भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २७१

है, कि मनुष्यको अपना आचरण अमुक रीतिसे सुधार लेना चाहिये; और अमुक रीतिसे ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान प्राप्त करके अपनी बुद्धिको शुद्ध करना चाहिये। तब तो मनुष्यकी वही दशा होती है, कि जो नदीके प्रवाहमें बहती हुई लकड़ीकी हो जाती है; अर्थात् जिस ओर माया, प्रकृति, सृष्टि-क्रम या कर्मका प्रवाह उसे खींचेगा, उसी ओर उसे चुपचाप चले जाना चाहिये। फिर चाहे उसमें अधोगति हो अथवा प्रगति ! इसपर कुछ अन्य आधिभौतिक उत्क्रांतिवादियोंका कहना है, कि प्रकृतिका स्वरूप स्थिर नहीं है; और नामरूप क्षण-क्षणमें बदला करते हैं; इसलिये जिन सृष्टिनियमोंके अनुसार ये परिवर्तन होते हैं, उन्हें जानकर मनुष्यको बाह्य- सृष्टिमें ऐसा परिवर्तन कर लेना चाहिये, कि जो उसे हितकारक हो; और हम देखते हैं, कि मनुष्य इसी न्यायसे प्रत्यक्ष व्यवहारोंमें अग्नि या विद्युच्छक्तिका उपयोग अपने फायदेके लिये करता है। इसी तरह यहभी अनुभवकी बात है, कि प्रयत्नसे मनुष्यस्वभावमेंभी थोड़ा-बहुत परिवर्तन अवश्य हो जाता है। परंतु प्रस्तुत प्रश्न यह नहीं है, कि सृष्टि-रचनामें या मनुष्य-स्वभावमें परिवर्तन होता है या नहीं ? और करना चाहिये या नहीं ? हमें तो पहले यही निश्चय करना है, कि ऐसा परिवर्तन करनेकी जो बुद्धि या इच्छा मनुष्यमें उत्पन्न होती है, उसे रोकने या न रोकनेकी स्वाधीनता उसमें है या नहीं। और, आधिभौतिक शास्त्रकी दृष्टिसे इस बुद्धिका होना या न होनाही यदि “बुद्धिः कर्मानुसारिणी” के न्यायके अनुसार प्रकृति, कर्म या सृष्टिके नियमोंसे पहलेही निश्चित हुआ है, तो यही निष्पन्न होता है, कि इस आधिभौतिक शास्त्रके अनुसार किसीभी कर्मको करने या न करनेके लिये मनुष्य स्वतंत्र नहीं है। इस वादको ‘वासना-स्वातंत्र्य’, ‘इच्छा-स्वातंत्र्य’ या ‘प्रवृत्ति- स्वातंत्र्य' कहते हैं। केवल कर्मविपाक अथवा केवल आधिभौतिक शास्त्रकी दृष्टिसे विचार किया जाय, तो अंतमें यही सिद्धान्त करना पड़ता है, कि मनुष्यको किसीभी प्रकारका प्रवृत्ति-स्वातंत्र्य या इच्छा-स्वातंत्र्य नहीं है और वह कर्मके अभेद्य बंधनोंसे वैसेही जकड़ा हुआ है, जैसे किसी गाड़ीका पहिया चारों तरफ़से लोहेकी पट्टीसे जकड़ दिया जाता है। परंतु इस सिद्धान्तकी सत्यताके लिये मनुष्योंके अंतःकरणका अनुभव गवाही देनेको तैयार नहीं है। प्रत्येक मनुष्य अपने अंतःकरणमें यहीं कहता है, कि यद्यपि मुझमें सूर्यका उदय पश्चिम दिशामें करा देनेकी शक्ति नहीं है, तोभी मुझमें इतनी शक्ति अवश्य है, कि मैं अपने हाथसे होनेवाले कार्योंकी भलाईबुराईका विचार करके उन्हें अपनी इच्छाके अनुसार करूँ या न करूँ; अथवा जब मेरे सामने पाप या पुण्य तथा धर्म या अधर्म दो मार्ग उपस्थित हों, तब उनमेंसे इस प्रकार किसी एकको स्वीकार कर लेनेके लिये मैं स्वतंत्र हूँ। अब यही देखना है, कि यह समझ सच है या झूठ ? यदि इस समझको झूठ कहें, तो हम देखते हैं, कि इसीके आधारपर चोरी, हत्या आदि अपराध करनेवालोंको अपराधी ठहराकर सजा दी जाती है; और यदि सच मानें तो कर्मवाद, कर्मविपाक या दृश्य सृष्टिके नियम