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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २८१ स्वभाव, निर्गुण तथा अकर्ता है, तथापि शरीर और बुद्धि आदि इंद्रियोंके बंधनमें फँसा होनेके कारण वह मनुष्यके मनमें जो स्फूर्ति उत्पन्न करता है, उसका प्रत्यक्षा- नुभवरूपी ज्ञान हमें हो सकता है। भाफ़का उदाहरण लीजिये। जब वह खुली जगहमें रहती है तब उसका कुछ बल नहीं होता; परंतु वह जब किसी बर्तनमें बंद कर दी जाती है, तब उसका दबाव उसी बर्तनपर जोरसे होता हुआ दीख पड़ने लगता है; ठीक इसी तरह जब परमात्माकाही अंशभूत जीव (गीता १५.७) अनादि पूर्वकमार्जित जड़ देह तथा इंद्रियोंके बंधनोंसे बद्ध हो जाता है, तब इस बद्धावस्थासे उसको मुक्त करनेके लिये (अर्थात् मोक्षानुकूल) कर्म करनेकी प्रवृत्ति देहेंद्रियोंमें होने लगती है; और इसीको व्यावहारिक दृष्टिसे 'आत्माकी स्वतंत्र प्रवृत्ति' कहते हैं। 'व्यावहारिक दृष्टिसे' कहनेका कारण यह है, कि शुद्ध मुक्तावस्थामें या 'तात्त्विक दृष्टिसे' आत्मा इच्छारहित तथा अकर्ता है और सब कर्तृत्व केवल प्रकृतिका है (गीता १३. २९; वे. सू. शां. भा. २. ३. ४०)। परंतु वेदान्ती लोग सांख्यमतकी भांति यह नहीं मानते, कि प्रकृतिही स्वयं मोक्षानुकूल कर्म किया करती है; क्योंकि ऐसा मान लेनेसे यह कहना पड़ेगा, कि जड़ प्रकृति अपने अंधेपनसे अज्ञानियोंकोभी मुक्त कर सकती है। और यहभी नहीं कहा जा सकता, कि जो आत्मा मूलहीमें अकर्ता है, वह स्वतंत्र रीतिसे- अर्थात् बिना किसी निमित्तके- अपने नैसर्गिक गुणोंसेही प्रवर्तक हो जाता है। इसलिये आत्म-स्वातंत्र्यके उक्त सिद्धान्तको वेदान्तशास्त्रमें इस प्रकार बतलाना पड़ता है, कि आत्मा यद्यपि मूलमें अकर्ता है, तथापि बंधनोंके निमित्तसे वह उतनेहीके लिये दिखाऊ प्रेरक बन जाता है; और जब यह आगंतुक प्रेरकता उसमें एक बार किसीभी निमित्तसे आ जाती है, तब वह कर्मके नियमोंसे भिन्न अर्थात् स्वतंत्रही रहती है। 'स्वतंत्र'का अर्थ निर्निमित्तक नहीं है; और आत्मा अपनी मूल शुद्धावस्थामें कर्ताभी नहीं रहता। परंतु बार बार इस लंबीचौड़ी कर्मकथाको बतलाते न रहकर इसीको संक्षेपमें आत्माकी स्वतंत्र प्रवृत्ति या प्रेरणा कहनेकी परिपाठी हो गई है। बंधनमें पड़नेके कारण आत्माके द्वारा इंद्रियोंको मिलनेवाली इस स्वतंत्र प्रेरणामें और बाह्यसृष्टि- के पदार्थोंके संयोगसे इंद्रियोंमें उत्पन्न होनेवाली प्रेरणामें बहुत भिन्नता है। खाना, पीना, चैन करना-ये सब इंद्रियोंकी प्रेरणाएँ हैं; और आत्माकी प्रेरणा मोक्षा- नुकूल कर्म करनेके लिये हुआ करती है। पहली प्रेरणा केवल बाह्य अर्थात् कर्म- सृष्टिकी है। परंतु दूसरी प्रेरणा आत्माकी अर्थात् ब्रह्मसृष्टिकी है। और ये दोनों प्रेरणाएँ प्रायः परस्स्पर-विरोधी हैं, जिससे इनके झगड़ेमेंही मनुष्यकी सब आयु बीत जाती है। इनके झगड़ेके समय जब मनमें संदेह उत्पन्न होता है, तब कर्मसृष्टिकी प्रेरणाको न मानकर (भाग. ११. १०. ४) यदि मनुष्य शुद्धात्माकी स्वतंत्र प्रेरणाके अनुसार चलने लगे- और इसीको सच्चा आत्मज्ञान या आत्मनिष्ठा कहते हैं- तो इसके सब व्यवहार स्वभावतः मोक्षानुकूलही होंगे। और अंतमें :-

२८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र विशुद्धधर्मा शुद्धेन बुद्धेन च स बुद्धिमान् ॥ विमलात्मा च भवति समेत्य विमलात्मना ॥ स्वतंत्रश्च स्वतंत्रेण स्वतंत्रत्वमवाप्नुते । “वह जीवात्मा या शारीर आत्मा - जो मूलमें स्वतंत्र है - ऐसे परमात्मामें मिल जाता है, जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध, निर्मल और स्वतंत्र है” (मभा. शां. ३०८. २७ -३०) । ऊपर जो कहा गया है, कि ज्ञानसे मोक्ष मिलता है. उसका यही अर्थ है। इसके विपरीत जब जड़ देहेंद्रियोंके प्राकृत धर्मकी - अर्थात् कर्मसृष्टिकी प्रेरणाकी - प्रबलता हो जाती है, तब मनुष्यकी अधोगति होती है। शरीरमें बँधे हुए जीवात्मामें, देहेंद्रियोंमें मोक्षानुकूल कर्म करनेकी तथा ब्रह्मात्मैक्यज्ञानसे मोक्ष प्राप्तकर लेनेकी, जो यह स्वतंत्र शक्ति है, उसकी ओर ध्यान देकरही भगवानने अर्जुनको आत्म-स्वातंत्र्य अर्थात् स्वावलंबनके तत्त्वका उपदेश किया है, कि :- उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ “ मनुष्यको चाहिये, कि वह अपना उद्धार आपही करे। निराशासे वह अपनी अवनति आपही न करे। क्योंकि प्रत्येक मनुष्य स्वयं अपना बंधु (हितकारी) है; और स्वयं अपना शत्रु (नाशकर्ता) है” (गीता ६.५); और इसी हेतुसे योगवासिष्ठमें (यो. २. सर्ग ४-८) दैवका निराकरण करके पौरुषके महत्त्वका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। जो मनुष्य इस तत्त्वको पहचान कर आचरण किया करता है, कि सब प्राणियोंमें एकही आत्मा है, उसके इसी आचरणको सदा- चरण या मोक्षानुकूल आचरण कहते हैं। और बद्ध जीवात्माकाभी यही स्वतंत्र धर्म है, कि ऐसे आचरणकी ओर देहेंद्रियोंको प्रवृत्त किया करे। इसी धर्मके कारण दुराचारी मनुष्यका अंतःकरणभी सदाचरणहीका पक्ष लिया करता है, जिससे उसे अपने किये हुए दुष्कर्मोंका पश्चात्ताप होता है। आधिदैवत पक्षके पंडित इसे सदसद्विवेक-बुद्धिरूपी देवताकी स्वतंत्र स्फूर्ति कहते हैं। परंतु तात्त्विक दृष्टिसे विचार करने पर विदित होता है, कि बुद्धींद्रिय जड़ प्रकृतिकीका विकार होनेके कारण स्वयं अपनीही प्रेरणासे कर्मके नियम-बंधनोंसे मुक्त नहीं हो सकती, यह प्रेरणा उसे कर्मसृष्टिके बाहरके आत्मासे प्राप्त होती है। इसी प्रकार पश्चिमी पंडितोंका 'इच्छा-स्वातंत्र्य' शब्दभी वेदान्तकी दृष्टिसे ठीक नहीं है ! क्योंकि इच्छा मनका धर्म है और आठवें प्रकरणमें कहा जा चुका है, कि बुद्धि तथा उसके साथ साथ मनभी कर्मात्मक जड़ प्रकृतिके असंवेद्य विकार हैं। इसलिये ये दोनों स्वयंही कर्मके बंधनसे छूट नहीं सकते । अतएव वेदान्तशास्त्रका निश्चय है, कि सच्चा स्वातंत्र्य न तो बुद्धिका है और न मनका-वह केवल आत्माका है। यह स्वातंत्र्य न तो कोई आत्माको देता है और न कोई उससे इसे छीनभी सकता है

  • स्वतंत्र परमात्माका अंशरूप जीवात्मा जब उपाधिके बंधनमें पड़ जाता है, तब

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २८३ वह स्वयं स्वतंत्र रीतिसे, ऊपर कहे अनुसार, बुद्धि तथा मनमें प्रेरणा किया करता है। अंतःकरणकी इस प्रेरणाका अनादर करके यदि कोई बर्ताव करेगा, तो तुकाराम महाराजके शब्दोंमें यही कहा जा सकता है, कि वह "स्वयं अपनेही पैरोंमें आप कुल्हाड़ी मारनेको तैयार हुआ है" (तु. गा. ४४४८)। भगवद्गीतामें इसी तत्त्वका उल्लेख यों किया गया है : "न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानम्" - जो स्वयं अपना घात आपही नहीं करता, उसे उत्तम गति मिलती है (गीता १३. २८); और दासबोधमेंभी इसीका स्पष्ट अनुवाद किया गया है (दा. बो. १७. ७. ७-१०)। यद्यपि मनुष्य कर्मसृष्टिके अभेद्य दिखाई देनेवाले नियमोंसे जकड़कर बँधा हुआ है तथापि स्वभावतः उसे ऐसा मालूम होता है, कि मैं इस परिस्थितिमेंभी अमुक कामको स्वतंत्र रीतिसे कर सकूँगा। अनुभवके इस तत्त्वकी उपपत्ति ऊपर कहे अनुसार ब्रह्मसृष्टिको जड़ सृष्टिसे भिन्न माने बिना किसीभी अन्य रीतिसे नहीं बतलाई जा सकती। इसलिये जो अध्यात्मशास्त्रको नहीं मानते, उन्हें इस विषयमें या तो मनुष्यके नित्य दासत्वको मानना चाहिये, या प्रवृत्ति-स्वातंत्र्यके प्रश्नको अगम्य समझकर योंही छोड़ देना चाहिये; उनके लिये कोई दूसरा मार्ग नहीं है। अद्वैत वेदान्तका यह सिद्धान्त है, कि जीवात्मा और परमात्मा मूलमें एकरूप हैं (वे. सू. शां. भा. २. ३. ४०), और इसी सिद्धान्तके अनुसार प्रवृत्ति-स्वातंत्र्य या इच्छा- स्वातंत्र्यकी उक्त उपपत्ति बतलाई गई है। परंतु जिन्हें यह अद्वैत मत मान्य नहीं है अथवा जो भक्तिके लिये द्वैतका स्वीकार किया करते हैं, उनका कथन है, कि जीवात्माकी यह सामर्थ्य स्वयं उसकी नहीं है; बल्कि यह उसे परमेश्वरसे प्राप्त होती है। तथापि "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः।" (ऋ. ४. ३३. ११) - थकने तक प्रयत्न करनेवाले मनुष्यके अतिरिक्त अन्योंकी देवता मदद नहीं करते -

  • ऋग्वेदके इस तत्त्वानुसार यह कहा गया है, कि जीवात्माको यह सामर्थ्य प्राप्त करा देनेके लिये पहले स्वयंही प्रयत्न करना चाहिये - अर्थात् आत्मप्रयत्नका या पर्यायसे आत्म-स्वातंत्र्यका तत्त्व फिरभी स्थिर बनाही रहता है (वे. सू. २. ३. ४१, ४२; गीता १०. ५, १०)। अधिक क्या कहें ? बौद्धधर्मी लोग आत्माका या परब्रह्मका अस्तित्व नहीं मानते और यद्यपि उनको ब्रह्मज्ञान तथा आत्मज्ञान मान्य नहीं है, तथापि उनके धर्मग्रंथोंमेंभी यही उपदेश किया गया है, कि "अत्तना (आत्मना) चोदयऽत्तानं" - अपने आपको स्वयं अपनेही प्रयत्नसे राहपर लगाना चाहिये। इस उपदेशका समर्थन करनेके लिये कहा गया है, कि :- अत्ता (आत्मा) हि अत्तनो नाथो अत्ता हि अत्तनो गति। तस्मा सञ्जयमऽत्तानं अस्सं (अश्वं) भद्रं व वाणिजो ॥ "हमही खुद अपने स्वामी या मालिक हैं, और अपने आत्माके सिवा हमें तारनेवाला दूसरा कोई नहीं है; इसलिये जिस प्रकार कोई व्यापारी अपने उत्तम घोड़ेका संयमन करता है, उसी प्रकार हमें अपना संयमन आपही भली भाँति करना चाहिये"

२८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (धम्मपद. ३८०); और गीताकी भांति आत्म-स्वातंत्र्यके अस्तित्व तथा उसकी आवश्यकताकाभी वर्णन किया गया है (महापरिनिव्वाण-सुत्त २. ३३-३५)। आधिभौतिक फ्रेंच पंडित कांटकीभी गणना इसी वर्गमें करनी चाहिये, क्योंकि यद्यपि वह किसी भी अध्यात्मवादको नहीं मानता, तथापि वह बिना किसी उपपत्तिका केवल प्रत्यक्षसिद्ध कह कर इस बातको अवश्य मानता है, कि प्रयत्नसे मनुष्य अपने आचरण और परिस्थितिको सुधार सकता है। यद्यपि यह सिद्ध हो चुका, कि कर्मपाशसे मुक्त होकर सर्वभूततान्तर्गत एक आत्माको पहचान लेनेकी जो आध्यात्मिक पूर्णावस्था है, उसे प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानही एकमात्र उपाय है, और इस ज्ञानको प्राप्त करलेना हमारे बसकी बात है; तथापि स्मरण रहे, कि यह स्वतंत्र आत्माभी अपनी छातीपर लदे हुए प्रकृतिके बोझको एकदम अर्थात् एकही क्षणमें अलग नहीं कर सकता। जैसे कोई कारीगर कितनाही कुशल क्यों न हो, परंतु वह हथियारोंके बिना कुछभी काम नहीं कर सकता और यदि हथियार खराब हों, तो उन्हें ठीक करनेमें उसका बहुत-सा समय नष्ट हो जाता है, वैसेही जीवात्माकाभी हाल है। ज्ञानप्राप्तिकी प्रेरणा करनेके लिये जीवात्मा स्वतंत्र तो अवश्य है, परंतु वह तात्त्विक दृष्टिसे मूलमें निर्गुण और केवल हे, अथवा सातवें प्रकरणमें बतलाये अनुसार नेत्रयुक्त परंतु लँगड़ा है। (मैत्र्यु. ३. २, ३; गीता १३. २०); इसलिये उक्त प्रेरणाके अनुसार आगे कर्म करनेके लिये जिन साधनोंकी आवश्यकता होती है (जैसे कुम्हारको चाककी आवश्यकता होती है); वे इस आत्माके पास स्वयं अपने नहीं होते - जो साधन उपलब्ध हैं - जैसे देह और बुद्धि आदि इंद्रियाँ - वे सब मायात्मक प्रकृतिके विकार हैं। अतएव जीवात्माको अपनी मुक्ति लियेभी प्रारब्धकर्मानुसार प्राप्त देहेंद्रिय आदि सामग्रीके (साधन या उपाधि) द्वाराही सब काम करना पड़ता है। इन साधनोंमें बुद्धि मुख्य है, इसलिये कोई काम करनेके लिये जीवात्मा पहले बुद्धिकोही प्रेरणा करता है। परंतु पूर्वकर्मानुसार और प्रकृतिके स्वभावानुसार यह कोई नियम नहीं, कि यह बुद्धि हमेशा शुद्ध तथा सात्विकही हो। इसलिये पहले त्रिगुणात्मक प्रकृतिके प्रपञ्चसे मुक्त हो कर यह बुद्धि अंतर्मुख, शुद्ध, सात्त्विक या आत्मनिष्ठ होनी चाहिये; अर्थात् यह बुद्धि ऐसी होनी चाहिये, कि जीवात्माकी प्रेरणाको माने, उसकी आज्ञाका पालन करे, और उन्हीं कर्मोंको करनेका निश्चय करे, जिनसे आत्माका कल्याण हो और ऐसा होनेके लिये दीर्घकाल तक वैराग्यका अभ्यास करना पड़ता है। इतना होनेपरभी भूख-प्यास आदि देह-धर्म और संचित कर्मोंके वे फल - जिनका भोगना आरंभ हो गया है - मृत्यु-समयतक छूटतेही नहीं हैं। तात्पर्य यह है, कि यद्यपि उपाधिबद्ध जीवात्मा देहेंद्रियोंको मोक्षानुकूल कर्म करनेकी मूल प्रेरणा करनेके लिये स्वतंत्र है, तथापि प्रकृतिहीके द्वारा चूंकि उसे सब काम कराने पड़ते हैं, इसलिये उतने भरके लिये (बढ़ई, कुम्हार आदि कारी-

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गरोंके समान ) वह पगबलवी हो जाता है, और उसे देहेंद्रिय आदि हथियारोंको पहले शुद्ध करके अपने अधिकारमें कर लेना पड़ता है ( वे. स. २. ३. ४० ) । यह काम एकदम नहीं हो सकता, इसे धीरे धीरे धैर्यसे करना करना चाहिये। नहीं तो चमकने और भड़कनेवाले घोड़ेके समान इंद्रियाँ बलवा करने लगेंगी और मनुष्यको धर दबावेंगी। इसीलिये भगवान्‌ने कहा है, कि इंद्रियनिग्रह करनेके लिये बुद्धिको धृति या धैर्यकी सहायता मिलनी चाहिये ( गीता ६. २५ ) और आगे अठारहवें अध्याय ( गीता १८. ३३-३५ ) में बुद्धिकी भाँति धृतिकेभी - सात्त्विक, राजस और तामस - तीन नैसर्गिक भेद बतलाये गये हैं। इनमेंसे तामस और राजसको छोड़कर बुद्धिको सात्त्विक बनानेके लिये इंद्रियनिग्रह करना पड़ता है। और इसीसे छठवें अध्यायमें इसका संक्षिप्त वर्णन किया है, कि ऐसे इंद्रियनिग्रहा- भ्यासरूप योगके लिये उचित स्थल, आसन और आहार कौन कौनसे हैं? इस प्रकार गीतामें (गीता ६. २५) बतलाया गया है, कि 'शनैः शनैः' अभ्यास करनेपर चित्त स्थिर हो जाता है, इंद्रियाँ वशमें हो जाती हैं और आगे कुछ समयके बाद ( एकदम नहीं ) ब्रह्मात्मैक्यज्ञान होता है; एवं फिर " आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय " - उस ज्ञानसे कर्मबंधन छूट जाता है ( गीता ४. ३८-४१ ) । परंतु भगवान् एकांतमे योगाभ्यास करनेका उपदेश देते हैं ( गीता ६. १० ), इससे गीताका तात्पर्य यह नहीं समझ लेना चाहिये, कि संसारके सब व्यवहारोंको छोड़ कर योगाभ्यासमेंही सारी आयु बिता दी जावे। जिस प्रकार कोई व्यापारी अपने पासकी पूँजीसेही - चाहे वह बहुत थोड़ीही क्यों न हो - पहले धीरे धीरे व्यापार करने लगता है; और धीरे धीरे उसीके द्वारा अंतमें अपार संपत्ति कमा लेता है, उसी प्रकार गीताके कर्मयोगकाभी हाल है। अपनेसे जितना हो सकता है, उतनाही इंद्रिय-निग्रह करके पहले कर्मयोगका आरंभ करना चाहिये और उसीसे अंतमें अधिकाधिक इंद्रिय-निग्रह-सामर्थ्य प्राप्त हो जाती है। तथापि चौराहेमें बैठ करभी योगाभ्यास करनेसे काम नहीं चल सकता, क्योंकि इससे बुद्धिकी एकाग्रताकी जो आदत हुई होगी, उसके घट जानेका भय होता है। इसलिये कर्म- योगका आचरण करते हुए, कुछ समयतक नित्य या कभी कभी एकान्तका सेवन करनाभी आवश्यक है ( गीता १३. १० ) । इसके लिये संसारके समस्त व्यवहारोंको छोड़ देनेका उपदेश भगवान्‌ने कहींभी नहीं दिया है, प्रत्युत सांसारिक व्यवहारोंको निष्काम बुद्धिसे करनेके लियेही इंद्रिय-निग्रहका यही अभ्यास बतलाया गया है; और गीताका यही कथन है, कि इस इंद्रिय-निग्रहके साथ साथ यथाशक्ति निष्काम- कर्मयोगकाभी आचरण प्रत्येक मनुष्यको हमेशा करते रहना चाहिये, पूर्ण इंद्रिय- निग्रहके सिद्ध होनेतक राह देखते बैठे नहीं रहना चाहिये। मैत्र्युपनिषद्में और महाभारतमें कहा गया है, कि यदि कोई मनुष्य बुद्धिमान् और निग्रही हो, तो वह इस प्रकारके योगाभ्याससे छः महीनोंमें साम्यबुद्धि प्राप्त कर सकता है ( मै. ६.

२८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र २८; महा. शां. २३९. ३२; अश्व. अनुगीता १०. ६६ )। परंतु भगवानने जिस सात्त्विक, सम या आत्मनिष्ठ बुद्धिका वर्णन किया है, वह बहुतेरे लोगोंको छः महिनोंमें क्या, पर-प्रकृति-स्वभावके अनुसार छः वर्षोंमेंभी प्राप्त नहीं हो सकती, और इस अभ्यासके अपूर्ण रह जानेके कारण इस जन्ममेंभी पूरी सिद्धि होगीही नहीं; इतनाही नहीं तो दूसरा जन्म लेकर फिर आरंभसे वही अभ्यास करना पड़ेगा; और उस जन्मका अभ्यासभी पूर्व-जन्मके अभ्यासकी भाँतिही अधूरा रह जायगा, इसलिये यह शंका उत्पन्न होती है, कि क्या ऐसे मनुष्यको पूर्ण सिद्धि कभी मिलही नहीं सकती ? फलतः ऐसा मालूम होने लगता है. कि कर्मयोगका आचरण करनेके पूर्व पातंजलयोगकी सहायतासे पूर्ण निर्विकल्प समाधि लगाना पहले सीख लेना चाहिये। अर्जुनके मनमें यही शंका उत्पन्न हुई थी; और उसने गीताके छठे अध्याय- में (गीता ६. ३७-३९) श्रीकृष्णसे पूछा है, कि ऐसी दशामें मनुष्यको क्या करना चाहिये ? उत्तरमें भगवान्‌ने कहा है, कि आत्मा अमर होनेके कारण उसपर लिंग-शरीर द्वारा इस जन्ममें जो थोड़े-बहुत संस्कार होते हैं, वेही आगेभी ज्यों-के- त्यों बने रहते हैं; तथा यह 'योगभ्रष्ट' पुरुष - अर्थात् कर्मयोगको पूरा साध न सकनेके कारण उससे भ्रष्ट होनेवाला पुरुष - अगले जन्ममें अपना प्रयत्न वहींसे शुरू करता है, कि जहाँसे उसका अभ्यास छूट गया था; और ऐसा होते होते क्रमसे "अनेक- जन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्" (गीता ६. ४५) - अनेक जन्मोंके बाद पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है; एवं अंतमें उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है। इसी सिद्धान्तको लक्ष्य करके दूसरे अध्यायमें कहा गया है, कि "स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्" (गीता २. ४०) - इस धर्मका अर्थात् कर्मयोग मार्गका स्वल्प आचरणभी बड़े बड़े संकटोंमें बचा देता है। सारांश, मनुष्यका आत्मा मूलमें यद्यपि स्वतंत्र है, तथापि मनुष्य एकही जन्ममें पूर्ण सिद्धि नहीं पा सकता। क्योंकि पूर्वकर्मोंके अनुसार उसे मिली हुई देहका प्राकृतिक स्वभाव अशुद्ध होता है। परंतु इससे "नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः" (मनु. ४. १३७) - किसीको निराश नहीं होना चाहिये; अथवा एकही जन्ममें परमसिद्धि पा जानेके दुराग्रहमें पड़ कर पातंजल योगाभ्यासमें अर्थात् इंद्रियोंका जबर्दस्ती दमन करनेमेंही सब आयु वृथा खो नहीं देनी चाहिये। आत्माको कोई जल्दी नहीं पड़ी है, जितना आज साध्य हो सके, उतनेही योगबलको प्राप्त करके कर्मयोगका आचरण शुरू कर देना चाहिये। इससे धीरे धीरे बुद्धि अधिकाधिक सात्त्विक तथा शुद्ध होती जायगी; और कर्म- योगका यह स्वल्पाचरणही - तो क्या, जिज्ञासापर मनुष्यभी आगे ढकेलते ढकेलते अंतमें आज नहीं तो कल - इस जन्ममें नहीं तो अगले जन्ममें - उसके आत्माको पूर्ण ब्रह्मप्राप्ति करा देगी। इसीलिये भगवान्‌ने गीतामें स्पष्ट कहा है, कि कर्मयोगमें एक विशेष गुण यह है, कि उसका स्वल्पसेभी स्वल्प आचरण या जिज्ञासाभी कभी व्यर्थ नहीं जाने पाती (गीता ५. १६ पर हमारी टीका देखो)। अतः मनुष्यको उचित

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २८७ है, कि वह केवल इसी जन्मपर ध्यान न दे, और धीरजको न छोड़े किंतु निष्काम कर्म करनेके अपने उद्योगको स्वतंत्रतासे और धीरे धीरे यथाशक्ति जारी रखे ! प्राक्तन-संस्कारके कारण ऐसा मालूम होता है, कि प्रकृतिक़ी गाँठ हमसे इस जन्ममें या आज नहीं छूट सकती, परंतु वही बंधन क्रम-क्रमसे बढ़नेवाले कर्मयोगके अभ्याससे कल या दूसरे जन्मोंमें आप-ही-आप ढीला हो जाता है; और ऐसा होते होते “ बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ” ( गीता ७. १९ ) – कभी-न-कभी पूर्ण ज्ञानकी प्राप्ति होनेसे प्रकृतिका बंधन या पराधीनता छूट जाती है; एवं अंतमें आत्मा अपने मूलकी पूर्ण निर्गुण मुक्तावस्थाको अर्थात् मोक्षदशाको पहुँच जाता है। मनुष्य क्या नहीं कर सकता है ? “ नर करनी करे, तो नरका नारायण होय ” यह जो कहावत प्रचलित है, वह वेदान्तके उक्त सिद्धान्तकाही अनुवाद है, और इसीलिये योगवासिष्ठकारने मुमुक्षु-प्रकरणमें उद्योगकी खूब प्रशंसा की है; तथा असंदिग्ध रीतिसे कहा है, कि अंतमें सब कुछ उद्योगसेही मिलता है ( यो. २. ४. १०-१८ ) । यह सिद्धहो चुका, कि ज्ञान-प्राप्तिका प्रयत्न करनेके लिये जीवात्मा मूलमें स्वतंत्र है; और स्वावलंबनपूर्वक दीर्घोद्योगसे उसे कभी-न-कभी प्राक्तन-कर्मके पंजेसे छुटकारा मिल जाता है। अब इस बातका थोड़ा-सा स्पष्टीकरण और हो जाना चाहिये, कि कर्मक्षय किसे कहते हैं ? और वह कब होता है ? कर्मक्षयका अर्थ है – सभी कर्मोंके बंधनोंसे पूर्ण अर्थात् निःशेष मुक्ति पाना । परंतु पहले कह चुके हैं, कि कोई पुरुष ज्ञानीभी हो जाय; तथापि जबतक उसका शरीर है, तबतक सोना, बैठना, भूख, प्यास इत्यादि कर्म छूट नही सकते; और प्रारब्धकर्मका बिना भोगे क्षयभी नहीं होता, इसलिये वह आग्रहसे देहका त्यागभी नहीं कर सकता । इसमें संदेह नहीं, कि ज्ञान होनेके पूर्व किये गये सब कर्मोंका नाश, ज्ञान होने पर हो जाता है; परंतु जब कि ज्ञानी पुरुषको ज्ञानोत्तरकालमेंभी यावज्जीवन कुछ-न-कुछ कर्म करना ही पड़ता है, तब ऐसे कर्मोंसे उसका छुटकारा कैसे होगा ? और, यदि छुटकारा न हो, तो यह शंका उत्पन्न होती है, कि फिर पूर्वकर्म-क्षय या आगे मोक्षभी न होगा । इसपर वेदान्तशास्त्रका उत्तर यह है, कि ज्ञानी मनुष्यकी नाम-रूपात्मक देहको नामरूपात्मक कर्मोंसे यद्यपि कभी छुटकारा नहीं मिल सकता, तथापि इन कर्मोंको अपने ऊपर लाद लेने या न लेनेमें आत्मा पूर्ण रीतिसे स्वतंत्र है; इसलिये यदि इंद्रियों पर विजय प्राप्त करके – कर्मके विषयमें प्राणिमात्रको जो, आसक्ति होती है – केवल उसकाही क्षय किया जाय, तो ज्ञानी मनुष्य कर्म करकेभी उसके फलका भागी नही होता । कर्म स्वभावतः अंधा, अचेतन या मृत होता है । वह स्वयं न तो किसीको पकड़ता है, और न किसीको छोड़ताभी है । वह स्वयं न अच्छा है, न बुरा । मनुष्य अपने जीवको इन कर्मोंमें फंसा कर इन्हें अपनी आसक्तिसे अच्छा या बुरा और शुभ या अशुभ बना लेता है। इसलिये कहा जा सकता है, कि इस

ममत्वयुक्त आसक्तिके छूटनेपर कर्मके बंधन आपही टूट जाते हैं, फिर चाहे वे कर्म बने रहें या न रहें। गीतामेभी स्थान स्थान पर यही उपदेश दिया गया है, कि सच्चा 'नैष्कर्म्य इसीमें है; कर्मका त्याग करनेमें नहीं (गीता ३. ४)। तेरा अधिकार केवल कर्म करनेका है, फलका मिलना न मिलना तेरे अधिकारकी बात नहीं है (गीता २. ४७)। “कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः” (गीता ३. ७) - फलकी आशा न रख कर्मेन्द्रियोंको कर्म करने दे। “त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्” (गीता ४. २०) कर्मफलका त्याग करके, “सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते” (गीता ५. ७)- जिन पुरुषोंकी समस्त प्राणियोंमें समबुद्धि हो जाती है, उनके किये हुए कर्म उनके बंधनका कारण नहीं हो सकते। “सर्वकर्मफलत्यागं कुरु” (गीता १२. ११) - सब कर्मफलोंका त्याग कर। “कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियते” (गीता १८. ९) - केवल कर्तव्य समझकर जो प्राप्त कर्म किया जाता है, वही सात्त्विक है। “चेतसा सर्व कर्माणि मयि संन्यस्य” (गीता १८. ५७) सब कर्मोंको मुझे अर्पण करके बर्ताव कर। इन सब उपदेशोंका रहस्य वही है, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है। अब यह एक स्वतंत्र प्रश्न है, कि ज्ञानी मनुष्योंको सब व्यावहारिक कर्म करने चाहिये या नहीं। इसके संबंधमें गीताशास्त्रका जो सिद्धान्त है, उसका विचार अगले प्रकरणमें किया जायगा। अभी तो केवल यही देखना है, कि ज्ञानसे सब कर्मोंके भस्म हो जानेका अर्थ क्या है? और ऊपर दिये गये वचनोंसे इस विषयमें गीताका जो अभिप्राय है, वह भली भाँति प्रकट हो जाता है। व्यवहार- मेंभी इसी न्यायका उपयोग किया जाता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्यको अनजाने धक्का दे दे, तो हम उसे उद्दंड नहीं कहते और इसी तरह यदि केवल दुर्घटनासे किसीकी हत्या हो जाती है, तो उसे फ़ौजदारी कानूनके अनुसारभी खून नहीं समझते। अग्निसे जब घर जल जाता है, अथवा वर्षासे सैकड़ों खेत बह जाते हैं; तो क्या अग्नि या वर्षाको कोई दोषी समझता है? केवल कर्मोंकीही ओर देखें, तो मनुष्यकी दृष्टिसे प्रत्येक कर्ममें कुछ-न-कुछ कमी, दोष या अवगुण अवश्यही मिलेगा - “सर्वारंभाहि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृत्तः” (गीता १८. ४८)। परंतु यह वह दोष नहीं है, कि जिसे छोड़नेके लिये गीता कहती है। मनुष्यके किसी कर्मको जिस अर्थमें हम अच्छा या बुरा कहते हैं, वह अच्छापन या बुरापन यथार्थमें उस कर्ममें नहीं रहता किंतु कर्म करनेवाले मनुष्यकी बुद्धिपर निर्भर रहता है; इसी बातपर ध्यान देकर गीतामें (गीता २. ४९-५१) कहा है, कि इन कर्मोंके बुरेपनको दूर करनेके लिये कर्ताको चाहिये, कि वह अपने मन और बुद्धिको शुद्ध रखे; और उपनिषदोंमेंभी कर्ताकी इसी बुद्धिको प्रधानता दी गई है। जैसे :- मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः। बंधाय विषयासंगि मोक्षे निर्विषयं स्मृतम् ॥ “मनुष्यके (कर्मोंका) बंधन या मोक्ष पानेका मनही (एव) कारण है। मनके

विषयासक्त होनेसे बंधन और निष्काम या निर्विषय अर्थात् निःसंग होनेसे मोक्ष प्राप्त होता है” (मैत्र्यु. ६. ३४; अमृतबिंदु. २)। गीतामें यही बात प्रधानतासे बतलाई गई है, कि ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानसे बुद्धिकी उक्त साम्यावस्था कैसे प्राप्त- कर लेनी चाहिये। इस अवस्थाके प्राप्त हो जानेपर कर्म करने परभी पूरा कर्म-क्षय हो जाया करता है। निरग्नि होकर-अर्थात् संन्यास लेकर अग्निहोत्र आदि कर्मोंको छोड़ देनेसे-अथवा अक्रिय रहनेसे-अर्थात् किसीभी कर्मको न कर चुपचाप बैठे रहनेसे-कर्मका क्षय नहीं होता (गीता ६. १)। चाहे मनुष्यकी इच्छा रहे या न रहे; परंतु प्रकृतिका चक्र हमेशा घूमताही रहता है; जिसके कारण मनुष्यकोभी उसके साथ अवश्यही चलना पड़ेगा (गीता ३. ३३; १८. ६०)। परंतु अज्ञानी जन ऐसी स्थितिमें प्रकृतिकी पराधीनतामें रहकर जैसे नाचा करते हैं, वैसे न करके जो मनुष्य अपनी बुद्धिको इंद्रियनिग्रहके द्वारा स्थिर एवं शुद्ध रखता है और सृष्टिक्रमके अनुसार अपने हिस्सेके (प्राप्त) कर्मोंको केवल कर्तव्य समझकर अनासक्त बुद्धिसे एवं शांतिपूर्वक किया करता है; वही सच्चा विरक्त है, वही सच्चा स्थितप्रज्ञ है; और उसीको ब्रह्मपदपर पहुँचा हुआ कहना चाहिये (गीता ३. ७; ४. २१; ५. ३-९; १८. ११)। यदि कोई ज्ञानी पुरुष किसीभी व्यावहारिक कर्मको न करके संन्यास लेकर जंगलमें जा बैठे; तो उस प्रकार व्यावहारिक कर्मोंको छोड़ देनेसे यह समझना बड़ी भारी भूल है, कि उसके कर्मोंका क्षय हो गया (गीता ३. ४)। इस तत्त्वपर हमेशा ध्यान देना चाहिये, कि कोई कर्म करे या न करे; परंतु उसके कर्मोंका क्षय उसकी बुद्धिकी साम्यावस्थाके कारण होता है; न कि कर्मोंको छोड़नेसे या न करनेसे। कर्मक्षयका सच्चा स्वरूप दिख- लानेके लिये यह उदाहरण दिया जाता है, कि जिस तरह अग्निसे लकड़ी जल जाती है, उसी तरह ज्ञानसे सब कर्म भस्म हो जाते हैं। परंतु इससे उपनिषदोंमें और गीतामें दिया गया यह दृष्टान्त अधिक समर्पक है, कि जिस तरह कमलपत्र पानीमें रह करभी पानीसे अलिप्त रहता है, उसी तरह ज्ञानी पुरुषको-अर्थात् ब्रह्मार्पण करके अथवा आसक्ति छोड़कर कर्म करनेवालेको-कर्मोंका लेप नहीं होता (छां. ४. १४. ३; गीता ५. १०)। कर्म स्वरूपतः कभी जलतेही नहीं और उन्हें जलानेकी कोई आवश्यकताभी नहीं है। जब यह बात सिद्ध है, कि कर्म नामरूप है और नामरूप दृश्य सृष्टि है; तब यह समस्त दृश्य सृष्टि जलेगी कैसे ? और कदाचित् जलभी जाय, तो सत्कार्यवादके अनुसार सिर्फ यही होगा, कि उसका नामरूप बदल जायगा। नामरूपात्मक कर्म या माया हमेशा बदलती रहती है, इस- लिये मनुष्य अपनी रुचिके अनुसार इस नामरूपमें भलेही परिवर्तन करले परंतु इस बातको नहीं भूलना चाहिये, कि वह चाहे कितनाही आत्म-ज्ञानी हो; परंतु इस नामरूपात्मक कर्म या मायाका समूल नाश कदापि नहीं कर सकता, – यह काम केवल परमेश्वरसेही हो सकता है (वे. सू. ४. ४. १७)। हाँ; मूलमें इन जड़ गी. र. १९

२९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्मोंमें भलाई-बुराईका जो बीज है ही नहीं; और जिसे मनुष्य उनमें अपनी ममत्व बुद्धिसे उत्पन्न किया करता है, उसका नाश करना मनुष्यके हाथमें है; और उसे जो कुछ जलाना है, वह यही वस्तु है। सब प्राणियोंके विषयमें समत्वबुद्धि रखकर अपने सब व्यापारोंके इस ममत्वबीजको जिसने जला (नष्ट कर) दिया है, वही धन्य है; वही कृतकृत्य और मुक्त है; सब कुछ करते रहने परभी उसके सब कर्म ज्ञानाग्निसे दग्ध समझे जाते हैं। (गीता ४.१९; १८.५६)। इस प्रकार कर्मोंका दग्ध होना मनकी निर्विषयतापर और ब्रह्मात्मैक्यके अनुभवपरही सर्वथा अवलंबित है। अतएव प्रकट है, कि जिस तरह आग कभीभी उत्पन्न करें; परंतु वह दहन करनेका अपना धर्म नहीं छोड़ती; उसी तरह ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानके होतेही उसके कर्मक्षय-रूप परिणामके होनेमें कालावधिकी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। ज्योंही ज्ञान हुआ, कि उसी क्षण कर्म-क्षय हो जाता है। परंतु अन्य सब कालोंसे मरण-काल इस संबंधमें अधिक महत्त्व का माना जाता है। क्योंकि यह मरण-काल आयुके बिलकुल अंतका काल है और इसके पूर्व किसी कालमें ब्रह्मज्ञान होनेसे अनारब्ध- संचितका यदि क्षय हो गया हो, तोभी प्रारब्ध नष्ट नहीं होता। इसलिये यदि यह ब्रह्मज्ञान अंततक एक समान स्थिर न रहे, तो प्रारब्ध-कर्मानुसार मृत्यु-काल- पर्यंत जो जो अच्छे या बुरे कर्म होंगे, वे सब सकाम हो जावेंगे; और उनका फल भोगनेके लिये फिरभी जन्म लेनाही पड़ेगा। इसमें संदेह नहीं, कि जो पूरा जीव- न्मुक्त हो जाता है, उसे यह भय कदापि नहीं रहता, परंतु जब इस विषयका शास्त्र- दृष्टिसे विचार करना हो, तब इस बातकाभी विचार अवश्य कर लेना पड़ता है, कि मृत्युके पहले जो ब्रह्म-ज्ञान हो गया था, वह कदाचित् मरण-कालतक स्थिर न रह सके। इसीलिये शास्त्रकार मृत्युसे पहलेके कालकी अपेक्षा मरण-कालहीको विशेष महत्त्वपूर्ण मानते हैं, और यह कहते हैं, कि उस समय यानी मृत्युके समय पूर्ण ब्रह्मात्मैक्य ज्ञानका अनुभव अवश्य होना चाहिये; नहीं तो मोक्ष नहीं होगा। इसी अभिप्रायसे उपनिषदोंके आधारपर गीतामें कहा गया है, कि “अंतकालमें अनन्यभावसे मेरा स्मरण करनेपर मनुष्य मुक्त होता है” (गीता ८.५)। इस सिद्धान्तके अनुसार कहना पड़ता है कि, यदि कोई दुराचारी मनुष्य अपनी सारी आयु दुराचरणमें व्यतीत करे और केवल अंत समयमें उसे ब्रह्मज्ञान हो जावे, तो वहभी मुक्त हो जाता है। इसपर कितनेही लोगोंका कहना है, कि यह बात युक्तिसंगत नहीं है। परंतु थोड़ा-सा विचार करनेपर मालूम होगा, कि यह बात अनुचित नहीं कही जा सकती - यह बिल्कुल सत्य और सयुक्तिक है। वस्तुतः यह संभव नहीं, कि जिसका माग जन्म दुराचारमें बीता हो, उमे केवल मृत्युसमयमेंही सुबुद्धि और ब्रह्म-ज्ञान हो जावे। अन्य सब बातोंके समानही ब्रह्म-निष्ठ होनेके लिये मनको आदत डालनी पड़ती है, और जिसे इस जन्ममें एक बारभी ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानका अनुभव नहीं हुआ है, उसे केवल मरण-कालमेंही उसका एकदम ज्ञान हो जाना परम दुर्घट या

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २९१ असंभवही है । इसीलिये गीताका दूसरा महत्त्वपूर्ण कथन यह है कि मनको विषय- वासनारहित बनानेके लिये प्रत्येक मनुष्यको सदैव अभ्यास करते रहना चाहिये, जिसका फल यह होगा कि अंतकालमेंभी यही स्थिति बनी रहेगी; और मुक्तिभी अवश्य हो जायगी (गीता ८. ६, ७. तथा २. ७२) । परंतु शास्त्रकी छानबीन करनेके लिये मान लीजिये, कि पूर्व संस्कार आदि कारणोंसे किसी मनुष्यको केवल मृत्यु- समयमेंही एकाएक ब्रह्म-ज्ञान हो गया । निस्संदेह ऐसा उदाहरण लाखों या करोड़ों मनुष्योंमें एक-आधही मिल सकेगा । परंतु, चाहे ऐसा उदाहरण मिले या न मिले - इस विचारको एक ओर रखकर अब हमें यही देखना है, कि यदि ऐसी स्थिति प्राप्त हो जाय, तो आगे क्या होगा ? ज्ञान चाहे मरण-कालमेंही क्यों न हो; परंतु उससे मनुष्यके अनारब्ध-कार्य-संचितका क्षय होताही है; और इस जन्मके भोगसे आरब्ध-संचितका क्षय मृत्युके समय हो जाता है । इसलिये उसे कुछभी कर्म भोगना बाकी नहीं रह जाता है; और यही सिद्ध होता है, कि वह सब कर्मोंसे अर्थात् संसारचक्रसे मुक्त हो जाता है। यही सिद्धान्त गीताके इस वाक्यमें कहा गया है, “अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ” (गीता ९. ३०) - यदि कोई बड़ा दुराचारी मनुष्यभी परमेश्वरका अनन्य भावसे स्मरण करेगा, तो वहभी मुक्त हो जायगा । और यह सिद्धान्त संसारके अन्य सब धर्मोंमेंभी ग्राह्य माना गया है । 'अनन्य भाव 'का यही अर्थ है, कि परमेश्वरमे मनुष्यकी चित्तवृत्ति पूर्ण रीतिसे लीन हो जावे । स्मरण रहे, कि मुँहसे तो 'राम राम' बड़बड़ाते रहें; और चित्त- वृत्ति दूसरीही ओर रहे; तो इसे अनन्य भाव नहीं कहेगा । सारांश, परमेश्वर- ज्ञानकी महिमाही ऐसा है, कि ज्योंही ज्ञानकी प्राप्ति हुई, त्योंही सब अनारब्ध- संचितका एकदम क्षय हो जाता है - यह अवस्था कभीभी प्राप्त हो, सदैव इष्टही है । परंतु यह अति आवश्यक बात है, कि कमसे कम मृत्युके समय यह स्थिर बनी रहें; या यदि पहले प्राप्त न हुई हो, तो कम-से-कम मृत्युके समय वह प्राप्त होवे । नहीं तो हमारे शास्त्रकारोंके कथनानुसार मृत्युके समय कुछ-न-कुछ वासना अवश्यही बाकी रह जायगी, जिससे पुनः जन्म लेना पड़ेगा और उसमे मोक्षभी नहीं मिलेगा । इसका विचार हो चुका, कि कर्मबंधन क्या है ? कर्मक्षय किसे कहते हैं ? वह कैसे और कब होता है ? अब प्रसंगानुसार इस बातकाभी कुछ विचार किया जायगा, कि जिनके कर्मफल नष्ट हो गये हैं, उनको और जिनके कर्मबंधन नहीं छूटे हैं, उनको मृत्युके अनंतर वैदिक धर्मके अनुसार कौन-सी गति मिलती है ? इसके संबंधमें उपनिषदोंमें बहुत चर्चा की गई है (छां. ४. १५; ५. १०; बृ. ६. २. २-१६; कौषी. १. २-३ ), और उसकी एकवाक्यता वेदान्तसूत्रके चौथे अध्यायके तीसरे पादमे की गई है । परंतु उस सब चर्चाको यहाँ बतलानेकी कोई आवश्यकता नहीं है । हमे केवल उन्ही दो मार्गोंका विचार करना है, जो भगवद्गीतामें (गीता ८. २३-२७) दिये गये हैं । वैदिक धर्मके ज्ञानकांड और कर्मकांड, ये दो प्रसिद्ध

२९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भेद है। कर्मकाण्डका मूल उद्देश्य यह है, कि सूर्य, अग्नि, इंद्र, वरुण, रुद्र, इत्यादि वैदिक देवताओंका यज्ञ-द्वारा पूजन किया जावे और उनके प्रसादसे इस लोकमें पुत्र- पौत्र आदि संतति तथा गौ, अश्व, धन, धान्य आदि संपत्ति प्राप्त कर ली जावे; और अंतमें मरनेपर सद्गति प्राप्त होवे। वर्तमान कालमें यह यज्ञ-याग आदि श्रौत धर्म प्रायः लुप्त हो गया है। इससे उक्त उद्देश्यको सिद्ध करनेके लिये लोग देवभक्ति तथा दानधर्म आदि शास्त्रोक्त पुण्यकर्म किया करते हैं। परंतु ऋग्वेदसे स्पष्टतया मालूम होता है, कि प्राचीन कालमें लोग - न केवल स्वार्थके लिये; बल्कि सर्व समाजके कल्याणके लियेभी - यज्ञ द्वाराही देवताओंकी आराधना किया करते थे। इस कामके लिये जिन इंद्र आदि देवताओंको अनुकूलताका संपादन करना आवश्यक है, उनकी स्तुतिमेही ऋग्वेदके सूक्त भरे पड़े हैं, और उनमें स्थल-स्थलपर ऐसी प्रार्थना की गई है, कि "हे देव हमें संतति और समृद्धि दो।" "हमें शतायु करो।" हमें, हमारे लड़कों-बच्चोंको और हमारे वीर-पुरुषोंको तथा हमारे जानवरोंको न मारो।* ये'यज्ञ-याग तीनों वेदोंमें विहित हैं, इसलिये इस मार्गका पुराना नाम 'त्रयी धर्म' है; और ब्राह्मणग्रंथोंमें इन यज्ञोंकी विधियोंका विस्तृत वर्णन किया गया है, परंतु भिन्न भिन्न ब्राह्मणग्रंथोंमें यज्ञ करनेकी भिन्न भिन्न विधियां हैं। इससे आगे शंका होने लगी, कि कौन-सी विधि ग्राह्य है; तब इन परस्पर-विरुद्ध वाक्योंकी एकवाक्यता करनेके लिये जैमिनीने अर्थनिर्णायक नियमोंका संग्रह किया। जैमिनीके इन नियमोंकोही मीमांसासूत्र या पूर्वमीमांसा कहते हैं, और इसी कारणसे इस प्राचीन कर्मकांडको मीमांसामार्ग नाम मिला तथा हमनेभी इसी नामका इस ग्रंथमें कई बार उपयोग किया है, क्योंकि आजकल यही प्रचलित हो गया है। परंतु स्मरण रहे, कि यद्यपि 'मीमांसा' शब्दही आगे चलकर प्रचलित हो गया है, तथापि यज्ञ- यागादिका यह कर्म-मार्ग बहुत प्राचीन कालसे चलता आया है। यही कारण है, कि गीतामें 'मीमांसा' शब्द कहींभी नहीं आया है; किंतु उसके बदले 'त्रयी धर्म' (गीता ९. २०, २१) या 'त्रयी विद्या' ये नाम आये हैं। यज्ञयाग आदि श्रौतकर्म-प्रतिपादक ब्राह्मणग्रंथोंके बाद आरण्यक और उपनिषद्, ये वैदिक ग्रंथ बने। इनमें यह प्रतिपादन किया गया है, कि यज्ञ-याग आदि कर्म गौण हैं और ब्रह्मज्ञानही श्रेष्ठ है, इसलिये इनके धर्मको 'ज्ञानकांड' कहते हैं। परंतु भिन्न भिन्न उपनिषदोंमें भिन्न भिन्न विचार हैं। इसलिये उनकीभी एकवाक्यता करनेकी आवश्यकता हुई; और इस कार्यको बादरायणाचार्यने अपने वेदान्तसूत्रोंमें किया। इस ग्रंथको ब्रह्मसूत्र अथवा शारीरसूत्र या उत्तर-मीमांसा कहते हैं। इस प्रकार पूर्व-मीमांसा तथा उत्तर-मीमांसा, क्रमसे *ये मंत्र अनेक स्थलोंपर पाये जाते हैं; परंतु उन सबको न दे कर यहाँ केवल एकही मंत्र बतलाना बस होगा, कि जो बहुत प्रचलित है। वह यह है - "मा नस्तोके तनये मा न आयौ मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः। वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे" (ऋ. १. ११४. ८)।

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २९३

  • कर्मकांड तथा ज्ञानकांड-संबंधी आजके प्रधान ग्रंथ हैं। वस्तुतः ये दोनों ग्रंथ मूलमें मीमांसाहीके हैं-अर्थात् वैदिक वचनोंके अर्थकी चर्चा करनेके लियेही बनाये गये हैं। तथापि आजकल कर्मकांड-प्रतिपादकोंको केवल 'मीमांसक' और ज्ञानकांड प्रतिपादकोंको 'वेदान्ती' कहते हैं। कर्मकांडवालोंका अर्थात् मीमांसकोंका कहना है, कि श्रौतधर्ममें चातुर्मास्य, ज्योतिष्टोम प्रभृति यज्ञ-याग आदि कर्मही प्रधान हैं; और जो इन्हें करेगा, उसेही वेदोंकी आज्ञानुसार मोक्ष प्राप्त होगा। इन यज्ञ-याग आदि कर्मोंको कोईभी छोड़ नहीं सकता। यदि छोड़ देगा, तो समझना चाहिये, कि वह श्रौतधर्मसे वंचित हो गया। क्योंकि वैदिक यज्ञकी उत्पत्ति सृष्टिकी उत्पत्तिके साथही हुई है, और यह चक्र अनादि कालसे चलता आया है, कि मनुष्य यज्ञ करके देवताओंको तृप्त करे, तथा मनुष्यकी पर्जन्य आदि सब आवश्यकताओंको देवगण पूरा करें ! आजकल हमें इन विचारोंका कुछ महत्त्व मालूम नहीं होता, क्योंकि यज्ञ- यागरूपी श्रौतधर्म अब प्रचलित नहीं है। परंतु गीता-कालकी स्थिति भिन्न थी, इस- लिये भगवद्गीतामें (गीता ३. १६-२५) इस यज्ञचक्रका महत्त्व ऊपर कहे अनुसार बतलाया गया है। तथापि गीतासे यह स्पष्ट मालूम होता है, कि उस समयभी उप- निषदोंमें प्रतिपादित ज्ञानके कारण मोक्षदृष्टिसे इन कर्मोंको गौणता आ चुकी थी (गीता. २. ४१-४६)। यही गौणता अहिंसाधर्मका प्रचार होनेपर आगे अधिका- धिक बढ़ती गई। भागवत धर्ममें स्पष्टतया प्रतिपादन किया गया है, कि यज्ञ-याग वेदविहित हैं; तोभी उनके लिये पशु-वध नहीं करना चाहिये, धान्यसेही यज्ञ करना चाहिये (महा. शां. ३३६. १० और ३३७)। इस कारण (तथा कुछ अंशोंमें आगे जैनियोंकेभी ऐसेही प्रयत्न करनेके कारण), श्रौतयज्ञ-मार्गकी आजकल वह दशा हो गई है, कि काशीसरीखे बड़ेबड़े धर्मक्षेत्रोंमेंभी नित्य श्रौताग्निहोत्र पालन करनेवाले अग्निहोत्री बहुतही थोड़े दीख पड़ते हैं; और ज्योतिष्टोम आदि पशुयज्ञोंका होना तो दस-बीस वर्षोंमें कभी कभी सुन पड़ता है। तथापि श्रौतधर्मही सब वैदिक धर्मोंका मूल है; और इसीलिये उसके विषयमें इस समयभी आदरबुद्धि पाई जाती है, और जैमिनीके सूत्र अर्थनिर्णायक शास्त्रके तौरपर प्रमाण माने जाते हैं। यद्यपि श्रौत- यज्ञयाग आदि धर्म इस प्रकार शिथिल हो गया है, तोभी मन्वादि स्मृतियोंमें वर्णित दूसरे यज्ञ-जिन्हें पंचमहायज्ञ कहते हैं-अबतक प्रचलित हैं; और उनके संबंधमेंभी श्रौतयज्ञ-यागचक्र आदिकेही उक्त न्यायका उपयोग होता है। उदाहरणार्थ, मनु आदि स्मृतिकारोंने पाँच अहिंसात्मक तथा नित्य गृहयज्ञ बतलाये हैं-जैसे वेदाध्ययन ब्रह्मयज्ञ है, तर्पण पितृयज्ञ है, होम देवयज्ञ है, बलि भूतयज्ञ है और अतिथि-संतर्पण मनुष्ययज्ञ है; तथा गार्हस्थ्य धर्ममें यह कहा है, कि इन पाँच यज्ञोंके द्वारा क्रमानुसार ऋषियों, पितरों, देवताओं, प्राणियों तथा मनुष्योंको पहले तृप्त करके फिर किसी गृहस्थको स्वयं भोजन करना चाहिये (मनु. ३. ६८-१२३)। इन यज्ञोंके कर लेनेपर जो अन्न बच जाता है, उसको 'अमृत' कहते हैं, और पहले इन सब मनुष्योंके

२९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भोजन कर लेनेपर जो अन्न बचे उसे 'विघस' कहते हैं (मनु. ३. २८५) । यह 'अमृत' और 'विघस' अन्नही गृहस्थके लिये विहित एवं श्रेयस्कर है और ऐसा न करके जो कोई सिर्फ़ अपने पेटके लियेही भोजन पका खावे, तो वह अघ अर्थात् पापका भक्षण करता है; और उसे 'अघाशी' कहना चाहिये - इस प्रकार केवल मनुस्मृतिमेंही नहीं तो ऋग्वेद और गीतामेंभी कहा गया है, (ऋ. १०. ११७. ६; मनु. ३. ११८; गीता ३. १३) । इन स्मार्त पंचमहायज्ञोंके सिवा दान, सत्य, दया, अहिंसा आदि सर्वभूतहितप्रद अन्य धर्मभी उपनिषदों तथा स्मृतिग्रंथोंमें गृहस्थके लिये विहित माने गये हैं (तै. १. ११) । और उन्हींमें स्पष्ट उल्लेख किया गया है, कि कुटुंबकी वृद्धि करके वंशको स्थिर रखो - "प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः ।" ये सब कर्म एक प्रकारके यज्ञही माने जाते हैं; और ये कर्म करनेका कारण, तैत्तिरीय संहितामें यह बतलाया गया है, कि जन्मसेही ब्राह्मण अपनी पीठपर तीन प्रकारके ऋण ले आता है - पहला ऋषियोंका, दूसरा देवताओंका और तीसरा पितरोंका। इनमें ऋषियोंका ऋण वेदाभ्याससे, देवताओंका यज्ञसे और पितरोंका पुत्रोत्पत्तिसे चुकाना चाहिये, अन्यथा उसे सद्गति प्राप्त नहीं होगी, (तै. सं. ६. ३. १०. ५) ।* महाभारतके (मभा. आ. १३) आदिपर्वमें एक कथा है, कि जरत्कारू ऐसा आचरण न करके, विवाह करनेके पहलेही उग्र तपश्चर्या करने लगा; तब संतानक्षयके कारण उसके यायावर नामक पितर आकाशमें लटकते हुए उसे दीख पड़े; और फिर उनकी आज्ञासे उसने अपना विवाह किया। यह कोई नियम नहीं है, कि इन सब कर्मों या यज्ञोंको केवल ब्राह्मणही करें; वैदिक यज्ञ-यागोंको छोड़ अन्य सब कर्म यथाधिकार स्त्रियों और शूद्रोंके लियेभी विहित हैं, इसलिये स्मृतिकारोंकी कही गई चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाके अनुसार किये गये सब कर्म यज्ञही हैं - उदाहरणार्थ, क्षत्रियोंका युद्ध करनाभी एक यज्ञ है और यज्ञका यही व्यापक अर्थ इस प्रकरणमें विवक्षित है। मनुने कहा है, कि जो जिसके लिये विहित है, वही उसके लिये तप है (म. ११. २३६) ; और महाभारतमेंभी कहा है, कि :- आरंभयज्ञाः क्षत्रस्य हविर्यज्ञा विशः स्मृताः । परिचारयज्ञाः शूद्राश्च जपयज्ञा द्विजातयः ॥ "आरंभ (उद्योग), हवि, सेवा और जप ये चार यज्ञ क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और ब्राह्मण, इन चार वर्णोंके लिये यथानुक्रम विहित हैं, (मभा. शां. २३७. १२) । सारांश, इस सृष्टिके सब मनुष्यों और उनके कर्मोंको यज्ञहीके लिये ब्रह्मदेवने उत्पन्न किया है (मभा. अनु. ४८. ३; ; और गीता ३. १०; ४. ३२) । फलतः चातुर्वर्ण्य आदि सब शास्त्रोक्त कर्म एक प्रकारके यज्ञही हैं, यज्ञकर्त्ताओं या और प्रत्येक मनुष्य अपने * तैत्तिरीय संहिताका वचन है : "जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिर्ऋणवा जायते ब्रह्मचर्येणर्षिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्य एष वा अनृणो यः पुत्री यज्वा ब्रह्मचारिवासीति ।"

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २९५ अपने अधिकारके अनुसार इन यज्ञकों या शास्त्रोक्त कर्मों - धंधे, व्यवसाय या कर्तव्य व्यवहारको - न करे, तो सारे समाजकी हानि होगी और संभव है, कि अंतमें उसका नाशभी हो जावे । इसलिये ऐसे व्यापक अर्थसे सिद्ध होता है, कि लोकसंग्रहके लिये यज्ञकी सदैव आवश्यकता होती है। अब यह प्रश्न उठता है, कि यदि वेद और चातुर्वर्ण्य आदि स्मार्त-व्यवस्थाके अनुसार गृहस्थोंके लिये वही कर्मप्रधान वृत्ति विहित मानी गई है, कि जो केवल कर्ममय है, तो क्या इन सांसारिक कर्मोंको धर्मशास्त्रके अनुसार यथाविधि - अर्थात् नीतिसे और धर्मकी आज्ञानुसार करते रहनेसेही कोई मनुष्य जन्म-मरणके चक्करसे मुक्त हो जायगा ? और यदि कहा जाय कि वह मुक्त हो जाता है, तो फिर ज्ञानकी बड़ाई और योग्यताही क्या रही ? ज्ञानकांड अर्थात् उपनिषदोंका साफ़ यही कहना है, कि जब तक ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञान होकर कर्मके विषयमें विरक्ति न हो जाय, तब तक नामरूपात्मक मायासे या जन्म-मरणके चक्करमे छुटकारा नहीं मिल सकता । और श्रौतस्मार्त-धर्मको देखो तो यही मालूम पड़ता है, कि प्रत्येक मनुष्यका गार्हस्थ्य- धर्म कर्मप्रधान या व्यापक अर्थमें यज्ञमय है। इसके अतिरिक्त वेदोंकाभी स्पष्ट कथन है, कि यज्ञार्थ किये गये कर्म बंधक नहीं होते; और यज्ञसेही स्वर्गप्राप्ति होती है। स्वर्गकी चर्चा छोड़ जाय; तोभी हम देखते हैं, कि ब्रह्मदेवहीने यह नियम बना दिया है, कि इंद्र आदि देवताओंके संतुष्ट हुए विना वर्षा नहीं होती; और यज्ञके विना देवतागणभी संतुष्ट नहीं होते। ऐसी अवस्थामें यज्ञ अर्थात् कर्म किये बिना मनुष्यकी भलाईभी कैसे होगी ? इस लोकके क्रमके विषयमें मनुस्मृति, महाभारत, उपनिषद् तथा गीतामेंभी कहा है, कि :- अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥ “ यज्ञमें हवन किये गये सब द्रव्य अग्निद्वारा सूर्यको पहुंचते हैं, और सूर्यसे पर्जन्य और पर्जन्यसे अन्न तथा अन्नसे प्रजा उत्पन्न होती है” (मनु. ३. ७६; महा. शां. २६२. ११; मैत्र्यु. ६. ३७; गी. ३. १४) । और जब कि ये यज्ञ कर्मके द्वाराही होते हैं, तब कर्मको छोड़ देनेसे काम कैसे चलेगा ? यज्ञमय कर्मोंको छोड़ देनेसे संसारका चक्र बंद हो जायगा; और किसीको खानेकोभी नहीं मिलेगा । इसपर भागवतधर्म तथा गीताशास्त्रका उत्तर यह है, कि यज्ञ-याग आदि वैदिक कर्मोंको या अन्य किसीभी स्मार्त तथा व्यावहारिक यज्ञमय कर्मोंको छोड़ देनेका उपदेश हम नहीं करते । हम तो तुम्हारेही समान यहभी कहनेको तैयार हैं, कि जो यज्ञ-चक्र पूर्व-कालसे बराबर चलता आया है, उसके बंद हो जानेसे संसारका नाश हो जायगा । इसलिये हमारा यही सिद्धान्त है, कि इस कर्ममय यज्ञको कभी नहीं छोड़ना चाहिये (महा. शां. ३४०; गीता ३. १६) । परंतु ज्ञानकांडमें अर्थात् उपनिषदोंमेंही स्पष्टरूपसे कहा

२९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गया है, कि ज्ञान और वैराग्यसे कर्मक्षय हुए बिना मोक्ष नहीं मिल सकता, इसलिये इन दोनों सिद्धान्तोंका मेल करके हमारा अंतिम कथन यह है, कि सब कर्मोंको ज्ञानसे अर्थात् फलाशा छोड़कर निष्काम या विरक्त-बुद्धिसे करते रहना चाहिये । (गीता ३. १७, १९) । यदि तुम स्वर्गफलकी काम्य-बुद्धि मनमें रखकर ज्योतिष्टोम आदि यज्ञयाग करोगे, तो वेदोंमें कहे अनुसार स्वर्ग-फल तुम्हें निस्संदेह मिलेगा; क्योंकि वेदाज्ञा कभीभी झूठ नहीं हो सकती । परंतु स्वर्ग-फल नित्य अर्थात् हमेशा टिकने- वाला नहीं है । इसलिये उपनिषदोंमें कहा गया है (बृ. ४. ४. ६ ; वे. सू. ३. १. ८ ; मभा. वन. २६०. ३९ ) :- प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किञ्चेह करोत्ययम् । तस्माल्लोकात्पुनरेत्यस्मै लोकाय कर्मणे ॥ * “ इस लोकमें यज्ञ-याग आदि जो पुण्य-कर्म किये जाते हैं, उनका फल स्वर्गीय उप- भोगसे समाप्त हो जाता है; और तब यज्ञ करनेवाले कर्मकांडी मनुष्यको स्वर्गलोकसे इस कर्मलोक अर्थात् भूलोकमें फिरभी आना पड़ता है।” छांदोग्योपनिषद्में ( छां. ५. १०. ३-९ ) तो स्वर्गसे नीचे आनेका मार्गभी बतलाया गया है । भगवद्- गीतामें “ कामात्मानः स्वर्गपराः ” या “ त्रैगुण्यविषया वेदाः ” (गीता २. ४३, ४५) इस प्रकार जो कुछ गौणत्वसूचक वर्णन किया गया है, वह इन्हीं कर्मकांडी लोगोंको लक्ष्य करके कहा गया है और नौवें अध्यायमें फिरसे स्पष्टतया कहा गया है, कि “ गतागतं कामकामा लभन्ते ।” ( गीता ९. २१ ) – उन्हें स्वर्गलोक और इस लोकमें बार बार आना-जाना पड़ता है। यह आवागमन ज्ञानप्राप्तिके बिना रुक नहीं सकता और जब तक यह रुक नहीं सकता, तब तक आत्माको सच्चा समाधान, पूर्णावस्था या मोक्षभी नहीं मिल सकता । इसलिये गीताके समस्त उपदेशका सार यही है, कि यज्ञ-याग आदिकी कौन कहे ? – चातुर्वर्ण्यके सब कर्मोंकोभी तुम ब्रह्मात्मैक्यपर – ज्ञानसे तथा साम्यबुद्धिसे आसक्ति छोड़कर करते रहो, तो बस इस प्रकार कर्मचक्रको जारी रखकरभी तुम मुक्तही बने रहोगे ( गीता १८. ५, ६) । किसी देवताके नामसे तिल, चावल या किसी पशुको ‘ इदं अमुकदेवतायै न मम ’ कहकर अग्निमें हवन कर देनेसेही कुछ यज्ञ नहीं हो जाता । प्रत्यक्ष पशुको मारनेकी अपेक्षा प्रत्येक मनुष्यके शरीरमें काम-क्रोध आदि जो अनेक पशुवृत्तियाँ हैं, उनका साम्यबुद्धिरूप संयमाग्निमें होम करनाही अधिक श्रेयस्कर यज्ञ है ( गीता ४. ३३ ) । इसी अभिप्रायसे गीतामें तथा नारायणीय धर्ममें भगवान्ने कहा है, कि “ मैं यज्ञोंमें जपयज्ञ ” अर्थात् श्रेष्ठ हूँ ( गीता १०. २५, मभा. शां. ३. ३७) ।

  • इस मंत्रके दूसरे चरणको पढ़ते समय ‘पुनरेति’ और ‘अस्मै’ ऐसा पदच्छेद करके पढ़ना चाहिये । तब इस चरणमें अक्षरोंकी कमी नहीं मालूम होगी । वैदिक ग्रंथोंको पढ़ते समय ऐसा बहुधा करना पड़ता है ।

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २९७ मनुस्मृति ( मनु. २. ८७ ) मेंभी कहा गया है, कि ब्राह्मण और कुछ करे, या न करे, परंतु वह केवल जपसेही सिद्धि पा सकता है। अग्निमें आहुति डालते समय 'न मम' - यह वस्तु मेरी नहीं है - कहकर उस वस्तुसे अपनी ममत्व-बुद्धिका त्याग दिखलाया जाता है - यही यज्ञका मुख्य तत्त्व है ; और दान आदिक कर्मोंकाभी यही बीज है । इसलिये यज्ञ-याग या दानादि कर्मोंकी योग्यताभी यज्ञके बराबर है । अधिक क्या कहा जाय, जिनमें अपना तनिकभी स्वार्थ नही है, ऐसे कर्मोंको शुद्ध बुद्धिसे करनेपर वे यज्ञही कहे जा सकते हैं। यज्ञकी इस व्याख्याका स्वीकार करने- पर निर्मम या निष्काम बुद्धिसे किये गये सब कर्म, व्यापक अर्थमें, एक महायज्ञही होंगे । और द्रव्यमय यज्ञको लागू होनेवाला मीमांसकोंका यह न्याय, कि 'यथार्थ किये गये कोईभी कर्म बंधक नहीं होते, ' उन सब निष्काम कर्मोंके लियेभी उपयोगी हो जाता है। इन कर्मोंकी करते समय फलाशाभी छोड़ दी जाती है, जिसके कारण स्वर्गका आना-जानाभी छूट जाता है; और इन कर्मोंको करने परभी अंतमें मोक्ष-स्वरूपी सद्गति मिल जाती है ( गीता ३. ९ ) । सारांश यह है, कि संसार यज्ञमय या कर्म- मय है सही; परंतु कर्म करनेवालोंके दो वर्ग होते हैं। पहले वे जो शास्त्रोक्त रीतिसे, पर फलाशा रखकर कर्म किया करते हैं ( कर्मकांडी लोग ) ; और दूसरे वे जो ज्ञानमे या निष्काम बुद्धिमे केवल कर्तव्य समझकर कर्म किया करते हैं ( ज्ञानी लोग ) । इस संबंधमें गीताका यह सिद्धान्त है, कि कर्मकांडियोंको स्वर्गप्राप्तिरूप अनित्य फल मिलता है; और ज्ञानसे अर्थात् निष्काम बुद्धिसे कर्म करनेवाले ज्ञानी पुरुषोंको मोक्षरूपी नित्य फल मिलता है। मोक्षके लिये कर्मोंके छोड़ने गीतामें कहींभी नहीं बतलाया गया है। इसके विपरीत अठारहवें अध्यायके आरंभमें स्पष्ट- तया बतला पुरुषोंको मोक्षरूपि नित्य फल मिलता है। मोक्षके लिये कर्मोंके छोड़ने गीतामें कहींभी नहीं बतलाया गया है। इसके विपरीत अठरावें अध्यायके आरंभमें स्पष्टतया बतला दिया है, कि 'त्याग = छोड़ना' शब्दसे गीतामें कर्मत्याग कभीभी नही समझना चाहिये; किंतु उसका अर्थ 'फलत्याग' ही सर्वत्र विवक्षित है। इस प्रकार कर्मकांडियों और कर्मज्ञानियोंको भिन्न भिन्न फल मिलते हैं और उन्हें पाके, प्रत्येकको मृत्युके वाद भिन्न भिन्न लोकोंमें भिन्न भिन्न मार्गोंसे जाना पड़ता है। उन्हीं मार्गोंको क्रमसे 'पितृयान' और 'देवयान' कहते हैं। ( शां. १७. १७. १६ ) ; और उपनिषदोंके आधारसे गीताके आठवें अध्यायमें इन्हीं दोनों मार्गोंका वर्णन किया गया है। वह मनुष्य, जिसको ज्ञान हो गया है - और यह ज्ञान कम-से-कम अंतकालमें तो अवश्यही हो गया हो ( गीता २. ७२ ) - देहपात होनेके अनंतर और चितामें उसके शरीरके जल जानेपर, उस अग्निमे ज्योति ( ज्वाला ), दिवस, शुक्लपक्ष और उत्तरायणके छः महीने, इनमेंसे प्रयाण करता हुआ ब्रह्मपदको जा पहुँचता है; और वहाँ उसे मोक्ष प्राप्त होता है; जिसके कारण वह पुनः जन्म ले कर मृत्युलोकमें फिर नही लौटता। परंतु जो केवल कर्मकांडी है, अर्थात् जिसे ज्ञान

२९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

नहीं है, वह उसी अग्निसे धुआँ, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायनके छः महीने इस क्रमसे प्रयाण करता हुआ चंद्रलोकको पहुँचता है; और अपने किये हुए सब पुण्यकर्मोंको भोग करके फिर इस लोकमें जन्म लेता है - इन दोनों मार्गोंमें यही भेद है (गीता ८. २३-२७) । 'ज्योति' (ज्वाला) शब्दके बदले उपनिषदोंमें 'अर्चिः' (ज्वाला) शब्दका प्रयोग किया गया है, जिससे पहले मार्गको 'अर्चिरादि' और दूसरेको, 'धूमादि' मार्गभी कहते हैं। हमारा उत्तरायण उत्तर ध्रुवस्थलमें रहनेवाले देवताओंका दिन है, और हमारा दक्षिणायन उनकी रात्रि है। इस परि- भाषापर ध्यान देनेसे मालूम हो जाता है, कि इन दो मार्गोंमेंसे पहला - अर्चिरादि (ज्योतिरादि) - मार्ग आरंभसे अंततक प्रकाशमय है; और दूसरा - धूमादि

  • मार्ग अंधकारमय है। ज्ञान प्रकाशमय है; और परब्रह्म "ज्योतिषां ज्योतिः" (गीता १३. १७) - तेजोंका तेज है, इसलिये देहपात होनेके अनंतर, ज्ञानी पुरुषोंके मार्गका प्रकाशमय होना उचितही है, और गीतामें इन दो मार्गोंको 'शुक्ल' और 'कृष्ण' इसीलिये कहा है, कि उनकाभी अर्थ प्रकाशमय और अंधकारमय है। गीतामें उत्तरायणके बादके सोपानोंका वर्णन नहीं है। परंतु यास्कके निरुक्तमें उदगयनके बाद देवलोक, सूर्य, वैद्युत और मानस पुरुषका वर्णन है (निरुक्त. १४. ९)। और उपनिषदोंमें देवयानके विषयमें जो वर्णन है, उनकी एकवाक्यता करके वेदान्तसूत्रमें यह क्रम दिया है, कि उत्तरायणके बाद संवत्सर, वायुलोक, सूर्य, चंद्र, विद्युत्, वरुणलोक, इंद्रलोक, प्रजापतिलोक और अंतमें ब्रह्मलोक है (बृ. ५. १०; ६. २. १५; छां. ५. १०; कौषी. १. ३; वे. सू. ४. ३. १-६)। देवयान और पितृयाण मार्गोंके सोपानों या मुकामोंका वर्णन हो चुका। परंतु इनमें जो दिवस, शुक्लपक्ष, उत्तरायण इत्यादिके वर्णन हैं, उनका सामान्य अर्थ कालवाचक होता है। इसलिये सहजही यह प्रश्न उपस्थित होता है, कि क्या देवयान और पितृयाण मार्गोंका कालसे कुछ संबंध है? अथवा पहले कभी था, या नहीं? यद्यपि दिवस, रात्रि, शुक्लपक्ष इत्यादि शब्दोंका अर्थ कालवाचक है; तथापि अग्नि, ज्वाला, वायुलोक, विद्युत् आदि जो अन्य सोपान हैं, उनका अर्थ कालवाचक नहीं हो सकता। और यदि माना जाय, कि ज्ञानी पुरुषको, दिन अथवा रातके समय मरनेपर, भिन्न भिन्न गति मिलती है, तब तो ज्ञानका कुछ महत्त्वही नहीं रह जाता। इसलिये अग्नि, दिवस, उत्तरायण इत्यादि सभी शब्दोंको कालवाचक न मानकर वेदान्तसूत्रमें यह सिद्धान्त किया गया है, कि ये शब्द इनके अभिमानी देवताओंके लिये कल्पित किये गये हैं, जो ज्ञानी और कर्मकांडी पुरुषोंके आत्माको भिन्न भिन्न मार्गोंसे ब्रह्मलोक और चंद्रलोकमें ले जाते हैं (वे. सू. ४. २. १९-२१; ४. ३. ४)। परंतु इसमें संदेह है, कि भगवद्गीताको यह मत मान्य है या नहीं। क्योंकि उत्तरायणके बादके उन सोपानोंका - कि जो कालवाचक नहीं हैं - गीतामें वर्णन नहीं है। इतनाही नहीं; बल्कि इन मार्गोंको बतलानेके पहले भगवान्ने कालका

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २९९ स्पष्ट उल्लेख इस प्रकार किया है, कि "मैं तुझे वह काल बतलाता हू कि जिस कालमें मरनेपर कर्मयोगी लौटकर आता है, या नहीं आता है" (गीता ८, २३) । और महाभारतमेंभी यह वर्णन पाया जाता है, कि जब भीष्म पितामह शरशय्यामें पड़े थे, तब वे शरीरत्याग करनेके लिये उत्तरायणकी - अर्थात् सूर्यके उत्तरकी ओर मुड़नेकी - प्रतीक्षा कर रहे थे (महा. भी. १२०; अनु. १६७) । इससे विदित होता है, कि दिवस, शुक्लपक्ष और उत्तरायण, ये कालही मृत्यु होनेके लिये कभी-न- कभी प्रशस्त माने जाते थे । ऋग्वेद (ऋ. १०. ८८. १५ और बृ. ६. २. १५) मेंभी देवयान और पितृयाण मार्गोंका जहाँपर वर्णन है, वहाँ कालवाचक अर्थही विवक्षित है। इससे तथा अन्य अनेक प्रमाणोंसे हमने यह निश्चय किया है कि, उत्तर गोलार्धके जिस स्थानमें सूर्य क्षितिजपर छः महीनेतक हमेशा दीख पड़ता है, उस स्थानमें अर्थात् उत्तर ध्रुवके पास या मेरुस्थानमें जब पहले वैदिक ऋषियोंकी बस्तीथी तभीसे छ. महीनेका उत्तरायणरूपी प्रकाशकाल मृत्यु होनेके लिये प्रशस्त माना गया होगा। इस विषयका विस्तृत विवेचन हमने अपने दूसरे ग्रंथमें किया है। कारण चाहे कुछभी हो, इसमें संदेह नहीं कि यह समझ बहुत प्राचीन कालसे चली आयी है; और यही समझ देवयान तथा पितृयाण मार्गोंमें प्रकटरूप, न हो, तोभी पर्यायसे - अंतर्भूत हो गई है। अधिक क्या कहें, हमें तो ऐसा मालूम होता है कि इन दोनों मार्गोंका मूल इस प्राचीन समझमेंही है। यदि ऐसा न माने, तो गीतामें देवयान और पितृयाणको लक्ष्य करके जो एक बार 'काल' (गीता ८. २३) और दूसरी बार 'गति' या 'सृति' अर्थात् मार्ग (गीता ८. २६, २७) कहा है, यानी इन दो भिन्न भिन्न अर्थोंके शब्दोंका जो प्रयोग किया गया है, उसकी कुछ उपपत्ति नहीं लगाई जा सकती । वेदान्तसूत्रके शांकरभाष्यमें देवयान और पितृयाणका कालवाचक अर्थ स्मार्त है, जो कर्मयोगके लियेही उपयुक्त होता है, और यह भेद करके, कि सच्चा ब्रह्मज्ञानी उपनिषदोंमें वर्णित श्रौत मार्गसे, अर्थात् देवताप्रयुक्त प्रकाशमय मार्गसेही, ब्रह्मलोकको जाता है; 'कालवाचक' तथा 'देवतावाचक' अर्थोंकी व्यवस्था की गई है (वे. सू. शां. भा. ४. २. १८-२१) । परंतु मूल सूत्रोंको देखनेसे ज्ञात होता है, कि कालकी अपेक्षा न रख उत्तरायणादि शब्दोंसे देवताओंको कल्पितकर देवयानका जो देवतावाचक अर्थ बादरायणाचार्यने निश्चित किया है, वही उनके मतानुसार सर्वत्र अभिप्रेत होगा; और यह माननाभी उचित नहीं है, कि गीतामें वर्णित मार्ग उपनिषदोंकी इस देवयान गतिको छोड़कर स्वतंत्र हो सकता है। परंतु यहाँ इतने गहरे पानीमें पैठनेकी कोई आवश्यकता नहीं है; क्योंकि यद्यपि इस विषयमें मतभेद हो, कि देवयान और पितृयाणके दिवस, रात्रि, उत्तरायण आदि शब्द ऐतिहासिक दृष्टिसे मूलारंभमें कालवाचकही थे या नहीं; तथापि यह बात निर्विवाद है, कि आगे यह कालवाचक अर्थ छोड़ दिया गया और अंतमें देवयान और पितृयाण, इन दोनों पदोंका यही अर्थ निश्चित तथा रूढ़ हो गया है, कि - कालकी अपेक्षा न रख चाहे कोई किसी

३०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र समय मरे – यदि वह ज्ञानी हो तो अपने कर्मानुसार प्रकाशमय मार्गसे, और केवल कर्मकांडी हो तो अंधकारमय मार्गसे, परलोकको जाता है। चाहे फिर दिवस और उत्तरायण आदि शब्दोंसे बादरायणाचार्यके कथनानुसार देवता समझिये; या लक्षणासे प्रकाशमय मार्गके क्रमशः बढ़ते हुए सोपान समझिये; परंतु इससे इस सिद्धान्त में कुछ भेद नहीं होता, कि यहाँ देवयान और पितृयाण शब्दोंका रूढार्थ मार्गवाचक है। परंतु क्या देवयान और क्या पितृयाण, दोनों मार्ग शास्त्रोक्त अर्थात् पुण्यकर्म करनेवालेकोही प्राप्त हुआ करते हैं; क्योंकि पितृयाण यद्यपि देवयानसे नीचेकी श्रेणीका मार्ग है, तथापि वहभी चंद्रलोकको अर्थात् एक प्रकारके स्वर्गलोकहीको पहुँचानेवाला मार्ग है। इसलिये प्रकट है, कि वहाँ सुख भोगनेकी पात्रता होनेके लिये इस लोकमें कुछ न कुछ शास्त्रोक्त पुण्यकर्म अवश्यही करना पड़ता है (गीता ९. २०, २१)। अतः जो लोग थोड़ाभी शास्त्रोक्त पुण्यकर्म न करके संसारमें अपना समस्त जीवन पापाचरणमें बिता देते हैं, वे इन दोनोंमेंसे किसीभी मार्गसे नहीं जा सकते। इनके विषयमें उपनिषदोंमें स्पष्ट कहा गया है, कि ये लोग मरनेपर एकदम पशु-पक्षी आदि तिर्यक्-योनिमें जन्म लेते हैं और बारंबार यमलोक अर्थात् नरकमें जाते हैं। इसीको 'तीसरा' मार्ग कहते हैं। (छा. ५. १०. ८; कठ. २. ६. ७); और भगवद्गीतामेंभी कहा गया है, कि निपट पापी अर्थात् आसुरी पुरुषोंको यही-निरय-गति प्राप्त होती है (गीता १६. १९–२१; ९. १२.; वे. सू. ३. १. १२, १३; निरुक्त १४. ९)। ऊपर इस बातका विवेचन किया गया है, कि मरनेपर मनुष्यको उसके कर्मा- नुरूप वैदिक धर्मके प्राचीन परंपरानुसार तीन प्रकारकी गति किस क्रमसे प्राप्त होती है। इनमेंसे केवल देवयान मार्गही मोक्षदायक है; परंतु यह मोक्ष क्रम-क्रमसे अर्थात् एकके बाद एक, अर्चिरादि कई सोपान चढ़नेपर अंतमें मिलता है। इसलिये इस मार्गको 'क्रममुक्ति' कहते हैं। और देहपात होनेके अनंतर अर्थात् मृत्युके अनंतर ब्रह्मलोकमें जानेसे वहाँ अंतमें मुक्ति मिलती है; इसीलिये इसे 'विदेह-मुक्ति'भी कहते हैं। परंतु इन सब बातोंके अतिरिक्त शुद्ध अध्यात्मशास्त्रका यहभी कथन है, कि जिसके मनमें ब्रह्म और आत्माके एकत्वका पूर्ण साक्षात्कार नित्य जागृत है, उसे ब्रह्मप्राप्तिके लिये कहीं दूसरी जगह क्यों जाना पड़ेगा ? अथवा उसे मृत्यु-कालकीभी बाँट क्यों जोहनी पड़ेगी ? यह बात सच है, कि उपासनाके लिये स्वीकृत किये गये सूर्यादि प्रतीकोंको अर्थात् सगुण ब्रह्मकी उपासनासे जो ब्रह्मज्ञान होता है, वह पहले पहल कुछ अपूर्ण रहता हैं; क्योंकि उससे मनमें सूर्यलोक या ब्रह्मलोक इत्यादिकी कल्पनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और इनके मरण-समयमेंभी मनमें न्यूनाधिक परिमाणके बने रहनेकी संभावना होती हैं। अतएव यह कहना उचित है कि इस अपूर्णताको दूर करके मोक्षकी प्राप्तिके लिये ऐसे लोगोंको देवयान मार्गसेही जाना पड़ता है (वे. सू. ४. ३ १५)। क्योंकि अध्यात्मशास्त्रका यह अटल सिद्धान्त है,