श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २९१ असंभवही है । इसीलिये गीताका दूसरा महत्त्वपूर्ण कथन यह है कि मनको विषय- वासनारहित बनानेके लिये प्रत्येक मनुष्यको सदैव अभ्यास करते रहना चाहिये, जिसका फल यह होगा कि अंतकालमेंभी यही स्थिति बनी रहेगी; और मुक्तिभी अवश्य हो जायगी (गीता ८. ६, ७. तथा २. ७२) । परंतु शास्त्रकी छानबीन करनेके लिये मान लीजिये, कि पूर्व संस्कार आदि कारणोंसे किसी मनुष्यको केवल मृत्यु- समयमेंही एकाएक ब्रह्म-ज्ञान हो गया । निस्संदेह ऐसा उदाहरण लाखों या करोड़ों मनुष्योंमें एक-आधही मिल सकेगा । परंतु, चाहे ऐसा उदाहरण मिले या न मिले - इस विचारको एक ओर रखकर अब हमें यही देखना है, कि यदि ऐसी स्थिति प्राप्त हो जाय, तो आगे क्या होगा ? ज्ञान चाहे मरण-कालमेंही क्यों न हो; परंतु उससे मनुष्यके अनारब्ध-कार्य-संचितका क्षय होताही है; और इस जन्मके भोगसे आरब्ध-संचितका क्षय मृत्युके समय हो जाता है । इसलिये उसे कुछभी कर्म भोगना बाकी नहीं रह जाता है; और यही सिद्ध होता है, कि वह सब कर्मोंसे अर्थात् संसारचक्रसे मुक्त हो जाता है। यही सिद्धान्त गीताके इस वाक्यमें कहा गया है, “अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ” (गीता ९. ३०) - यदि कोई बड़ा दुराचारी मनुष्यभी परमेश्वरका अनन्य भावसे स्मरण करेगा, तो वहभी मुक्त हो जायगा । और यह सिद्धान्त संसारके अन्य सब धर्मोंमेंभी ग्राह्य माना गया है । 'अनन्य भाव 'का यही अर्थ है, कि परमेश्वरमे मनुष्यकी चित्तवृत्ति पूर्ण रीतिसे लीन हो जावे । स्मरण रहे, कि मुँहसे तो 'राम राम' बड़बड़ाते रहें; और चित्त- वृत्ति दूसरीही ओर रहे; तो इसे अनन्य भाव नहीं कहेगा । सारांश, परमेश्वर- ज्ञानकी महिमाही ऐसा है, कि ज्योंही ज्ञानकी प्राप्ति हुई, त्योंही सब अनारब्ध- संचितका एकदम क्षय हो जाता है - यह अवस्था कभीभी प्राप्त हो, सदैव इष्टही है । परंतु यह अति आवश्यक बात है, कि कमसे कम मृत्युके समय यह स्थिर बनी रहें; या यदि पहले प्राप्त न हुई हो, तो कम-से-कम मृत्युके समय वह प्राप्त होवे । नहीं तो हमारे शास्त्रकारोंके कथनानुसार मृत्युके समय कुछ-न-कुछ वासना अवश्यही बाकी रह जायगी, जिससे पुनः जन्म लेना पड़ेगा और उसमे मोक्षभी नहीं मिलेगा । इसका विचार हो चुका, कि कर्मबंधन क्या है ? कर्मक्षय किसे कहते हैं ? वह कैसे और कब होता है ? अब प्रसंगानुसार इस बातकाभी कुछ विचार किया जायगा, कि जिनके कर्मफल नष्ट हो गये हैं, उनको और जिनके कर्मबंधन नहीं छूटे हैं, उनको मृत्युके अनंतर वैदिक धर्मके अनुसार कौन-सी गति मिलती है ? इसके संबंधमें उपनिषदोंमें बहुत चर्चा की गई है (छां. ४. १५; ५. १०; बृ. ६. २. २-१६; कौषी. १. २-३ ), और उसकी एकवाक्यता वेदान्तसूत्रके चौथे अध्यायके तीसरे पादमे की गई है । परंतु उस सब चर्चाको यहाँ बतलानेकी कोई आवश्यकता नहीं है । हमे केवल उन्ही दो मार्गोंका विचार करना है, जो भगवद्गीतामें (गीता ८. २३-२७) दिये गये हैं । वैदिक धर्मके ज्ञानकांड और कर्मकांड, ये दो प्रसिद्ध