भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 319

२७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कहते हैं । व्यवहारमें संचितके अर्थमेंही 'प्रारब्ध' शब्दका उपयोग किया जाता है; परंतु यह भूल है । शास्त्रदृष्टिसे यही प्रकट होता है, कि 'संचितके अर्थात् भूतपूर्व कर्मोंके संग्रहके एक छोटेभेदकोही 'प्रारब्ध' कहते हैं । 'प्रारब्ध कुछ समस्त'संचित नहीं है । संचितके जितने भागके फलोंका (कार्योंका) भोगना आरंभ हो गया हो, उतनाही प्रारब्ध है, और इसी कारणसे प्रारब्धका दूसरा नाम आरब्ध-कर्म है । प्रारब्ध और संचितके अतिरिक्त कर्मका क्रियमाण नामक एक और तीसरा भेद है । 'क्रियमाण' वर्तमानकालवाचक धातुसाधित शब्द है, और उसका अर्थ है - "जो कर्म अभी हो रहा है, अथवा जो कर्म अभी किया जा रहा है ।" परंतु वर्तमान समयमें हम जो कुछ करते हैं, वह प्रारब्ध कर्मकाही (अर्थात् संचित कर्मोंमेंसे जिन कर्मोंका भोगना शुरू हो गया है, उनकाही) परिणाम है; अतएव 'क्रियमाण'को कर्मका तीसरा भेद माननेके लिये हमें कोई कारण दीख नहीं पड़ता । हाँ, यह भेद दोनोंमें अवश्य किया जा सकता है, कि प्रारब्ध कारण है और क्रियमाण उसका फल अर्थात् कार्य है । परंतु कर्म-विपाक-प्रक्रियामें इस भेदका कुछ उपयोग नहीं हो सकता । संचितमेंसे जिन कर्मोंके फलोंका भोगना अभीतक आरंभ नहीं हुआ है, उनका - अर्थात् संचितमेंसे प्रारब्धको घटा देनेपर जो कर्म बाकी रह जायें, उनका - बोध करानेके लिये किसी दूसरे शब्दकी आवश्यकता है । इसलिये वेदान्तसूत्र (वे. सू. ४. १. १५)में प्रारब्धही-को प्रारब्ध-कर्म और जो प्रारब्ध नहीं हैं, उन्हें अनारब्ध-कार्य कहा है । हमारे मतानुसार संचित कर्मोंके इस रीतिसे प्रारब्ध-कार्य और अनारब्ध-कार्य - दो भेद करनाही शास्त्रदृष्टिसे अधिक युक्तिपूर्ण मालूम होता है । इसलिये 'क्रियमाण'को धातुसाधित वर्तमानकालवाचक न समझ- कर "वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा" इस पाणिनि-सूत्रके अनुसार (पा. ३. ३. १३१) भविष्यकालवाचक समझें, तो उसका अर्थ "जो आगे शीघ्रही भोगनेका है" - किया जा सकेगा; और तब 'क्रियमाण'काही अर्थ अनारब्ध-कार्य हो जायगा; एवं 'प्रारब्ध' तथा 'क्रियमाण' ये दो शब्द क्रमसे वेदान्तसूत्रके 'आरब्ध-कार्य' और 'अनारब्ध-कार्य' शब्दोंसे समानार्थक हो जायँगे । परंतु क्रियमाणका ऐसा अर्थ आजकल कोई नहीं करता; उसका अर्थ प्रचलित कर्मही लिया जाता है । इसपर यह आक्षेप है, कि ऐसा अर्थ लेनेसे प्रारब्धके फलकोही क्रियमाण कहना पड़ता है; और जो कर्म अनारब्ध-कार्य हैं, उनका बोध करानेके लिये संचित, प्रारब्ध तथा क्रियमाण, इन तीनों शब्दोंमें कोईभी शब्द पर्याप्त नहीं होता । इसके अतिरिक्त क्रियमाण शब्दके रूढार्थको छोड़ देनाभी अच्छा नहीं है । इसलिये कर्म-विपाक-प्रक्रियामें संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण कर्मके इन लौकिक भेदोंको न मानकर हमने उसके अनारब्ध- कार्य और आरब्ध-कार्यसे ये दोही वर्ग किये हैं; और येही शास्त्रदृष्टिसेभी सुभीतेके हैं । 'भोगना' क्रियाके कालकृत तीन भेद होते हैं - जो भोगा जा चुका है (भूत), जो भोगा जा रहा है (वर्तमान) और जिसे आगे भोगना है (भविष्य) । परंतु