श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र २८; महा. शां. २३९. ३२; अश्व. अनुगीता १०. ६६ )। परंतु भगवानने जिस सात्त्विक, सम या आत्मनिष्ठ बुद्धिका वर्णन किया है, वह बहुतेरे लोगोंको छः महिनोंमें क्या, पर-प्रकृति-स्वभावके अनुसार छः वर्षोंमेंभी प्राप्त नहीं हो सकती, और इस अभ्यासके अपूर्ण रह जानेके कारण इस जन्ममेंभी पूरी सिद्धि होगीही नहीं; इतनाही नहीं तो दूसरा जन्म लेकर फिर आरंभसे वही अभ्यास करना पड़ेगा; और उस जन्मका अभ्यासभी पूर्व-जन्मके अभ्यासकी भाँतिही अधूरा रह जायगा, इसलिये यह शंका उत्पन्न होती है, कि क्या ऐसे मनुष्यको पूर्ण सिद्धि कभी मिलही नहीं सकती ? फलतः ऐसा मालूम होने लगता है. कि कर्मयोगका आचरण करनेके पूर्व पातंजलयोगकी सहायतासे पूर्ण निर्विकल्प समाधि लगाना पहले सीख लेना चाहिये। अर्जुनके मनमें यही शंका उत्पन्न हुई थी; और उसने गीताके छठे अध्याय- में (गीता ६. ३७-३९) श्रीकृष्णसे पूछा है, कि ऐसी दशामें मनुष्यको क्या करना चाहिये ? उत्तरमें भगवान्ने कहा है, कि आत्मा अमर होनेके कारण उसपर लिंग-शरीर द्वारा इस जन्ममें जो थोड़े-बहुत संस्कार होते हैं, वेही आगेभी ज्यों-के- त्यों बने रहते हैं; तथा यह 'योगभ्रष्ट' पुरुष - अर्थात् कर्मयोगको पूरा साध न सकनेके कारण उससे भ्रष्ट होनेवाला पुरुष - अगले जन्ममें अपना प्रयत्न वहींसे शुरू करता है, कि जहाँसे उसका अभ्यास छूट गया था; और ऐसा होते होते क्रमसे "अनेक- जन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्" (गीता ६. ४५) - अनेक जन्मोंके बाद पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है; एवं अंतमें उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है। इसी सिद्धान्तको लक्ष्य करके दूसरे अध्यायमें कहा गया है, कि "स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्" (गीता २. ४०) - इस धर्मका अर्थात् कर्मयोग मार्गका स्वल्प आचरणभी बड़े बड़े संकटोंमें बचा देता है। सारांश, मनुष्यका आत्मा मूलमें यद्यपि स्वतंत्र है, तथापि मनुष्य एकही जन्ममें पूर्ण सिद्धि नहीं पा सकता। क्योंकि पूर्वकर्मोंके अनुसार उसे मिली हुई देहका प्राकृतिक स्वभाव अशुद्ध होता है। परंतु इससे "नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः" (मनु. ४. १३७) - किसीको निराश नहीं होना चाहिये; अथवा एकही जन्ममें परमसिद्धि पा जानेके दुराग्रहमें पड़ कर पातंजल योगाभ्यासमें अर्थात् इंद्रियोंका जबर्दस्ती दमन करनेमेंही सब आयु वृथा खो नहीं देनी चाहिये। आत्माको कोई जल्दी नहीं पड़ी है, जितना आज साध्य हो सके, उतनेही योगबलको प्राप्त करके कर्मयोगका आचरण शुरू कर देना चाहिये। इससे धीरे धीरे बुद्धि अधिकाधिक सात्त्विक तथा शुद्ध होती जायगी; और कर्म- योगका यह स्वल्पाचरणही - तो क्या, जिज्ञासापर मनुष्यभी आगे ढकेलते ढकेलते अंतमें आज नहीं तो कल - इस जन्ममें नहीं तो अगले जन्ममें - उसके आत्माको पूर्ण ब्रह्मप्राप्ति करा देगी। इसीलिये भगवान्ने गीतामें स्पष्ट कहा है, कि कर्मयोगमें एक विशेष गुण यह है, कि उसका स्वल्पसेभी स्वल्प आचरण या जिज्ञासाभी कभी व्यर्थ नहीं जाने पाती (गीता ५. १६ पर हमारी टीका देखो)। अतः मनुष्यको उचित