श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (धम्मपद. ३८०); और गीताकी भांति आत्म-स्वातंत्र्यके अस्तित्व तथा उसकी आवश्यकताकाभी वर्णन किया गया है (महापरिनिव्वाण-सुत्त २. ३३-३५)। आधिभौतिक फ्रेंच पंडित कांटकीभी गणना इसी वर्गमें करनी चाहिये, क्योंकि यद्यपि वह किसी भी अध्यात्मवादको नहीं मानता, तथापि वह बिना किसी उपपत्तिका केवल प्रत्यक्षसिद्ध कह कर इस बातको अवश्य मानता है, कि प्रयत्नसे मनुष्य अपने आचरण और परिस्थितिको सुधार सकता है। यद्यपि यह सिद्ध हो चुका, कि कर्मपाशसे मुक्त होकर सर्वभूततान्तर्गत एक आत्माको पहचान लेनेकी जो आध्यात्मिक पूर्णावस्था है, उसे प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानही एकमात्र उपाय है, और इस ज्ञानको प्राप्त करलेना हमारे बसकी बात है; तथापि स्मरण रहे, कि यह स्वतंत्र आत्माभी अपनी छातीपर लदे हुए प्रकृतिके बोझको एकदम अर्थात् एकही क्षणमें अलग नहीं कर सकता। जैसे कोई कारीगर कितनाही कुशल क्यों न हो, परंतु वह हथियारोंके बिना कुछभी काम नहीं कर सकता और यदि हथियार खराब हों, तो उन्हें ठीक करनेमें उसका बहुत-सा समय नष्ट हो जाता है, वैसेही जीवात्माकाभी हाल है। ज्ञानप्राप्तिकी प्रेरणा करनेके लिये जीवात्मा स्वतंत्र तो अवश्य है, परंतु वह तात्त्विक दृष्टिसे मूलमें निर्गुण और केवल हे, अथवा सातवें प्रकरणमें बतलाये अनुसार नेत्रयुक्त परंतु लँगड़ा है। (मैत्र्यु. ३. २, ३; गीता १३. २०); इसलिये उक्त प्रेरणाके अनुसार आगे कर्म करनेके लिये जिन साधनोंकी आवश्यकता होती है (जैसे कुम्हारको चाककी आवश्यकता होती है); वे इस आत्माके पास स्वयं अपने नहीं होते - जो साधन उपलब्ध हैं - जैसे देह और बुद्धि आदि इंद्रियाँ - वे सब मायात्मक प्रकृतिके विकार हैं। अतएव जीवात्माको अपनी मुक्ति लियेभी प्रारब्धकर्मानुसार प्राप्त देहेंद्रिय आदि सामग्रीके (साधन या उपाधि) द्वाराही सब काम करना पड़ता है। इन साधनोंमें बुद्धि मुख्य है, इसलिये कोई काम करनेके लिये जीवात्मा पहले बुद्धिकोही प्रेरणा करता है। परंतु पूर्वकर्मानुसार और प्रकृतिके स्वभावानुसार यह कोई नियम नहीं, कि यह बुद्धि हमेशा शुद्ध तथा सात्विकही हो। इसलिये पहले त्रिगुणात्मक प्रकृतिके प्रपञ्चसे मुक्त हो कर यह बुद्धि अंतर्मुख, शुद्ध, सात्त्विक या आत्मनिष्ठ होनी चाहिये; अर्थात् यह बुद्धि ऐसी होनी चाहिये, कि जीवात्माकी प्रेरणाको माने, उसकी आज्ञाका पालन करे, और उन्हीं कर्मोंको करनेका निश्चय करे, जिनसे आत्माका कल्याण हो और ऐसा होनेके लिये दीर्घकाल तक वैराग्यका अभ्यास करना पड़ता है। इतना होनेपरभी भूख-प्यास आदि देह-धर्म और संचित कर्मोंके वे फल - जिनका भोगना आरंभ हो गया है - मृत्यु-समयतक छूटतेही नहीं हैं। तात्पर्य यह है, कि यद्यपि उपाधिबद्ध जीवात्मा देहेंद्रियोंको मोक्षानुकूल कर्म करनेकी मूल प्रेरणा करनेके लिये स्वतंत्र है, तथापि प्रकृतिहीके द्वारा चूंकि उसे सब काम कराने पड़ते हैं, इसलिये उतने भरके लिये (बढ़ई, कुम्हार आदि कारी-