भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २८७ है, कि वह केवल इसी जन्मपर ध्यान न दे, और धीरजको न छोड़े किंतु निष्काम कर्म करनेके अपने उद्योगको स्वतंत्रतासे और धीरे धीरे यथाशक्ति जारी रखे ! प्राक्तन-संस्कारके कारण ऐसा मालूम होता है, कि प्रकृतिक़ी गाँठ हमसे इस जन्ममें या आज नहीं छूट सकती, परंतु वही बंधन क्रम-क्रमसे बढ़नेवाले कर्मयोगके अभ्याससे कल या दूसरे जन्मोंमें आप-ही-आप ढीला हो जाता है; और ऐसा होते होते “ बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ” ( गीता ७. १९ ) – कभी-न-कभी पूर्ण ज्ञानकी प्राप्ति होनेसे प्रकृतिका बंधन या पराधीनता छूट जाती है; एवं अंतमें आत्मा अपने मूलकी पूर्ण निर्गुण मुक्तावस्थाको अर्थात् मोक्षदशाको पहुँच जाता है। मनुष्य क्या नहीं कर सकता है ? “ नर करनी करे, तो नरका नारायण होय ” यह जो कहावत प्रचलित है, वह वेदान्तके उक्त सिद्धान्तकाही अनुवाद है, और इसीलिये योगवासिष्ठकारने मुमुक्षु-प्रकरणमें उद्योगकी खूब प्रशंसा की है; तथा असंदिग्ध रीतिसे कहा है, कि अंतमें सब कुछ उद्योगसेही मिलता है ( यो. २. ४. १०-१८ ) । यह सिद्धहो चुका, कि ज्ञान-प्राप्तिका प्रयत्न करनेके लिये जीवात्मा मूलमें स्वतंत्र है; और स्वावलंबनपूर्वक दीर्घोद्योगसे उसे कभी-न-कभी प्राक्तन-कर्मके पंजेसे छुटकारा मिल जाता है। अब इस बातका थोड़ा-सा स्पष्टीकरण और हो जाना चाहिये, कि कर्मक्षय किसे कहते हैं ? और वह कब होता है ? कर्मक्षयका अर्थ है – सभी कर्मोंके बंधनोंसे पूर्ण अर्थात् निःशेष मुक्ति पाना । परंतु पहले कह चुके हैं, कि कोई पुरुष ज्ञानीभी हो जाय; तथापि जबतक उसका शरीर है, तबतक सोना, बैठना, भूख, प्यास इत्यादि कर्म छूट नही सकते; और प्रारब्धकर्मका बिना भोगे क्षयभी नहीं होता, इसलिये वह आग्रहसे देहका त्यागभी नहीं कर सकता । इसमें संदेह नहीं, कि ज्ञान होनेके पूर्व किये गये सब कर्मोंका नाश, ज्ञान होने पर हो जाता है; परंतु जब कि ज्ञानी पुरुषको ज्ञानोत्तरकालमेंभी यावज्जीवन कुछ-न-कुछ कर्म करना ही पड़ता है, तब ऐसे कर्मोंसे उसका छुटकारा कैसे होगा ? और, यदि छुटकारा न हो, तो यह शंका उत्पन्न होती है, कि फिर पूर्वकर्म-क्षय या आगे मोक्षभी न होगा । इसपर वेदान्तशास्त्रका उत्तर यह है, कि ज्ञानी मनुष्यकी नाम-रूपात्मक देहको नामरूपात्मक कर्मोंसे यद्यपि कभी छुटकारा नहीं मिल सकता, तथापि इन कर्मोंको अपने ऊपर लाद लेने या न लेनेमें आत्मा पूर्ण रीतिसे स्वतंत्र है; इसलिये यदि इंद्रियों पर विजय प्राप्त करके – कर्मके विषयमें प्राणिमात्रको जो, आसक्ति होती है – केवल उसकाही क्षय किया जाय, तो ज्ञानी मनुष्य कर्म करकेभी उसके फलका भागी नही होता । कर्म स्वभावतः अंधा, अचेतन या मृत होता है । वह स्वयं न तो किसीको पकड़ता है, और न किसीको छोड़ताभी है । वह स्वयं न अच्छा है, न बुरा । मनुष्य अपने जीवको इन कर्मोंमें फंसा कर इन्हें अपनी आसक्तिसे अच्छा या बुरा और शुभ या अशुभ बना लेता है। इसलिये कहा जा सकता है, कि इस