श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि नित्यकर्मोंको न करनेसे पाप लगता है; और नैमित्तिक कर्म तभी करने पड़ते ह, कि जब उनके लिये कोई निमित्त उपस्थित हो। इसलिये मीमांसकोंका कहना है, कि इन दोनों कर्मोंको करनाही चाहिये । बाकी रहे काम्य और निषिद्ध कर्म । इनमेंसे निषिद्ध कर्म करनेसे पाप लगता है, इसलिये नहीं करने चाहिये; और काम्य कर्मोंको करनेसे उसके फलोंको भोगनेके लिये फिरभी जन्म लेना पड़ता है, इसलिये उन्हेंभी नहीं करना चाहिये । इस प्रकार भिन्न भिन्न कर्मोंके परिणामोंके तारतम्यका विचार करके यदि मनुष्य कुछ कर्मोंको छोड़ दे और कुछ कर्मोंको शास्त्रोक्त रीतिसे करता रहे, तो वह आप-ही-आप मुक्त हो जायगा । क्योंकि इस जन्ममें प्रारब्ध कर्मोंका उपभोग कर लेने-से, उनका अंत हो जाता है - और इस जन्ममें सब नित्य- नैमित्तिक कर्मोंको करते रहनेसे तथा निषिद्ध कर्मोंसे बचते रहनेसे नरकमें नहीं जाना पड़ता; एवं काम्य कर्मोंको छोड़ देनेसे स्वर्ग आदि सुखोंके भोगनेकीभी आवश्यकता नहीं रहती । और जब इहलोक, नरक और स्वर्ग, ये तीनों गतियाँ इस प्रकार छूट जाती है, तब आत्माके लिये मोक्षके सिवा कोई दूसरी गतिही नहीं रह जाती । इस वादको 'कर्ममुक्ति' या 'नैष्कर्म्य-सिद्धि' कहते हैं । कर्म करनेपरभी जो न करनेके समान हो अर्थात् जब किसी कर्मके पाप-पुण्यका बंधन कर्ताको नहीं हो सकता, तब उस स्थितिको 'नैष्कर्म्य' कहते हैं। परंतु वेदांतशास्त्रमें निश्चय किया गया है, कि मीमांसकोंकी उक्त युक्तिसे यह 'नैष्कर्म्य' पूर्ण रीतिसे नहीं सध सकता (वे. सू. शां. भा. ४. ३ १४) ; और इसी अभिप्रायसे गीताभी कहती है. कि "कर्म न करनेसे नैष्कर्म्य नहीं होता; और छोड़ देनेसे सिद्धिभी नहीं मिलती" (गीता. ३. ४) । धर्मशास्त्रोंमें कहा गया है, कि पहले तो सब निषिद्ध कर्मोंका त्याग करनाही असंभव है और यदि कोई निषिद्ध कर्म हो जाता है, तो केवल नैमित्तिक प्रायश्चित्तसे उसके सब दोषोंका नाशभी नहीं होता । अच्छा; यदि मान लें, कि उक्त बात संभव है, तोभी मीमांसकोंके इस कथनमेंही सत्यांश नहीं दीख पड़ता, कि "प्रारब्ध कर्मोंको भोगनेसे तथा इस जन्ममें किये जानेवाले कर्मोंको उक्त युक्तिके अनुसार करने या न करने सब 'संचित' कर्मोंका संग्रह समाप्त हो जाता है" क्योंकि दो 'संचित' कर्मोंके फल परस्पर-विरोधी - उदाहरणार्थ, एकका फल स्वर्ग-सुख तथा दूसरेका फल नरक- यातना - हों, तो उन्हें एकही समयमें और एकही स्थलमें भोगना असंभव है। इस- लिये इसी जन्ममें 'प्रारब्ध' हुए कर्मोंसे तथा इसी जन्ममें किये जानेवाले कर्मोंसे सब संचित' कर्मोंके फलोंका भोगना पूरा नहीं हो सकता । महाभारतमें पराशरगीतामें कहा है:- कदाचित्सुकृतं तात कूटस्थमिव तिष्ठति । मज्जमानस्य संसारे यावद्दुःखाहिमुच्यते ॥ "कभी कभी मनुष्यके सांसारिक दुःखोंसे छूटनेतक उसका पूर्वकालमें किया गया पुण्य (उसे अपना फल देनेकी राह देखता हुआ) चुपचाप बैठा रहता है"