भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 323

२७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र झंझटको सदाके लिये दूर करनेका अर्थात् मोक्षप्राप्तिका अध्यात्मशास्त्र कथनानुसार 'ज्ञान'ही एक सच्चा मार्ग है। 'ज्ञान' शब्दका अर्थ व्यवहार-ज्ञान या नाम-रूपात्मक सृष्टिशास्त्रका ज्ञान नहीं है, किंतु यहाँ उसका अर्थ ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान है। इसीको 'विद्या'भी कहते हैं, और इस प्रकरणके आरंभमें “कर्मणा बध्यते जंतुः विद्यया तु प्रमुच्यते” - कर्मसेही प्राणी बाँधा जाता है, और विद्यासे उसका छुटकारा होता है - यह जो वचन दिया गया है, उसमें 'विद्या'का अर्थ 'ज्ञान'ही विवक्षित है, गीतामें भगवानने अर्जुनसे कहा है, कि :- ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन “ज्ञानरूप अग्निसे सब कर्म भस्म हो जाते हैं” (गीता ४. ३७)। और दोन स्थलोंपर महाभारतमेंभी कहा गया है, कि :- बीजान्यग्न्युपदग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः । ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मा सम्पद्यते पुनः ॥ “भूना हुआ बीज जैसे उग नहीं सकता, वैसेही जब ज्ञानसे (कर्मके) क्लेश दग्ध हो जाते हैं, तब वे आत्माको पुनः प्राप्त नहीं होते” (मभा. वन. १९९. १०६, १०७; शां. २११. १७)। उपनिषदोंमेंभी इसी प्रकार ज्ञानकी महत्ता बतलानेवाले अनेक वचन हैं। जैसे - “य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति।” (बृ. १. ४. १०) - जो यह जानता है, कि मैंही ब्रह्म हूँ, वही अमृत ब्रह्म होता है। जिस प्रकार कमलपत्रमें पानी चिपक नहीं सकता, उसी प्रकार जिसे ब्रह्मज्ञान हो गया है, उसे कर्म दूषित नहीं कर सकते (छां. ४. १४. ३)। ब्रह्म जाननेवालेको मोक्ष मिलता है (तै. २. १)। जिसे यह मालूम हो चुका है, कि सब कुछ आत्ममय है, उसे पाप नहीं लग सकता (बृ. ४. ४. २३)। “ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः” (श्वे. ५. १३; ६. १३) - परमेश्वरका ज्ञान होनेपर सब पाशोंसे मुक्त हो जाता है। “क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे” (मु. २. २. ८) परब्रह्मका ज्ञान होनेपर सब कर्मोंका क्षय हो जाता है। “विद्ययामृतमश्नुते” (ईशा. ११. मैत्र्यु. ७. ९) - विद्यासे अमृतत्व मिलता है। “तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय” (श्वे. ३. ८) - परमेश्वरको जान लेनेसे अमरत्व मिलता है; इसको छोड़ मोक्षप्राप्तिका दूसरा मार्ग नहीं है। और शास्त्रदृष्टिसे विचार करने- परभी यही सिद्धान्त दृढ होता है। क्योंकि दृश्य सृष्टिमें जो कुछ है, वह सब यद्यपि कर्ममय है, तथापि इस सृष्टिके आधारभूत परब्रह्मकीही वह सब लीला है; इसलिये यह स्पष्ट है, कि कोईभी कर्म परब्रह्मको बाधा नहीं दे सकते - अर्थात् सब कर्मोंको करकेभी परब्रह्म अलिप्तही रहता है। इस प्रकरणके आरंभमें बतलाया जा चुका है, कि अध्यात्मशास्त्रके अनुसार इस संसारके सब पदार्थोंके कर्म (माया) और ब्रह्म, ये दोही वर्ग होते हैं। इससे यही प्रकट होता है, कि इनमेंसे किसी एकवर्गसे अर्थात् कर्मसे छुटकारा पानेकी इच्छा हो, तो मनुष्यको दूसरे वर्गमें अर्थात् ब्रह्मस्वरूपमें