते हैं। अर्थात् इन आधिभौतिक पंडितोंके मतका सारांश यही है, कि गीतामें जो यह तत्त्व बतलाया गया है, कि “अनिच्छन् अपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः” (गीता ३. ३६) - इच्छाके न रहनेपरभी मनुष्य पाप करता है ! वही तत्त्व सभी जगह एक समान उपयोगी है, उसके लिये एकभी अपवाद नहीं है; और उससे बचनेकाभी कोई उपाय नहीं है। इस मतके अनुसार यदि देखा जाय, तो मानना पड़ेगा कि मनुष्यकी जो बुद्धि या इच्छा आज उत्पन्न होती है, वह कलके कर्मोंका फल है; तथा कल जो बुद्धि उत्पन्न हुई थी, वह परसोंके कर्मोंका फल था; और ऐसा होते होते इस कारणपरंपराका कभी अंतही नहीं होगा; तथा यह मानना पड़ेगा कि मनुष्य अपनी स्वतंत्र बुद्धिसे कभी कुछभी नहीं कर सकता - जो कुछ होता है वह सब पूर्व-कर्म अर्थात् दैवकाभी फल है। क्योंकि प्राक्तन-कर्मकोही लोग दैव कहा करते हैं। इस प्रकार यदि किसी कर्मको करने अथवा न करनेकी मुष्यको कोई स्वतंत्रताही नहीं है; तो फिर यह कहनाही व्यर्थ