भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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विषयासक्त होनेसे बंधन और निष्काम या निर्विषय अर्थात् निःसंग होनेसे मोक्ष प्राप्त होता है” (मैत्र्यु. ६. ३४; अमृतबिंदु. २)। गीतामें यही बात प्रधानतासे बतलाई गई है, कि ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानसे बुद्धिकी उक्त साम्यावस्था कैसे प्राप्त- कर लेनी चाहिये। इस अवस्थाके प्राप्त हो जानेपर कर्म करने परभी पूरा कर्म-क्षय हो जाया करता है। निरग्नि होकर-अर्थात् संन्यास लेकर अग्निहोत्र आदि कर्मोंको छोड़ देनेसे-अथवा अक्रिय रहनेसे-अर्थात् किसीभी कर्मको न कर चुपचाप बैठे रहनेसे-कर्मका क्षय नहीं होता (गीता ६. १)। चाहे मनुष्यकी इच्छा रहे या न रहे; परंतु प्रकृतिका चक्र हमेशा घूमताही रहता है; जिसके कारण मनुष्यकोभी उसके साथ अवश्यही चलना पड़ेगा (गीता ३. ३३; १८. ६०)। परंतु अज्ञानी जन ऐसी स्थितिमें प्रकृतिकी पराधीनतामें रहकर जैसे नाचा करते हैं, वैसे न करके जो मनुष्य अपनी बुद्धिको इंद्रियनिग्रहके द्वारा स्थिर एवं शुद्ध रखता है और सृष्टिक्रमके अनुसार अपने हिस्सेके (प्राप्त) कर्मोंको केवल कर्तव्य समझकर अनासक्त बुद्धिसे एवं शांतिपूर्वक किया करता है; वही सच्चा विरक्त है, वही सच्चा स्थितप्रज्ञ है; और उसीको ब्रह्मपदपर पहुँचा हुआ कहना चाहिये (गीता ३. ७; ४. २१; ५. ३-९; १८. ११)। यदि कोई ज्ञानी पुरुष किसीभी व्यावहारिक कर्मको न करके संन्यास लेकर जंगलमें जा बैठे; तो उस प्रकार व्यावहारिक कर्मोंको छोड़ देनेसे यह समझना बड़ी भारी भूल है, कि उसके कर्मोंका क्षय हो गया (गीता ३. ४)। इस तत्त्वपर हमेशा ध्यान देना चाहिये, कि कोई कर्म करे या न करे; परंतु उसके कर्मोंका क्षय उसकी बुद्धिकी साम्यावस्थाके कारण होता है; न कि कर्मोंको छोड़नेसे या न करनेसे। कर्मक्षयका सच्चा स्वरूप दिख- लानेके लिये यह उदाहरण दिया जाता है, कि जिस तरह अग्निसे लकड़ी जल जाती है, उसी तरह ज्ञानसे सब कर्म भस्म हो जाते हैं। परंतु इससे उपनिषदोंमें और गीतामें दिया गया यह दृष्टान्त अधिक समर्पक है, कि जिस तरह कमलपत्र पानीमें रह करभी पानीसे अलिप्त रहता है, उसी तरह ज्ञानी पुरुषको-अर्थात् ब्रह्मार्पण करके अथवा आसक्ति छोड़कर कर्म करनेवालेको-कर्मोंका लेप नहीं होता (छां. ४. १४. ३; गीता ५. १०)। कर्म स्वरूपतः कभी जलतेही नहीं और उन्हें जलानेकी कोई आवश्यकताभी नहीं है। जब यह बात सिद्ध है, कि कर्म नामरूप है और नामरूप दृश्य सृष्टि है; तब यह समस्त दृश्य सृष्टि जलेगी कैसे ? और कदाचित् जलभी जाय, तो सत्कार्यवादके अनुसार सिर्फ यही होगा, कि उसका नामरूप बदल जायगा। नामरूपात्मक कर्म या माया हमेशा बदलती रहती है, इस- लिये मनुष्य अपनी रुचिके अनुसार इस नामरूपमें भलेही परिवर्तन करले परंतु इस बातको नहीं भूलना चाहिये, कि वह चाहे कितनाही आत्म-ज्ञानी हो; परंतु इस नामरूपात्मक कर्म या मायाका समूल नाश कदापि नहीं कर सकता, – यह काम केवल परमेश्वरसेही हो सकता है (वे. सू. ४. ४. १७)। हाँ; मूलमें इन जड़ गी. र. १९