श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( मभा. शां. २९०. १७ ) ; और यही संचित पाप-कर्मोंकोभी लागू है। इस प्रकार संचित कर्मोपभोग एकही जन्ममें चुक जाता; किंतु संचित कर्मोंका एक भाग अर्थात् अनारब्ध-कार्य हमेशा बचाही रहता है, और इस जन्मके सब कर्मोंको यदि उपर्युक्त युक्तिसे करते रहें, तोभी बचे हुये अनारब्ध-कार्य संचितोंको भोगनेके लिये पुनः जन्म लेनाही पड़ता है। इसीलिये वेदान्तका सिद्धान्त है, कि मीमांसकोंकी उपर्युक्त सरल मोक्ष-युक्ति खोटी तथा भ्रांतिमूलक है। कर्मबंधनसे छूटनेका यह मार्ग किसीभी उपनिषदमें नहीं बतलाया गया है। यह केवल तर्कके आधारसे स्थापित किया गया है; परंतु यह तर्कभी अंततक नहीं टिकता । सारांश, कर्मके द्वारा कर्मसे छुटकारा पानेकी आशा रखना वैसेही व्यर्थ है जैसे एक अंधा दूसरे अंधेको रास्ता दिखलाकर पारकर दे ! अच्छा; अब यदि मीमांसकोंकी इस युक्तिको मंजूर न करें; और कर्मके बंधनोंसे छुटकारा पानेके लिये सब कर्मोंको आग्रहपूर्वक छोड़कर निरुद्योगी बन बैठें, तोभी काम नहीं चल सकता; क्योंकि अनारब्ध-कर्मोंके फलोंका भोगना तो बाकीही रहता है; और इसके साथ कर्म छोड़नेका आग्रह तथा चुपचाप बैठे रहना दोनों तामस कर्म हो जाते हैं; एवं इन तामस कर्मोंके फलोंको भोगनेके लिये फिरभी जन्म लेनाही पड़ता है ( गीता १८. ७, ८ ) । इसके सिवा गीतामें अनेक स्थलोंपर यहभी बतलाया गया है, कि जबतक शरीर है, तबतक श्वासोच्छ्वास, सोना, बैठना इत्यादि कर्म होतेही रहते हैं। इस लिये सब कर्मोंको छोड़ देनेका आग्रहभी व्यर्थही है- यथार्थमें इस संसारमें कोई क्षणभरके लियेभी कर्म करना छोड़ नहीं सकता ( गीता ३. ५; १८. ११ ) । कर्म चाहे भला हो या बुरा, परंतु उसका फल भोगनेके लिये मनुष्यको एक न एक जन्म लेकर हमेशा तैयार रहना चाहिये। कर्म अनादि है, और उसके अखंड व्यापारमें परमेश्वरभी हस्तक्षेप नहीं करता । सब कर्मोंको छोड़ देना संभव नहीं है, और मीमांसकोंके कथनानुसार कुछ कर्मोंको करनेसे और कुछ कर्मोंको छोड़ देनेसेभी कर्मबंधनसे छुटकारा नहीं मिल सकता - इत्यादि बातोंके सिद्ध हो जानेपर [यह पहला प्रश्न फिरभी उत्पन्न होता है, कि कर्मात्मक नामरूपके विनाशी चक्रमे छूट जाने एवं उसके मूलमें रहनेवाले अमृत तथा अविनाशी तत्त्वमें मिल जानेकी मनुष्यको जो स्वाभाविक इच्छा होती है, उसकी तृप्ति करनेका कौनसा मार्ग है ? वेद और स्मृतिग्रंथोंमें यज्ञयाग आदि पारलौकिक कल्याणके अनेक साधनोंका वर्णन है, परंतु मोक्षशास्त्रकी दृष्टिसे ये सब कनिष्ठ श्रेणीके हैं। क्योंकि यज्ञयाग आदि पुण्यकर्मोंके द्वारा स्वर्गप्राप्ति हो जाती है, परंतु जब उन पुण्य-कर्मोंके फलोंका अंतहो जाता है तब - चाहे दीर्घकालमेंही क्यों न हो- कभी न कभी इस कर्मभूमिमें फिर लौट कर आनाही पड़ता है ( मभा. वन. २५९, २६०; गीता ८. २५, ९. २० ) । इससे स्पष्ट हो जाता है, कि कर्मके पंजेसे बिलकुल छूटकर अमृतत्वमें मिल जानेका और जन्म-मरणकी झंझटको सदाके लिये दूर कर देनेका यह सच्चा मार्ग नहीं है। इस