श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
DevanagariHindipublished956 पृष्ठ
पृष्ठ 348, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 348
ग्यारहवाँ प्रकरण संन्यास और कर्मयोग संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते ॥ *
- गीता ५. २ पिछले प्रकरणमें इस बातका विस्तृत विचार किया गया है, कि अनादि कर्मके चक्करोंसे छूटनेके लिये प्राणिमात्रमें एकत्वसे रहनेवाले परब्रह्मका अनुभवात्मक ज्ञान होनाही एकमात्र उपाय है; और यह विचारभी किया गया है, कि इस अमृत ब्रह्मका ज्ञान संपादन करनेके लिये मनुष्य स्वतंत्र है या नहीं, एवं इस ज्ञानकी प्राप्तिके लिये मायासृष्टिके अनित्य व्यवहार अथवा कर्म वह किस प्रकार करे । अंतमें यह सिद्ध किया है, कि बंधन कुछ कर्मका धर्म या गुण नही है; किंतु मनका है। इसलिये व्यावहारिक कर्मोंके फलके बारेमें जो अपनी आसक्ति होती है, उसे इंद्रिय-निग्रहसे धीरे धीरे घटा कर, शुद्ध अर्थात् निष्काम बुद्धिसे कर्म करते रहनेपर, कुछ समयके बाद साम्यबुद्धिरूप आत्मज्ञान देहेंद्रियोंमें समा जाता है; और अंतमें पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है । इस प्रकार इस बातका निर्णय हो गया, कि मोक्षरूपी परम साध्य अथवा आध्यात्मिक पूर्णावस्थाकी प्राप्तिके लिये किस साधन या उपायका अवलंबन करना चाहिये । इस प्रकारके बर्तावसे, अर्थात् यथाशक्ति और यथाधिकार निष्काम कर्म करनेसे, जब कर्मका बंधन छूट जाय तथा चित्तशुद्धि द्वारा अंतमें पूर्ण ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो जाय; तब यह महत्त्वका प्रश्न उपस्थित होता है, कि अब आगे अर्थात् सिद्धावस्था में ज्ञानी और स्थितप्रज्ञ पुरुष कर्मही करता रहे, अथवा प्राप्य वस्तुको पा कर कृतकृत्य हो, माया-सृष्टिके सब व्यवहारोंको निरर्थक और ज्ञानविरुद्ध समझ कर, एकदम उनका त्याग कर दे ? क्योंकि सब कर्मोंको बिलकुल छोड़ देना (कर्म- संन्यास), या उन्हें निष्काम बुद्धिसे मृत्यपर्यंत करते जाना (कर्मयोग), ये दोनों
- “संन्यास और कर्मयोग, दोनों निःश्रेयस्कर अर्थात् मोक्षदायक हैं; परंतु इन दोनोंमें कर्मसंन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगही अधिक श्रेष्ठ है।” दूसरे चरणके 'कर्म-संन्यास' पदसे प्रकट होता है, कि पहले चरणके, संन्यास शब्दका क्या अर्थ करना चाहिये । गणेश-गीताके चौथे अध्यायके आरंभमें गीताके ये प्रश्नोत्तर लिये गये हैं । वहाँ यह श्लोक थोड़े शब्दभेदसे इस प्रकार आया है - “क्रियायोगो वियोगश्चाप्युभौ मोक्षस्य साधने । तयोर्मध्ये क्रियायोगस्त्यागात्तस्य विशिष्यते ॥”