श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र विशुद्धधर्मा शुद्धेन बुद्धेन च स बुद्धिमान् ॥ विमलात्मा च भवति समेत्य विमलात्मना ॥ स्वतंत्रश्च स्वतंत्रेण स्वतंत्रत्वमवाप्नुते । “वह जीवात्मा या शारीर आत्मा - जो मूलमें स्वतंत्र है - ऐसे परमात्मामें मिल जाता है, जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध, निर्मल और स्वतंत्र है” (मभा. शां. ३०८. २७ -३०) । ऊपर जो कहा गया है, कि ज्ञानसे मोक्ष मिलता है. उसका यही अर्थ है। इसके विपरीत जब जड़ देहेंद्रियोंके प्राकृत धर्मकी - अर्थात् कर्मसृष्टिकी प्रेरणाकी - प्रबलता हो जाती है, तब मनुष्यकी अधोगति होती है। शरीरमें बँधे हुए जीवात्मामें, देहेंद्रियोंमें मोक्षानुकूल कर्म करनेकी तथा ब्रह्मात्मैक्यज्ञानसे मोक्ष प्राप्तकर लेनेकी, जो यह स्वतंत्र शक्ति है, उसकी ओर ध्यान देकरही भगवानने अर्जुनको आत्म-स्वातंत्र्य अर्थात् स्वावलंबनके तत्त्वका उपदेश किया है, कि :- उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ “ मनुष्यको चाहिये, कि वह अपना उद्धार आपही करे। निराशासे वह अपनी अवनति आपही न करे। क्योंकि प्रत्येक मनुष्य स्वयं अपना बंधु (हितकारी) है; और स्वयं अपना शत्रु (नाशकर्ता) है” (गीता ६.५); और इसी हेतुसे योगवासिष्ठमें (यो. २. सर्ग ४-८) दैवका निराकरण करके पौरुषके महत्त्वका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। जो मनुष्य इस तत्त्वको पहचान कर आचरण किया करता है, कि सब प्राणियोंमें एकही आत्मा है, उसके इसी आचरणको सदा- चरण या मोक्षानुकूल आचरण कहते हैं। और बद्ध जीवात्माकाभी यही स्वतंत्र धर्म है, कि ऐसे आचरणकी ओर देहेंद्रियोंको प्रवृत्त किया करे। इसी धर्मके कारण दुराचारी मनुष्यका अंतःकरणभी सदाचरणहीका पक्ष लिया करता है, जिससे उसे अपने किये हुए दुष्कर्मोंका पश्चात्ताप होता है। आधिदैवत पक्षके पंडित इसे सदसद्विवेक-बुद्धिरूपी देवताकी स्वतंत्र स्फूर्ति कहते हैं। परंतु तात्त्विक दृष्टिसे विचार करने पर विदित होता है, कि बुद्धींद्रिय जड़ प्रकृतिकीका विकार होनेके कारण स्वयं अपनीही प्रेरणासे कर्मके नियम-बंधनोंसे मुक्त नहीं हो सकती, यह प्रेरणा उसे कर्मसृष्टिके बाहरके आत्मासे प्राप्त होती है। इसी प्रकार पश्चिमी पंडितोंका 'इच्छा-स्वातंत्र्य' शब्दभी वेदान्तकी दृष्टिसे ठीक नहीं है ! क्योंकि इच्छा मनका धर्म है और आठवें प्रकरणमें कहा जा चुका है, कि बुद्धि तथा उसके साथ साथ मनभी कर्मात्मक जड़ प्रकृतिके असंवेद्य विकार हैं। इसलिये ये दोनों स्वयंही कर्मके बंधनसे छूट नहीं सकते । अतएव वेदान्तशास्त्रका निश्चय है, कि सच्चा स्वातंत्र्य न तो बुद्धिका है और न मनका-वह केवल आत्माका है। यह स्वातंत्र्य न तो कोई आत्माको देता है और न कोई उससे इसे छीनभी सकता है
- स्वतंत्र परमात्माका अंशरूप जीवात्मा जब उपाधिके बंधनमें पड़ जाता है, तब