भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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ममत्वयुक्त आसक्तिके छूटनेपर कर्मके बंधन आपही टूट जाते हैं, फिर चाहे वे कर्म बने रहें या न रहें। गीतामेभी स्थान स्थान पर यही उपदेश दिया गया है, कि सच्चा 'नैष्कर्म्य इसीमें है; कर्मका त्याग करनेमें नहीं (गीता ३. ४)। तेरा अधिकार केवल कर्म करनेका है, फलका मिलना न मिलना तेरे अधिकारकी बात नहीं है (गीता २. ४७)। “कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः” (गीता ३. ७) - फलकी आशा न रख कर्मेन्द्रियोंको कर्म करने दे। “त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्” (गीता ४. २०) कर्मफलका त्याग करके, “सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते” (गीता ५. ७)- जिन पुरुषोंकी समस्त प्राणियोंमें समबुद्धि हो जाती है, उनके किये हुए कर्म उनके बंधनका कारण नहीं हो सकते। “सर्वकर्मफलत्यागं कुरु” (गीता १२. ११) - सब कर्मफलोंका त्याग कर। “कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियते” (गीता १८. ९) - केवल कर्तव्य समझकर जो प्राप्त कर्म किया जाता है, वही सात्त्विक है। “चेतसा सर्व कर्माणि मयि संन्यस्य” (गीता १८. ५७) सब कर्मोंको मुझे अर्पण करके बर्ताव कर। इन सब उपदेशोंका रहस्य वही है, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है। अब यह एक स्वतंत्र प्रश्न है, कि ज्ञानी मनुष्योंको सब व्यावहारिक कर्म करने चाहिये या नहीं। इसके संबंधमें गीताशास्त्रका जो सिद्धान्त है, उसका विचार अगले प्रकरणमें किया जायगा। अभी तो केवल यही देखना है, कि ज्ञानसे सब कर्मोंके भस्म हो जानेका अर्थ क्या है? और ऊपर दिये गये वचनोंसे इस विषयमें गीताका जो अभिप्राय है, वह भली भाँति प्रकट हो जाता है। व्यवहार- मेंभी इसी न्यायका उपयोग किया जाता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्यको अनजाने धक्का दे दे, तो हम उसे उद्दंड नहीं कहते और इसी तरह यदि केवल दुर्घटनासे किसीकी हत्या हो जाती है, तो उसे फ़ौजदारी कानूनके अनुसारभी खून नहीं समझते। अग्निसे जब घर जल जाता है, अथवा वर्षासे सैकड़ों खेत बह जाते हैं; तो क्या अग्नि या वर्षाको कोई दोषी समझता है? केवल कर्मोंकीही ओर देखें, तो मनुष्यकी दृष्टिसे प्रत्येक कर्ममें कुछ-न-कुछ कमी, दोष या अवगुण अवश्यही मिलेगा - “सर्वारंभाहि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृत्तः” (गीता १८. ४८)। परंतु यह वह दोष नहीं है, कि जिसे छोड़नेके लिये गीता कहती है। मनुष्यके किसी कर्मको जिस अर्थमें हम अच्छा या बुरा कहते हैं, वह अच्छापन या बुरापन यथार्थमें उस कर्ममें नहीं रहता किंतु कर्म करनेवाले मनुष्यकी बुद्धिपर निर्भर रहता है; इसी बातपर ध्यान देकर गीतामें (गीता २. ४९-५१) कहा है, कि इन कर्मोंके बुरेपनको दूर करनेके लिये कर्ताको चाहिये, कि वह अपने मन और बुद्धिको शुद्ध रखे; और उपनिषदोंमेंभी कर्ताकी इसी बुद्धिको प्रधानता दी गई है। जैसे :- मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः। बंधाय विषयासंगि मोक्षे निर्विषयं स्मृतम् ॥ “मनुष्यके (कर्मोंका) बंधन या मोक्ष पानेका मनही (एव) कारण है। मनके