श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २७३
लेना चाहिये । “जो जस करै सो तस फल चाखा” यानी - “जैसी करनी वैसी भरनी” - यह नियम न केवल एकही व्यक्तिके लिये; किंतु कुटुंब, जाति, राष्ट्र और समस्त संसारके लियेभी उपयुक्त होता है । और चूंकि प्रत्येक मनुष्यका किसीन- किसी कुटुंब, जाति, अथवा देशमें समावेश हुआही करता है; इसलिये उसे स्वयं अपने कर्मोंके साथ-साथ कुटुंब आदिके सामाजिक कर्मोंके फलोंकोभी अंशतः भोगना पड़ता है। परंतु व्यवहारमें प्रायः एक मनुष्यके कर्मोंकाही विवेचन करनेका प्रसंग आया करता है - इसलिये कर्मविपाक-प्रक्रियामें कर्मके विभाग प्रायः एक मनुष्यकोही लक्ष्य करके किये जाते हैं । उदाहरणार्थ मनुष्यसे किये जानेवाले अशुभ कर्मोंके मनुजीने - कायिक, वाचिक और मानसिक इस प्रकार तीन भेद किये हैं । व्यभिचार, हिंसा और चोरी - इन तीनोंको कायिक; कटु, मिथ्या, ताना मारना और असंगत बोलना - इन चारोंको वाचिक; और पर-द्रव्याभिलाषा, दूसरोंका अहित-चिंतन और व्यर्थ आग्रह करना - इन तीनोंको मानसिक पाप कहते हैं । सब मिलाकर दस प्रकारके अशुभ या पापकर्म बतलाये गये हैं (मनु. १२. ५-७; महा. अनु. १३) और आगे इनके फलभी कहे गये हैं। परंतु ये भेद कुछ स्थायी नहीं हैं। क्योंकि इसी अध्यायमें सब कर्मोंके फिरभी - सात्त्विक, राजस, और तामस - तीन भेद किये गये हैं; और प्रायः भगवद्गीतामें दिये गये वर्णनके अनुसार इन तीनों प्रकारके गुणों या कर्मोंके लक्षणभी बतलाये गये हैं (गीता १४. ११-१५; १८. २३-२५; मनु. १२. ३१-३४) । परंतु कर्मविपाक-प्रकरणमें कर्मका जो सामान्यतः विभाग पाया जाता है; वह इन दोनोंसेभी भिन्न है, उसमें कर्मके संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण-ये तीन भेद किये जाते हैं। किसी मनुष्यके द्वारा इस क्षणतक किया गया जो कर्म है - चाहे वह इस जन्ममें किया गया हो या पूर्वजन्ममें - वह उसका संचित अर्थात् ‘एकत्रित’ कर्म कहा जाता है। इसी ‘संचित’का दूसरा नाम ‘अदृष्ट’ और मीमांसकोंकी भाषामें ‘अपूर्व’भी है। इन नामोंके देनेका कारण यह है, कि जिस समय कर्म या क्रिया की जाती है, उसी समयके लिये वह दृश्य रहती है और उस समयके बीत जानेपर वह क्रिया स्वरूपतः शेष नहीं रहती किंतु उसके सूक्ष्म अतएव अदृश्य अर्थात् अपूर्व और विलक्षण परिणामही बाकी रह जाते हैं (वे. सू. शां. भा. ३. २. ३९, ४०) । कुछभी हो; परंतु इसमें संदेह नहीं, कि इस क्षणतक जो जो कर्म किये गये होंगे, इन सबके परिणामोंके संग्रहकोही ‘संचित’, ‘अदृश्य’ या ‘अपूर्व’ कहते हैं। उन सब संचित कर्मोंको एकदम भोगना असंभव है। क्योंकि इनके परिणामोंसे कुछ परस्पर-विरोधी अर्थात् भले और बुरे, दोनों प्रकारके फल देनेवाले हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, कोई ‘संचित’ कर्म स्वर्गप्रद और कोई नरकप्रदभी होते हैं इसलिये इन दोनोंके फलोंको एकही समय भोगना संभव नहीं है-इन्हें एकके बाद एक भोगना पड़ता है। अतएव ‘संचित’मेंसे जितने कर्मोंके फलोंको भोगना पहले शुरू होता है, उतनेहीको ‘प्रारब्ध’ अर्थात् आरंभित ‘संचित’ गी. र. १८