श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 328, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २८३ वह स्वयं स्वतंत्र रीतिसे, ऊपर कहे अनुसार, बुद्धि तथा मनमें प्रेरणा किया करता है। अंतःकरणकी इस प्रेरणाका अनादर करके यदि कोई बर्ताव करेगा, तो तुकाराम महाराजके शब्दोंमें यही कहा जा सकता है, कि वह "स्वयं अपनेही पैरोंमें आप कुल्हाड़ी मारनेको तैयार हुआ है" (तु. गा. ४४४८)। भगवद्गीतामें इसी तत्त्वका उल्लेख यों किया गया है : "न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानम्" - जो स्वयं अपना घात आपही नहीं करता, उसे उत्तम गति मिलती है (गीता १३. २८); और दासबोधमेंभी इसीका स्पष्ट अनुवाद किया गया है (दा. बो. १७. ७. ७-१०)। यद्यपि मनुष्य कर्मसृष्टिके अभेद्य दिखाई देनेवाले नियमोंसे जकड़कर बँधा हुआ है तथापि स्वभावतः उसे ऐसा मालूम होता है, कि मैं इस परिस्थितिमेंभी अमुक कामको स्वतंत्र रीतिसे कर सकूँगा। अनुभवके इस तत्त्वकी उपपत्ति ऊपर कहे अनुसार ब्रह्मसृष्टिको जड़ सृष्टिसे भिन्न माने बिना किसीभी अन्य रीतिसे नहीं बतलाई जा सकती। इसलिये जो अध्यात्मशास्त्रको नहीं मानते, उन्हें इस विषयमें या तो मनुष्यके नित्य दासत्वको मानना चाहिये, या प्रवृत्ति-स्वातंत्र्यके प्रश्नको अगम्य समझकर योंही छोड़ देना चाहिये; उनके लिये कोई दूसरा मार्ग नहीं है। अद्वैत वेदान्तका यह सिद्धान्त है, कि जीवात्मा और परमात्मा मूलमें एकरूप हैं (वे. सू. शां. भा. २. ३. ४०), और इसी सिद्धान्तके अनुसार प्रवृत्ति-स्वातंत्र्य या इच्छा- स्वातंत्र्यकी उक्त उपपत्ति बतलाई गई है। परंतु जिन्हें यह अद्वैत मत मान्य नहीं है अथवा जो भक्तिके लिये द्वैतका स्वीकार किया करते हैं, उनका कथन है, कि जीवात्माकी यह सामर्थ्य स्वयं उसकी नहीं है; बल्कि यह उसे परमेश्वरसे प्राप्त होती है। तथापि "न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः।" (ऋ. ४. ३३. ११) - थकने तक प्रयत्न करनेवाले मनुष्यके अतिरिक्त अन्योंकी देवता मदद नहीं करते -
- ऋग्वेदके इस तत्त्वानुसार यह कहा गया है, कि जीवात्माको यह सामर्थ्य प्राप्त करा देनेके लिये पहले स्वयंही प्रयत्न करना चाहिये - अर्थात् आत्मप्रयत्नका या पर्यायसे आत्म-स्वातंत्र्यका तत्त्व फिरभी स्थिर बनाही रहता है (वे. सू. २. ३. ४१, ४२; गीता १०. ५, १०)। अधिक क्या कहें ? बौद्धधर्मी लोग आत्माका या परब्रह्मका अस्तित्व नहीं मानते और यद्यपि उनको ब्रह्मज्ञान तथा आत्मज्ञान मान्य नहीं है, तथापि उनके धर्मग्रंथोंमेंभी यही उपदेश किया गया है, कि "अत्तना (आत्मना) चोदयऽत्तानं" - अपने आपको स्वयं अपनेही प्रयत्नसे राहपर लगाना चाहिये। इस उपदेशका समर्थन करनेके लिये कहा गया है, कि :- अत्ता (आत्मा) हि अत्तनो नाथो अत्ता हि अत्तनो गति। तस्मा सञ्जयमऽत्तानं अस्सं (अश्वं) भद्रं व वाणिजो ॥ "हमही खुद अपने स्वामी या मालिक हैं, और अपने आत्माके सिवा हमें तारनेवाला दूसरा कोई नहीं है; इसलिये जिस प्रकार कोई व्यापारी अपने उत्तम घोड़ेका संयमन करता है, उसी प्रकार हमें अपना संयमन आपही भली भाँति करना चाहिये"