श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मिथ्या प्रतीत होते हैं; आधिभौतिक शास्त्रोंमें केवल जड़ पदार्थोंकी क्रियाओंका ही विचार किया जाता है, इसलिये वहाँ यह प्रश्न उत्पन्न नहीं होता; परंतु जिस कर्म- योग-शास्त्रमें ज्ञानवान् मनुष्यके कर्तव्यका विवेचन करना होता है, उसमें यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है; और उसका उत्तर देनाभी आवश्यक है। क्योंकि एक बार यदि यही अंतिम निश्चय हो जाय, कि मनुष्यको कुछभी प्रवृत्ति-स्वातंत्र्य नहीं है; तो फिर अमुक प्रकारसे बुद्धिको शुद्ध करना चाहिये, अमुक कार्य करना चाहिये, अमुक नहीं करना चाहिये, अमुक धर्म्य है, अमुक अधर्म्य, इत्यादि विधिनिषेध-शास्त्रके सब झगड़ेभी आप-ही-आप मिट जायेंगे (वे. सू. २. ३. ३३); * और तब परंपरासे या प्रत्यक्ष रीतिसे महामाया प्रकृतिके दासत्वमें सदैव रहनाही मनुष्यका पुरुषार्थ हो जायगा। अथवा पुरुषार्थही काहेका? अपने बसकी बात हो, तो पुरुषार्थ ठीक है; परंतु जहाँ एक रत्तीभरभी अपनी सत्ता या इच्छा नहीं रह जाती, वहाँ दास्य और परतंत्रताके सिवा और होही क्या सकता है। हलमें जुते हुए बैलोंके समान सब लोगोंको प्रकृतिकी आज्ञामें रहकर, एक आधुनिक कविके कथनानुसार 'पदार्थ- धर्मोंकी शृंखलाओंसे' बँध जाना चाहिये। हमारे भारतवर्षमें कर्मवाद या दैववादसे और पश्चिमी देशोंमें पहले पहल ईसाई धर्मके भवितव्यवादसे तथा अर्वाचीन कालमें शुद्ध आधिभौतिक शास्त्रोंके सृष्टिक्रमवादसे इच्छा-स्वातंत्र्यके इस विषयकी ओर पंडितोंका ध्यान आकर्षित हो गया है; और इसकी बहुत-कुछ चर्चा हो चुकी है और आजभी हो रही है। परंतु यहाँ पर उसका वर्णन करना असंभव है, इसलिये इस प्रकरणमें यही बतलाया जायगा कि वेदान्तशास्त्र और भगवद्गीताने इस प्रश्नका क्या उत्तर दिया है। यह सच है, कि कर्म-प्रवाह अनादि है; और और जब एक बार कर्मका चक्र शुरू हो जाता है, तब परमेश्वरभी उसमें हस्तक्षेप नहीं करता। तथापि अध्यात्म- शास्त्रका यह सिद्धान्त है, कि दृश्य सृष्टि केवल नामरूप या कर्मही नहीं है; किंतु इस नामरूपात्मक आवरणके लिये आधारभूत एक आत्मरूपी, स्वतंत्र और अविनाशी ब्रह्मसृष्टि है; तथा मनुष्यके शरीरका आत्मा उस नित्य एवं स्वतंत्र परब्रह्महीका अंश है। इस सिद्धान्तकी सहायतासे प्रत्यक्षमें अनिवार्य दीखनेवाली उक्त अड़चन- सेभी छुटकारा पानेके लिये हमारे शास्त्रकारोंका निश्चित किया हुआ एक मार्ग है। परंतु इसका विचार करनेके पहले कर्मविपाक-क्रियाके शेष अंशका वर्णन पूरा कर
- वेदान्तसूत्रके इस अधिकरणको 'जीवकर्तृत्वाधिकरण' कहते हैं। उसका पहलाही सूत्र है- "कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् " अर्थात् विधिनिषेध शास्त्रमें अर्थ-तत्त्व होनेके लिये जीवको कर्ता मानना चाहिये। पाणिनीके 'स्वतंत्रः कर्ता' (पा. १. ४ ५४) सूत्रके 'कर्ता' शब्दसेही आत्मस्वातंत्र्यका बोध होता है; और इससे मालूम होता है, कि यह अधिकरण इसी विषयका है।