श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र समय मरे – यदि वह ज्ञानी हो तो अपने कर्मानुसार प्रकाशमय मार्गसे, और केवल कर्मकांडी हो तो अंधकारमय मार्गसे, परलोकको जाता है। चाहे फिर दिवस और उत्तरायण आदि शब्दोंसे बादरायणाचार्यके कथनानुसार देवता समझिये; या लक्षणासे प्रकाशमय मार्गके क्रमशः बढ़ते हुए सोपान समझिये; परंतु इससे इस सिद्धान्त में कुछ भेद नहीं होता, कि यहाँ देवयान और पितृयाण शब्दोंका रूढार्थ मार्गवाचक है। परंतु क्या देवयान और क्या पितृयाण, दोनों मार्ग शास्त्रोक्त अर्थात् पुण्यकर्म करनेवालेकोही प्राप्त हुआ करते हैं; क्योंकि पितृयाण यद्यपि देवयानसे नीचेकी श्रेणीका मार्ग है, तथापि वहभी चंद्रलोकको अर्थात् एक प्रकारके स्वर्गलोकहीको पहुँचानेवाला मार्ग है। इसलिये प्रकट है, कि वहाँ सुख भोगनेकी पात्रता होनेके लिये इस लोकमें कुछ न कुछ शास्त्रोक्त पुण्यकर्म अवश्यही करना पड़ता है (गीता ९. २०, २१)। अतः जो लोग थोड़ाभी शास्त्रोक्त पुण्यकर्म न करके संसारमें अपना समस्त जीवन पापाचरणमें बिता देते हैं, वे इन दोनोंमेंसे किसीभी मार्गसे नहीं जा सकते। इनके विषयमें उपनिषदोंमें स्पष्ट कहा गया है, कि ये लोग मरनेपर एकदम पशु-पक्षी आदि तिर्यक्-योनिमें जन्म लेते हैं और बारंबार यमलोक अर्थात् नरकमें जाते हैं। इसीको 'तीसरा' मार्ग कहते हैं। (छा. ५. १०. ८; कठ. २. ६. ७); और भगवद्गीतामेंभी कहा गया है, कि निपट पापी अर्थात् आसुरी पुरुषोंको यही-निरय-गति प्राप्त होती है (गीता १६. १९–२१; ९. १२.; वे. सू. ३. १. १२, १३; निरुक्त १४. ९)। ऊपर इस बातका विवेचन किया गया है, कि मरनेपर मनुष्यको उसके कर्मा- नुरूप वैदिक धर्मके प्राचीन परंपरानुसार तीन प्रकारकी गति किस क्रमसे प्राप्त होती है। इनमेंसे केवल देवयान मार्गही मोक्षदायक है; परंतु यह मोक्ष क्रम-क्रमसे अर्थात् एकके बाद एक, अर्चिरादि कई सोपान चढ़नेपर अंतमें मिलता है। इसलिये इस मार्गको 'क्रममुक्ति' कहते हैं। और देहपात होनेके अनंतर अर्थात् मृत्युके अनंतर ब्रह्मलोकमें जानेसे वहाँ अंतमें मुक्ति मिलती है; इसीलिये इसे 'विदेह-मुक्ति'भी कहते हैं। परंतु इन सब बातोंके अतिरिक्त शुद्ध अध्यात्मशास्त्रका यहभी कथन है, कि जिसके मनमें ब्रह्म और आत्माके एकत्वका पूर्ण साक्षात्कार नित्य जागृत है, उसे ब्रह्मप्राप्तिके लिये कहीं दूसरी जगह क्यों जाना पड़ेगा ? अथवा उसे मृत्यु-कालकीभी बाँट क्यों जोहनी पड़ेगी ? यह बात सच है, कि उपासनाके लिये स्वीकृत किये गये सूर्यादि प्रतीकोंको अर्थात् सगुण ब्रह्मकी उपासनासे जो ब्रह्मज्ञान होता है, वह पहले पहल कुछ अपूर्ण रहता हैं; क्योंकि उससे मनमें सूर्यलोक या ब्रह्मलोक इत्यादिकी कल्पनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और इनके मरण-समयमेंभी मनमें न्यूनाधिक परिमाणके बने रहनेकी संभावना होती हैं। अतएव यह कहना उचित है कि इस अपूर्णताको दूर करके मोक्षकी प्राप्तिके लिये ऐसे लोगोंको देवयान मार्गसेही जाना पड़ता है (वे. सू. ४. ३ १५)। क्योंकि अध्यात्मशास्त्रका यह अटल सिद्धान्त है,