भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 324

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २७९

प्रवेश करना चाहिये, इसके सिवा और दूसरा मार्ग नहीं है। क्योंकि जब सब पदार्थोंके केवल दोही वर्ग होते हैं, तब कर्मसे मुक्त अवस्था सिवा ब्रह्मस्वरूपके और कोई शेष नहीं रह जाती। परंतु ब्रह्मस्वरूपकी इस अवस्थाको प्राप्त करनेके लिये स्पष्ट रूपसे यह जान लेना चाहिये, कि ब्रह्मका स्वरूप क्या है ? नहीं तो करने चलेंगे एक और होगा कुछ दूसराही । "विनायकं प्रकुर्वाणो रचयामास वानरम् " - मूर्ति तो गणेशकी बनानी थी; परंतु ( वह न बन कर ) बन गई बंदरकी ! ठीक यही दशा होगी। इसलिये अध्यात्मशास्त्रके युक्तिवादसेभी यही सिद्ध होता है, कि ब्रह्मस्वरूपका ज्ञान ( अर्थात् ब्रह्मात्मैक्यका तथा ब्रह्मकी अलिप्तताका ज्ञान ) प्राप्त करके उसे मृत्युपर्यंत स्थिर रखनाही कर्मपाशसे मुक्त होनेका सच्चा मार्ग है। गीतामें भगवान्नेभी यही कहा है, कि "कर्मोंमें मेरी कुछभी आसक्ति नहीं है; इसलिये मुझे कर्मकी बाधा नहीं होती; और जो इस तत्त्वको समझ जाता है, वह कर्मपाशसे मुक्त हो जाता है। " ( गीता ४. १४ तथा १३. २३ ) । स्मरण रहे, कि यहाँ 'ज्ञान'का अर्थ केवल शाब्दिक ज्ञान या केवल मानसिक क्रिया नहीं है; किंतु वेदान्तसूत्रके शांकरभाष्यके आरंभहीमें कहे अनुसार हर समय और प्रत्येक स्थानमें उसका अर्थ " पहले मान- सिक ज्ञान होनेपर और फिर इंद्रियोंपर जय प्राप्तकर लेनेपर ब्रह्मभूत होनेकी अवस्था या ब्राह्मी स्थितिही है। " पिछले प्रकरणके अंतमें ज्ञानके संबंधमें अध्यात्म- शास्त्रका यही सिद्धान्त बतलाया गया है और महाभारतमेंभी जनकने सुलभासे कहा है, कि "ज्ञानेन कुरुते यत्नं यत्नेन प्राप्यते महत् " - ज्ञान अर्थात् मानसिक क्रिया- रूपी ज्ञान हो जानेपर मनुष्य यत्न करता है; और यत्नके इस मार्गसेही अंतमें उसे महत्त्व ( परमेश्वर ) प्राप्त हो जाता है ( शां. ३२०. ३० ) । अध्यात्मशास्त्र इतनाही बतला सकता है, कि मोक्षप्राप्तिके लिये किस मार्गसे और कहाँ जाना चाहिये - इससे अधिक वह और कुछ नहीं बतला सकता। शास्त्रसे ये बातें जानकर प्रत्येक मनुष्यको शास्त्रोक्त मार्गपर स्वयंही चलना चाहिये । और उस मार्गमें जो काँटे या बाधाएँ हों, उन्हें निकालकर अपना रास्ता खुद साफ़कर लेना चाहिये; एवं उसी मार्गपर चलते हुए स्वयं; अपने प्रयत्नसेही अंतमें ध्येयवस्तुकी प्राप्ति कर लेनी चाहिये। परंतु यह प्रयत्नभी पातंजलयोग, अध्यात्मविचार, भक्ति, कर्मफलत्याग इत्यादि अनेक प्रकारसे किया जा सकता है ( गीता १२. ८-१२ ), और इस कारण मनुष्य बहुधा उलझनमें फँस जाता है। इसीलिये गीतामें पहले निष्काम कर्मयोगका मुख्य मार्ग बतलाया गया है, और उसकी सिद्धिके लिये छठें अध्यायमें यम-नियम- आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधिरूप अंगभूत साधनोंकाभी वर्णन किया गया है, तथा सातवें अध्यायसे आगे यह बतलाया है, कि कर्मयोगका आचरण करते रहनेसेही परमेश्वरका ज्ञान अध्यात्मविचार-द्वारा अथवा ( इससेभी सुलभ रीतिसे ) भक्तिमार्ग-द्वारा हो जाता है ( गीता १८. ५६ ) ।