श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २७५ कर्म-विपाक-क्रियामें इस प्रकार कर्मके तीन भेद नहीं हो सकते, क्योंकि संचितमेंसे जो कर्म प्रारब्ध होकर भोगे जाने हैं, उनके फल फिरभी संचितहीमें जा मिलते हैं। इसलिये कर्म-भोगका विचार करते समय संचितके येही दो भेद हो सकते हैं - (१) वे कर्म, जिनका भोगना शुरू हो गया है अर्थात् प्रारब्ध; और (२) जिनका भोगना शुरू नहीं हुआ है अर्थात् अनारब्ध। इन दो भेदोंसे अधिक भेद करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार सब कर्मोंके फलोंका द्विविध वर्गीकरण करके उनके उपभोगके संबंधमें कर्म-विपाक-प्रक्रिया यह बतलाती है, कि संचितही कुल भोग्य है। इनमेंसे जिन कर्म-फलोंका उपभोग आरंभ होनेसे यह शरीर या जन्म मिला है, अर्थात् संचितमेंसे जो कर्म प्रारब्ध हो गये हैं; उन्हें भोगे बिना छुटकारा नहीं है - "प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षयः।" जब एक बार हाथसे बाण छूट जाता है, तब वह लौटकर आ नहीं सकता; अंततक चलाही जाता है; अथवा जब एक बार कुम्हारका चक्र घुमा दिया जाता है तब उसकी गतिका अंत होनेतक वह घूमताही रहता है; ठीक इसी तरह 'प्रारब्ध'कर्मोंकी - अर्थात् जिनके फलका भोग होना शुरू हो गया है, उनकीभी - अवस्था होती है। जो शुरू हो गया है, उसका अंत होनाही चाहिये, इसके सिवा दूसरी गति नहीं है। परंतु अनारब्ध-कार्य-कर्मका ऐसा हाल नहीं है - इन सब कर्मोंका ज्ञानसे पूर्णतया नाश किया जा सकता है। प्रारब्ध-कार्य और अनारब्ध-कार्यमें जो यह महत्त्वपूर्ण भेद है, उसके कारण ज्ञानी पुरुषको ज्ञान होनेके बादभी नैसर्गिक रीतिसे मृत्यु होनेतक - अर्थात् जन्मके साथही प्रारब्ध हुए कर्मोंका अंत होनेतक - शांतिके साथ राह देखनी पड़ती है। ऐसा न करके यदि वह हठसे देहत्याग करे, तो ज्ञानसे उसके अनारब्ध-कर्मोंका क्षय हो जानेपरभी उसके हठसे देहारंभक प्रारब्ध-कर्मोंका भोग अपूर्ण रह जायगा, जिन्हें भोगनेके लिये उसे फिरभी जन्म लेना पड़ेगा; एवं उसके मोक्षमेंभी बाधा आ जायगी - यह वेदान्त और सांख्य, दोनो शास्त्रोंका निर्णय है (वे. सू. ४. १. १३-१५; तथा सां. का. ६७)। उक्त बाधाके सिवा हठसे आत्महत्या करना एक नया ही कर्म हो जायगा; और उसके फल भोगनेके लिये नया जन्म लेनेकी फिरभी आवश्यकता होगी। इससे साफ़ जाहिर होता है, कि कर्मशास्त्रकी दृष्टिसेभी आत्महत्या करना मूर्खताही है। कर्मफल-भोगकी दृष्टिसे कर्मके भेदोंका वर्णन हो चुका। अब इसका विचार किया जायगा, कि कर्मबंधनसे छुटकारा कैसे अर्थात् किस युक्तिसे हो सकता है? पहली युक्ति कर्मवादियोंकी है। ऊपर बतलाया जा चुका है, कि अनारब्ध-कार्यभविष्यमें भुगते जानेवाले संचित कर्मोंको कहते हैं - फिर इन कर्मोंको चाहे इसी जन्ममें भोगना पड़े या उसके लिये औरभी दूसरे जन्म लेने पड़ें। परंतु इस अर्थकी ओर ध्यान न दे कर कुछ मीमांसकोंने कर्मबंधनसे मुक्त होकर मोक्ष पानेका अपने मतानुसार सहज मार्ग ढूंढ निकाला है। तीसरे प्रकरणमें कहे अनुसार, मीमांसकोंकी दृष्टिसे समस्त कर्मोंके नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध ऐसे चार भेद होते हैं। इनमेंसे संध्या