श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भेद है। कर्मकाण्डका मूल उद्देश्य यह है, कि सूर्य, अग्नि, इंद्र, वरुण, रुद्र, इत्यादि वैदिक देवताओंका यज्ञ-द्वारा पूजन किया जावे और उनके प्रसादसे इस लोकमें पुत्र- पौत्र आदि संतति तथा गौ, अश्व, धन, धान्य आदि संपत्ति प्राप्त कर ली जावे; और अंतमें मरनेपर सद्गति प्राप्त होवे। वर्तमान कालमें यह यज्ञ-याग आदि श्रौत धर्म प्रायः लुप्त हो गया है। इससे उक्त उद्देश्यको सिद्ध करनेके लिये लोग देवभक्ति तथा दानधर्म आदि शास्त्रोक्त पुण्यकर्म किया करते हैं। परंतु ऋग्वेदसे स्पष्टतया मालूम होता है, कि प्राचीन कालमें लोग - न केवल स्वार्थके लिये; बल्कि सर्व समाजके कल्याणके लियेभी - यज्ञ द्वाराही देवताओंकी आराधना किया करते थे। इस कामके लिये जिन इंद्र आदि देवताओंको अनुकूलताका संपादन करना आवश्यक है, उनकी स्तुतिमेही ऋग्वेदके सूक्त भरे पड़े हैं, और उनमें स्थल-स्थलपर ऐसी प्रार्थना की गई है, कि "हे देव हमें संतति और समृद्धि दो।" "हमें शतायु करो।" हमें, हमारे लड़कों-बच्चोंको और हमारे वीर-पुरुषोंको तथा हमारे जानवरोंको न मारो।* ये'यज्ञ-याग तीनों वेदोंमें विहित हैं, इसलिये इस मार्गका पुराना नाम 'त्रयी धर्म' है; और ब्राह्मणग्रंथोंमें इन यज्ञोंकी विधियोंका विस्तृत वर्णन किया गया है, परंतु भिन्न भिन्न ब्राह्मणग्रंथोंमें यज्ञ करनेकी भिन्न भिन्न विधियां हैं। इससे आगे शंका होने लगी, कि कौन-सी विधि ग्राह्य है; तब इन परस्पर-विरुद्ध वाक्योंकी एकवाक्यता करनेके लिये जैमिनीने अर्थनिर्णायक नियमोंका संग्रह किया। जैमिनीके इन नियमोंकोही मीमांसासूत्र या पूर्वमीमांसा कहते हैं, और इसी कारणसे इस प्राचीन कर्मकांडको मीमांसामार्ग नाम मिला तथा हमनेभी इसी नामका इस ग्रंथमें कई बार उपयोग किया है, क्योंकि आजकल यही प्रचलित हो गया है। परंतु स्मरण रहे, कि यद्यपि 'मीमांसा' शब्दही आगे चलकर प्रचलित हो गया है, तथापि यज्ञ- यागादिका यह कर्म-मार्ग बहुत प्राचीन कालसे चलता आया है। यही कारण है, कि गीतामें 'मीमांसा' शब्द कहींभी नहीं आया है; किंतु उसके बदले 'त्रयी धर्म' (गीता ९. २०, २१) या 'त्रयी विद्या' ये नाम आये हैं। यज्ञयाग आदि श्रौतकर्म-प्रतिपादक ब्राह्मणग्रंथोंके बाद आरण्यक और उपनिषद्, ये वैदिक ग्रंथ बने। इनमें यह प्रतिपादन किया गया है, कि यज्ञ-याग आदि कर्म गौण हैं और ब्रह्मज्ञानही श्रेष्ठ है, इसलिये इनके धर्मको 'ज्ञानकांड' कहते हैं। परंतु भिन्न भिन्न उपनिषदोंमें भिन्न भिन्न विचार हैं। इसलिये उनकीभी एकवाक्यता करनेकी आवश्यकता हुई; और इस कार्यको बादरायणाचार्यने अपने वेदान्तसूत्रोंमें किया। इस ग्रंथको ब्रह्मसूत्र अथवा शारीरसूत्र या उत्तर-मीमांसा कहते हैं। इस प्रकार पूर्व-मीमांसा तथा उत्तर-मीमांसा, क्रमसे *ये मंत्र अनेक स्थलोंपर पाये जाते हैं; परंतु उन सबको न दे कर यहाँ केवल एकही मंत्र बतलाना बस होगा, कि जो बहुत प्रचलित है। वह यह है - "मा नस्तोके तनये मा न आयौ मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः। वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे" (ऋ. १. ११४. ८)।