श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ३०)। गीताका जो वचन ऊपर दिया गया है, कि "देवयान और पितृयाण मार्गोंको तत्त्वतः जाननेवाला कर्मयोगी मोहको प्राप्त नहीं होता" (गीता ८. २१); उसमेंभी "तत्त्वतः जाननेवाला" पदका अर्थ "परमावधिके ब्रह्मस्वरूपको पहचाननेवाला" ही विवक्षित है (भागवत ७. १५. ५६)। यही पूर्ण ब्रह्मभूत या परमावधिकी ब्राह्मी स्थिति है; और श्रीमच्छंकराचार्यने अपने शारीरक भाष्यमें (वे. सू. ३. ४. १४) प्रतिपादन किया है, कि यही अध्यात्मज्ञानकी अत्यंत परा- काष्ठा या पूर्णावस्था है। यदि कहा जाय, कि ऐसी स्थिति प्राप्त होनेके लिये मनुष्यको एक प्रकारसे परमेश्वरही हो जाना पड़ता है, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। और फिर यह कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि इस रीतिसे जो पुरुष ब्रह्मभूत हो जाते हैं, कर्मसृष्टिके सब विधि-निषेधोंकी अवस्थासेभी परे रहते हैं; क्योंकि उनका ब्रह्मज्ञान सदैव जागृत रहता है और इसलिये जो कुछ वे किया करते हैं, वह हमेशाही शुद्ध और निष्काम बुद्धिसेही प्रेरित अतएव पाप-पुण्यसे अलिप्त रहता है। इस स्थितिकी प्राप्ति हो जानेपर ब्रह्मप्राप्तिके लिये किसी अन्य स्थानमें जानेकी, अथवा देहपात होनेकी, अर्थात् मरनेकीभी कोई आवश्यकता नहीं रहती, इसलिये ऐसे स्थितप्रज्ञ ब्रह्मनिष्ठ पुरुषको 'जीवन्मुक्त' कहते हैं (यो. ३. ०)। यद्यपि बौद्ध धर्मके लोग ब्रह्म या आत्माको नहीं मानते, तथापि उन्हें यह बात पूर्णतया मान्य है, कि मनुष्यका परम साध्य जीवन्मुक्तकी यह निष्काम अवस्थाही है; और इसी तत्त्वका संग्रह उन्होंने, कुछ शब्दभेदसे, अपने धर्ममें किया है (परिशिष्ट प्रकरण देखो) बहुतेरे लोगोंका कथन है, कि पराकाष्ठाके निष्कामत्वकी इस अवस्थामें और सांसारिक कर्मोंमें निमग्नकेही परस्पर-विरोध है; इसलिये जिसे यह अवस्था प्राप्त होती है, उसके सब कर्म आपही आप छूट जाते हैं और वह संन्यासी हो जाता है। परंतु गीताको यह मत मान्य नहीं है; और उसका यही सिद्धान्त है, कि स्वयं परमेश्वर जिस प्रकार कर्म करता है, उसी प्रकार जीवन्मुक्तके लियेभी- निष्काम बुद्धिसे लोकसंग्रहके निमित्त- मृत्युपर्यंत सब व्यवहारोंको करते रहनाही अधिक श्रेयस्कर है; क्योंकि निष्कामत्व और कर्ममें कोई विरोध नहीं है। यह बात अगले प्रकरणके निरूपणमें स्पष्ट हो जायगी। गीताका यह तत्त्व योगवासिष्ठ (यो. ६. उ. १९९) मेंभी स्वीकृत किया गया है!