भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 326

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २८१ स्वभाव, निर्गुण तथा अकर्ता है, तथापि शरीर और बुद्धि आदि इंद्रियोंके बंधनमें फँसा होनेके कारण वह मनुष्यके मनमें जो स्फूर्ति उत्पन्न करता है, उसका प्रत्यक्षा- नुभवरूपी ज्ञान हमें हो सकता है। भाफ़का उदाहरण लीजिये। जब वह खुली जगहमें रहती है तब उसका कुछ बल नहीं होता; परंतु वह जब किसी बर्तनमें बंद कर दी जाती है, तब उसका दबाव उसी बर्तनपर जोरसे होता हुआ दीख पड़ने लगता है; ठीक इसी तरह जब परमात्माकाही अंशभूत जीव (गीता १५.७) अनादि पूर्वकमार्जित जड़ देह तथा इंद्रियोंके बंधनोंसे बद्ध हो जाता है, तब इस बद्धावस्थासे उसको मुक्त करनेके लिये (अर्थात् मोक्षानुकूल) कर्म करनेकी प्रवृत्ति देहेंद्रियोंमें होने लगती है; और इसीको व्यावहारिक दृष्टिसे 'आत्माकी स्वतंत्र प्रवृत्ति' कहते हैं। 'व्यावहारिक दृष्टिसे' कहनेका कारण यह है, कि शुद्ध मुक्तावस्थामें या 'तात्त्विक दृष्टिसे' आत्मा इच्छारहित तथा अकर्ता है और सब कर्तृत्व केवल प्रकृतिका है (गीता १३. २९; वे. सू. शां. भा. २. ३. ४०)। परंतु वेदान्ती लोग सांख्यमतकी भांति यह नहीं मानते, कि प्रकृतिही स्वयं मोक्षानुकूल कर्म किया करती है; क्योंकि ऐसा मान लेनेसे यह कहना पड़ेगा, कि जड़ प्रकृति अपने अंधेपनसे अज्ञानियोंकोभी मुक्त कर सकती है। और यहभी नहीं कहा जा सकता, कि जो आत्मा मूलहीमें अकर्ता है, वह स्वतंत्र रीतिसे- अर्थात् बिना किसी निमित्तके- अपने नैसर्गिक गुणोंसेही प्रवर्तक हो जाता है। इसलिये आत्म-स्वातंत्र्यके उक्त सिद्धान्तको वेदान्तशास्त्रमें इस प्रकार बतलाना पड़ता है, कि आत्मा यद्यपि मूलमें अकर्ता है, तथापि बंधनोंके निमित्तसे वह उतनेहीके लिये दिखाऊ प्रेरक बन जाता है; और जब यह आगंतुक प्रेरकता उसमें एक बार किसीभी निमित्तसे आ जाती है, तब वह कर्मके नियमोंसे भिन्न अर्थात् स्वतंत्रही रहती है। 'स्वतंत्र'का अर्थ निर्निमित्तक नहीं है; और आत्मा अपनी मूल शुद्धावस्थामें कर्ताभी नहीं रहता। परंतु बार बार इस लंबीचौड़ी कर्मकथाको बतलाते न रहकर इसीको संक्षेपमें आत्माकी स्वतंत्र प्रवृत्ति या प्रेरणा कहनेकी परिपाठी हो गई है। बंधनमें पड़नेके कारण आत्माके द्वारा इंद्रियोंको मिलनेवाली इस स्वतंत्र प्रेरणामें और बाह्यसृष्टि- के पदार्थोंके संयोगसे इंद्रियोंमें उत्पन्न होनेवाली प्रेरणामें बहुत भिन्नता है। खाना, पीना, चैन करना-ये सब इंद्रियोंकी प्रेरणाएँ हैं; और आत्माकी प्रेरणा मोक्षा- नुकूल कर्म करनेके लिये हुआ करती है। पहली प्रेरणा केवल बाह्य अर्थात् कर्म- सृष्टिकी है। परंतु दूसरी प्रेरणा आत्माकी अर्थात् ब्रह्मसृष्टिकी है। और ये दोनों प्रेरणाएँ प्रायः परस्स्पर-विरोधी हैं, जिससे इनके झगड़ेमेंही मनुष्यकी सब आयु बीत जाती है। इनके झगड़ेके समय जब मनमें संदेह उत्पन्न होता है, तब कर्मसृष्टिकी प्रेरणाको न मानकर (भाग. ११. १०. ४) यदि मनुष्य शुद्धात्माकी स्वतंत्र प्रेरणाके अनुसार चलने लगे- और इसीको सच्चा आत्मज्ञान या आत्मनिष्ठा कहते हैं- तो इसके सब व्यवहार स्वभावतः मोक्षानुकूलही होंगे। और अंतमें :-