भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 956 में से

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पृष्ठ 346

कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य ३०१ कि मरण-समयमें जिसकी जैसी भावना या ऋतु हो, उसे वैसीही 'गति' मिलती है (छां. ३. १४. १); परंतु सगुण उपासना या अन्य किसी कारणसे जिसके मनमें अपने आत्मा और ब्रह्मके बीच कुछभी परदा या द्वैतभाव (तै. २. ७) शेष नहीं रह जाता, वह सदैव ब्रह्म-रूपीही है। अतएव प्रकट है, कि, ऐसे पुरुषको ब्रह्म-प्राप्तिके लिये किसी दूसरे स्थानमें जानेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसीलिये बृहदारण्यकमें याज्ञवल्क्यने जनकसे कहा है, कि जो पुरुष शुद्ध ब्रह्मज्ञानसे पूर्ण निष्काम हो गया हो – “न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति” – उसके प्राण दूसरे किसीभी स्थानमें नहीं जाते; किंतु वह नित्य ब्रह्मभूत है और ब्रह्ममेही लय पाता है (बृ. ४. ४. ६); और बृहदारण्यक तथा कठ, इन दोनों उपनिषदोंमें कहा गया है, कि ऐसा पुरुष “अत्र ब्रह्म समश्नुते” (कठ. ६. १४) – यहींका यहीं ब्रह्मका अनुभव करता है। इन्हीं श्रुतियोंके आधारपर शिवगीतामेंभी कहा गया है, कि मोक्षके लिये स्थानांतर करनेकी आवश्यकता नहीं होती। ब्रह्म कोई ऐसी वस्तु नहीं है, कि जो अमुक स्थानमें हो और अमुक स्थानमें न हो (छां. ७. २५; मुं. २. २. ११)। तो फिर पूर्ण ज्ञानी पुरुषको कभीभी पूर्ण ब्रह्म-प्राप्तिके लिये उत्तरायणसे सूर्यलोक आदि मार्गसे जानेकी आवश्यकता क्यों होनी चाहिये ? “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति” (मुं. ३. २. ९) – जिसने ब्रह्मस्वरूपको पहचान लिया; वह तो स्वयं इस लोकमें था – यहींका यहीं, ब्रह्म – हो गया। क्योंकि किसी एकका दूसरेके पास जाना तभी हो सकता है, जब 'एक' और 'दूसरा' ऐसा स्थलकृत या कालकृत भेद शेष हो; और यह भेद तो अंतिम स्थितिमें अर्थात् अद्वैत तथा श्रेष्ठ ब्रह्मानुभवमें रहही नहीं सकता। इसलिये जिसके मनकी ऐसी नित्य स्थिति हो चुकी है, कि “यस्य सर्वमात्मैवाऽभूत्” बृ. २. ४. १४), या “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” (छां. ३. १४. १), अथवा मैंही ब्रह्म हूँ – “अहं ब्रह्माऽस्मि”(बृ. १. ४. १०), वह ब्रह्म- प्राप्तिके लिये और किस जगह जायेगा ? वह तो नित्य ब्रह्मभूतहो रहता है। पिछले प्रकरणके अंतमें जैसे हमने कहा है, वैसेही गीतामें परम ज्ञानी पुरुषोंका वर्णन इस प्रकार किया गया है, कि “अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्” (गीता ५. २६) – जिन्होंने द्वैतभावको छोड़कर आत्मस्वरूपको जान लिया है, उन्हें चाहे प्रारब्ध-कर्म-क्षयके लिये देहपात होनेकी राह देखनी पड़े, तोभी उन्हें मोक्ष-प्राप्तिके लिये कहींभी नहीं जाना पड़ता; क्योंकि ब्रह्मनिर्वाणरूप मोक्ष तो उनके सामने हाथ जोड़े खड़ा रहता है। अथवा “इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः” (गीता ५. १९)। – जिनके मनमें सर्वभूतांतर्गत ब्रह्मात्मैक्यरूपी साम्य प्रति- बिंबित हो गया है वे (देवयान मार्गकी अपेक्षा न रख) यहींके यहीं जन्म-मरणको जीत लेते हैं। अथवा “भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति” – जिसकी ज्ञानदृष्टिमें समस्त प्राणियोंकी भिन्नताका नाश हो चुका है और जिसे वे सब एकस्थ अर्थात् परमेश्वर- स्वरूप दीखने लगते हैं, वह 'ब्रह्म संपद्यते' – ब्रह्ममेंही मिल जाता है (गीता १३.

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