भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 325

२८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्मबंधनसे छुटकारा पानेके लिये कर्म छोड़ देना कोई उचित मार्ग नहीं है; किंतु ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानसे बुद्धिको शुद्ध रखके परमेश्वरके समान आचरण करते रहनेसेही अंतमें मोक्ष मिलता है। कर्मको छोड़ देना भ्रम है, क्योंकि कर्म किसीसे छूट नहीं सकता - इत्यादि बातें यद्यपि अब निर्विवाद सिद्ध हो गई हैं, तथापि यह पहला प्रश्न फिरभी उठता है, कि इस मार्गमें सफलता पानेके लिये आवश्यक ज्ञानप्राप्तिका जो प्रयत्न करना पड़ता है, वह मनुष्यके वसकी बात है ? अथवा नामरूप कर्मात्मक प्रकृति जिधर खींचे, उधरही उसे चले जाना चाहिये ? गीतामें भगवान् कहते हैं, कि “ प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति । ” ( गीता ३. ३३ ) - निग्रहसे क्या होगा; प्राणिमात्र अपनी अपनी प्रकृतिके अनुसारही चलते हैं। “ मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ” - तेरा निश्चय व्यर्थ है; जिधर तू न चाहेगा, उधर तेरी प्रकृति तुझे खींच लेगी ( गीता १८. ५९; २. ६० ) ; और मनुजी कहते हैं, कि “ बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ” ( मनु. २. २१५ ) - विद्वानोंकोभी इंद्रियाँ अपने वशमें कर लेती हैं। कर्म-विपाक-प्रक्रियाकाभी निष्कर्ष यही है। क्योंकि जब ऐसा मान लिया जाय, कि मनुष्यके मनकी सब प्रेरणाएँ पूर्वकर्मोंसेही उत्पन्न होती हैं, तब तो यही अनुमान करना पड़ता है, कि उसे एक कर्मसे दूसरे कर्ममे अर्थात् सदैव भवचक्रमेंही रहना चाहिये। अधिक क्या कहें ? कर्मसे छुटकारा पानेकी प्रेरणा और कर्म, दोनों बातें परस्पर-विरुद्ध हैं। और यदि यह सत्य है तो यह आपत्ति आ पड़ती है, कि ज्ञान प्राप्त करनेके लिये कोईभी मनुष्य स्वतंत्र नहीं है। इस विषयका विचार अध्यात्मशास्त्रमें इस प्रकार किया गया है, कि नामरूपात्मक सारी दृश्य सृष्टिका आधारभूत जो तत्त्व है, वही मनुष्यकी जड़ देहमेंभी आत्मरूपसे निवास करता है; इससे मनुष्यके कृत्योंका विचार देह और आत्मा, दोनोंकी दृष्टिसे करना चाहिये। इनमेंसे आत्मस्वरूपी ब्रह्म मूलमें केवल एकही होनेके कारण कभीभी परतंत्र नहीं हो सकता। क्योंकि किसी एक वस्तुको दूसरेकी अधीनतामें होनेके लिये एकसे अधिक - कम-से-कम दो - वस्तुओंका होना नितान्त आवश्यक है। यहाँ नाम-रूपात्मक कर्मही वह दूसरी वस्तु है। परंतु यह कर्म अनित्य है; और मूलमें वह परब्रह्मकीही लीला है, जिससे निर्विवाद सिद्ध होता है, कि यद्यपि उसने परब्रह्मके एक अंशको आच्छादित कर लिया है, तथापि वह परब्रह्मको अपना दास कभीभी बना नहीं सकता। इसके अतिरिक्त यह पहलेही बतलाया जा चुका है, जो आत्मा कर्मसृष्टिके व्यापारोंका एकीकरण करके सृष्टिज्ञान उत्पन्न करता है, उसे कर्म- सृष्टिसे भिन्न अर्थात् ब्रह्मसृष्टिकाही होना चाहिये। इससे सिद्ध होता है, कि परब्रह्म और वस्तुतः उसीका अंश जो शारीर आत्मा, दोनों मूलतः स्वतंत्र अर्थात् कर्मात्मक प्रकृतिकी सत्तासे मुक्त हैं। इनमेंसे परमात्माके विषयमें मनुष्यको इससे अधिक ज्ञान नहीं हो सकता, कि वह अनंत, सर्वव्यापी, नित्य शुद्ध और मुक्त है। परंतु इस परमात्माहीके अंशरूप जीवात्माकी बात भिन्न है। यद्यपि वह मूलमें शुद्ध, मुक्त-