भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २८५

गरोंके समान ) वह पगबलवी हो जाता है, और उसे देहेंद्रिय आदि हथियारोंको पहले शुद्ध करके अपने अधिकारमें कर लेना पड़ता है ( वे. स. २. ३. ४० ) । यह काम एकदम नहीं हो सकता, इसे धीरे धीरे धैर्यसे करना करना चाहिये। नहीं तो चमकने और भड़कनेवाले घोड़ेके समान इंद्रियाँ बलवा करने लगेंगी और मनुष्यको धर दबावेंगी। इसीलिये भगवान्‌ने कहा है, कि इंद्रियनिग्रह करनेके लिये बुद्धिको धृति या धैर्यकी सहायता मिलनी चाहिये ( गीता ६. २५ ) और आगे अठारहवें अध्याय ( गीता १८. ३३-३५ ) में बुद्धिकी भाँति धृतिकेभी - सात्त्विक, राजस और तामस - तीन नैसर्गिक भेद बतलाये गये हैं। इनमेंसे तामस और राजसको छोड़कर बुद्धिको सात्त्विक बनानेके लिये इंद्रियनिग्रह करना पड़ता है। और इसीसे छठवें अध्यायमें इसका संक्षिप्त वर्णन किया है, कि ऐसे इंद्रियनिग्रहा- भ्यासरूप योगके लिये उचित स्थल, आसन और आहार कौन कौनसे हैं? इस प्रकार गीतामें (गीता ६. २५) बतलाया गया है, कि 'शनैः शनैः' अभ्यास करनेपर चित्त स्थिर हो जाता है, इंद्रियाँ वशमें हो जाती हैं और आगे कुछ समयके बाद ( एकदम नहीं ) ब्रह्मात्मैक्यज्ञान होता है; एवं फिर " आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय " - उस ज्ञानसे कर्मबंधन छूट जाता है ( गीता ४. ३८-४१ ) । परंतु भगवान् एकांतमे योगाभ्यास करनेका उपदेश देते हैं ( गीता ६. १० ), इससे गीताका तात्पर्य यह नहीं समझ लेना चाहिये, कि संसारके सब व्यवहारोंको छोड़ कर योगाभ्यासमेंही सारी आयु बिता दी जावे। जिस प्रकार कोई व्यापारी अपने पासकी पूँजीसेही - चाहे वह बहुत थोड़ीही क्यों न हो - पहले धीरे धीरे व्यापार करने लगता है; और धीरे धीरे उसीके द्वारा अंतमें अपार संपत्ति कमा लेता है, उसी प्रकार गीताके कर्मयोगकाभी हाल है। अपनेसे जितना हो सकता है, उतनाही इंद्रिय-निग्रह करके पहले कर्मयोगका आरंभ करना चाहिये और उसीसे अंतमें अधिकाधिक इंद्रिय-निग्रह-सामर्थ्य प्राप्त हो जाती है। तथापि चौराहेमें बैठ करभी योगाभ्यास करनेसे काम नहीं चल सकता, क्योंकि इससे बुद्धिकी एकाग्रताकी जो आदत हुई होगी, उसके घट जानेका भय होता है। इसलिये कर्म- योगका आचरण करते हुए, कुछ समयतक नित्य या कभी कभी एकान्तका सेवन करनाभी आवश्यक है ( गीता १३. १० ) । इसके लिये संसारके समस्त व्यवहारोंको छोड़ देनेका उपदेश भगवान्‌ने कहींभी नहीं दिया है, प्रत्युत सांसारिक व्यवहारोंको निष्काम बुद्धिसे करनेके लियेही इंद्रिय-निग्रहका यही अभ्यास बतलाया गया है; और गीताका यही कथन है, कि इस इंद्रिय-निग्रहके साथ साथ यथाशक्ति निष्काम- कर्मयोगकाभी आचरण प्रत्येक मनुष्यको हमेशा करते रहना चाहिये, पूर्ण इंद्रिय- निग्रहके सिद्ध होनेतक राह देखते बैठे नहीं रहना चाहिये। मैत्र्युपनिषद्में और महाभारतमें कहा गया है, कि यदि कोई मनुष्य बुद्धिमान् और निग्रही हो, तो वह इस प्रकारके योगाभ्याससे छः महीनोंमें साम्यबुद्धि प्राप्त कर सकता है ( मै. ६.