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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

ग्यारहवाँ प्रकरण संन्यास और कर्मयोग संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते ॥ *

  • गीता ५. २ पिछले प्रकरणमें इस बातका विस्तृत विचार किया गया है, कि अनादि कर्मके चक्करोंसे छूटनेके लिये प्राणिमात्रमें एकत्वसे रहनेवाले परब्रह्मका अनुभवात्मक ज्ञान होनाही एकमात्र उपाय है; और यह विचारभी किया गया है, कि इस अमृत ब्रह्मका ज्ञान संपादन करनेके लिये मनुष्य स्वतंत्र है या नहीं, एवं इस ज्ञानकी प्राप्तिके लिये मायासृष्टिके अनित्य व्यवहार अथवा कर्म वह किस प्रकार करे । अंतमें यह सिद्ध किया है, कि बंधन कुछ कर्मका धर्म या गुण नही है; किंतु मनका है। इसलिये व्यावहारिक कर्मोंके फलके बारेमें जो अपनी आसक्ति होती है, उसे इंद्रिय-निग्रहसे धीरे धीरे घटा कर, शुद्ध अर्थात् निष्काम बुद्धिसे कर्म करते रहनेपर, कुछ समयके बाद साम्यबुद्धिरूप आत्मज्ञान देहेंद्रियोंमें समा जाता है; और अंतमें पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है । इस प्रकार इस बातका निर्णय हो गया, कि मोक्षरूपी परम साध्य अथवा आध्यात्मिक पूर्णावस्थाकी प्राप्तिके लिये किस साधन या उपायका अवलंबन करना चाहिये । इस प्रकारके बर्तावसे, अर्थात् यथाशक्ति और यथाधिकार निष्काम कर्म करनेसे, जब कर्मका बंधन छूट जाय तथा चित्तशुद्धि द्वारा अंतमें पूर्ण ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो जाय; तब यह महत्त्वका प्रश्न उपस्थित होता है, कि अब आगे अर्थात् सिद्धावस्था में ज्ञानी और स्थितप्रज्ञ पुरुष कर्मही करता रहे, अथवा प्राप्य वस्तुको पा कर कृतकृत्य हो, माया-सृष्टिके सब व्यवहारोंको निरर्थक और ज्ञानविरुद्ध समझ कर, एकदम उनका त्याग कर दे ? क्योंकि सब कर्मोंको बिलकुल छोड़ देना (कर्म- संन्यास), या उन्हें निष्काम बुद्धिसे मृत्यपर्यंत करते जाना (कर्मयोग), ये दोनों
  • “संन्यास और कर्मयोग, दोनों निःश्रेयस्कर अर्थात् मोक्षदायक हैं; परंतु इन दोनोंमें कर्मसंन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगही अधिक श्रेष्ठ है।” दूसरे चरणके 'कर्म-संन्यास' पदसे प्रकट होता है, कि पहले चरणके, संन्यास शब्दका क्या अर्थ करना चाहिये । गणेश-गीताके चौथे अध्यायके आरंभमें गीताके ये प्रश्नोत्तर लिये गये हैं । वहाँ यह श्लोक थोड़े शब्दभेदसे इस प्रकार आया है - “क्रियायोगो वियोगश्चाप्युभौ मोक्षस्य साधने । तयोर्मध्ये क्रियायोगस्त्यागात्तस्य विशिष्यते ॥”

३०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

पक्ष तर्कदृष्टिसे इस स्थानपर संभव होते हैं। और इनमेंसे जो पक्ष श्रेष्ठ सिद्ध होगा, उसीकी ओर ध्यान दे कर पहलेसे (अर्थात् साधनावस्थासेही) बर्ताव करना सुविधाजनक होगा, इसलिये उक्त दोनों पक्षोंके तारतम्यका विचार किये बिना कर्म और अकर्मका कोईभी आध्यात्मिक विवेचन पूरा नहीं हो सकता। अर्जुनसे सिर्फ़ यह कह देनेसे काम नहीं चल सकता था, कि पूर्ण ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो जानेपर कर्मोंका करना और न करना एक-सा है (गीता ३. १८); क्योंकि समस्त व्यव- हारोंमें कर्मकी अपेक्षा बुद्धिकी श्रेष्ठता होनेके कारण, ज्ञानसे जिसकी बुद्धि समस्त भूतोंमें सम हो गई है, उसे आगे किसीभी कर्मके शुभाशुभत्वका लेप नहीं लगता (गीता ४. २०, २१)। भगवानका तो उसे यही निश्चित उपदेश था कि – युद्धही कर – युध्यस्व ! (गीता २. १८); और इस खरे तथा स्पष्ट उपदेशके समर्थनमें ज्ञान हो जानेपर “लड़ाई करे तो अच्छा, न करे तोभी अच्छा;” ऐसी संदिग्ध उप- पत्तिकी अपेक्षा और दूसरे कुछ सबल कारणोंका बतलाना आवश्यक था। और तो क्या, गीताशास्त्रकी प्रवृत्ति यह बतलानेके लियेही हुई है, कि किसी कर्मका भयंकर परिणाम दृष्टिके सामने देखते रहनेपरभी बुद्धिमान् पुरुष उसेही क्यों करे। गीताकी यही तो विशेषता है। यदि यह सत्य है, कि कर्मसे जंतु बँधता है और ज्ञानसे मुक्त होता है, तो ज्ञानी पुरुषको कर्म करनाही क्यों चाहिये ? कर्म-क्षयका अर्थ कर्मोंका छोड़ना नहीं है; केवल फलाशा छोड़ देनेसेही कर्मका क्षय हो जाता है, सब कर्मोंको छोड़ देना शक्य नहीं है; इत्यादि सिद्धान्त यद्यपि सत्य हों, तथापि इससे भली भाँति यह सिद्ध नहीं होता, कि जितने कर्म छूट सकें, उतनेभी क्यों न छोड़े जायें। और न्यायसे देखने परभी, यही अर्थ निष्पन्न होता है; क्योंकि गीतामेंही कहा है, कि चारों ओर पानीही पानी हो जाने पर जिस प्रकार फिर कोई उसके लिये कुएँकी खोज नहीं करता, उसी प्रकार कर्मोंसे सिद्ध होनेवाली ज्ञानप्राप्ति हो चुकनेपर ज्ञानी पुरुषको कर्मकी कुछभी अपेक्षा नहीं रहती (गीता २. ४६)। इसीलिये तीसरे अध्यायके आरंभमें अर्जुनने श्रीकृष्णसे प्रथम यही पूछा है, कि आपके मतमें यदि कर्मकी अपेक्षा निष्काम अथवा साम्यबुद्धि श्रेष्ठ है, तो स्थितप्रज्ञके समान मैंभी अपनी बुद्धिको शुद्ध किये लेता हूँ – बस, तब फिरभी लड़ाईके इस घोर कर्ममें मुझे क्यों फँसाते हो ? (गीता ३. १) इस प्रश्नकाभी उत्तर देते हुए भगवान् ने “कर्म किसीकेभी छूट नहीं सकते” इत्यादि कारण बतला कर, चौथे अध्यायमें कर्मका समर्थन किया है। परन्तु सांख्य (संन्यास) और कर्मयोग, दोनोंही मार्ग यदि शास्त्रोंमें बतलाये गये हैं, तो यही कहना पड़ेगा, कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर, इनमेंसे जिसे जो मार्ग अच्छा लगे, उसे वह स्वीकार कर ले। ऐसी दशामें, पाँचवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने फिर प्रार्थना की, कि गोलमाल करके दोनों मार्ग मुझे न बतलाइये; निश्चयपूर्वक मुझे एकही बात बतलाइये, कि इन दोनोंमेंसे अधिक श्रेष्ठ कौन है (गीता ५. १)। यदि ज्ञानोत्तर कर्म करना या न करना एकही सा है, तो फिर मैं अपनी इच्छासे जो

चाहे तो कर्म करूँगा, नहीं तो न करूँगा । यदि कर्म करनाही उत्तम पक्ष हो, तो मुझे उसका कारण समझाइये; तभी मैं आपके कथनानुसार आचरण करूँगा । अर्जुनका यह प्रश्न कुछ अपूर्व नहीं है । योगवासिष्ठमें ( यो. वा. ५. ५६. ६ ) श्रीरामचन्द्रने वसिष्ठसे और गणेशगीता ( ग. गी. ४. १ ) में वरेण्य राजाने गणेशजीसे यही प्रश्न किया है । केवल हमारेही यहाँ नहीं, वरन् यूरोपमें- जहाँ तत्त्वज्ञानके विचार पहले पहल शुरू हुए थे, उस ग्रीस देशमेंभी - प्राचीन कालमे यह प्रश्न उपस्थित हुआ था - यह बात अरिस्टाटलके ग्रंथसे प्रकट होती है । इस प्रसिद्ध यूनानी ज्ञानी पुरुषने अपने नीतिशास्त्रसंबंधी ग्रंथके अंत ( १०. ७, ८ ) में यही प्रश्न उपस्थित किया है और प्रथम अपना यह मत प्रकट किया है, कि संसारके या राजनैतिक मामलोंमें जीवन बितानेकी अपेक्षा ज्ञानी पुरुषको शांतिमे तत्त्वके विचारमें जीवन बितानाही सच्चा और पूर्ण आनंददायक है । तोभी उसके अनंतर लिखे, अपने राजधर्मसंबंधी ग्रंथ ( ७. २, ३ ) में अरिस्टाटलही लिखता है, कि “ कुछ ज्ञानी पुरुष तत्त्व-विचारमें, तो कुछ राजनैतिक कार्योंमें निमग्न दीख पड़ते है; और यदि पूछा जाय कि इन दोनों मार्गोंमेंसे कौन-सा बहुत अच्छा है, तो यही कहना पड़ेगा, कि प्रत्येक मार्ग अंशतः सच्चा है । तथापि, कर्मकी अपेक्षा अकर्मको अच्छा कहना भूल है । * क्योंकि, यह कहनेमें कोई हानि नहीं, कि आनंदभी तो एक कर्मही है; और सच्ची श्रेयःप्राप्तिभी अनेक अंशोंमें ज्ञानयुक्त तथा नीतियुक्त कर्मोंमेंही है - दो स्थानोंपर अरिस्टाटलके भिन्न भिन्न मतोंको देखकर, गीताके इस स्पष्ट कथनका महत्त्व पाठकोंके ध्यानमें आ जावेगा, कि “कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः” ( गीता ३. ८ ) - अकर्मकी अपेक्षा कर्म श्रेष्ठ है । गत शताब्द्दीका प्रसिद्ध फ्रेंच पंडित आगस्टस् कोंट अपने आधिभौतिक तत्त्वज्ञानमें कहता है - “ यह कहना भ्रांतिमूलक है, कि तत्त्वविचारहीमें निमग्न रह कर जीवन बिताना श्रेयस्कर है । और जो तत्त्वज्ञ पुरुष इस ढंगके आयुष्य क्रमको अंगीकार करता है और अपने हाथसे होने योग्य लोगोंका कल्याण करना छोड़ देता है, उसके विषयमे यही कहना चाहिये, कि वह अपने प्राप्त साधनोंका दुरुपयोग करता है । ” इसके विपरीत जर्मन तत्त्ववेत्ता शोपेनहरने कहा है, कि संसारके समस्त व्यवहार - यहाँतक कि जीवित रहनाभी - दुःखमय है; इसलिये तत्त्वज्ञान प्राप्तकर इन सब कर्मोंका, जितनी जल्दी हो सके, नाश करनाही इस संसारमे मनुष्यका सच्चा कर्तव्य है । कोंट सन १८५७ में और शोपेनहर सन १८६० में संसारसे विदा हुए । शोपेनहरका पंथ जर्मनीमें हार्टमेनने जारी रखा है । कहना नहीं होगा, कि स्पेन्सर और मिल प्रभृति अंग्रेज तत्त्वशास्त्रज्ञोंके मत कोंटके जैसे हैं ।

  • “ And it is equally a mistake to place inactivity above action, for happiness is activity, and the actions of the just and wise are the realization of much that is noble. ” ( Aristotle's politics, trans. by Jowett, Vol. I, p. 212. The Italics are ours. ) गी. र. २०

३०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परंतु इन सबके आगे बढ़कर, हालहीके जमानेके आधिभौतिक जर्मन पंडित नित्शेने, अपने ग्रंथोंमें, कर्म छोड़नेवालोंपर ऐसे तीव्र कटाक्ष किये हैं, कि वह कर्मसंन्यास- पक्षवालोंके लिये 'मूर्ख-शिरोमणि' शब्दसे अधिक सौम्य शब्दका उपयोग करही नहीं सका है।* यूरोपमें अरिस्टाटलसे लेकर अबतक जिस प्रकार इस संबंधमें दो पक्ष हैं, उसी प्रकार भारतीय वैदिक धर्ममेंभी प्राचीन कालसे लेकर अबतक इस संबंधके दो संप्रदाय एकसे चले आ रहे हैं (मभा. शां. ३४९. ७)। इनमेंसे एकको संन्यास-मार्ग, सांख्य-निष्ठा या केवल सांख्य अथवा - ज्ञानमेंही नित्य निमग्न रहनेके कारण - ज्ञान-निष्ठाभी कहते हैं; और दूसरेको कर्मयोग, अथवा संक्षेपमें केवल योग या कर्म-निष्ठा कहते हैं। हम तीसरे प्रकरणमेंही कह चुके हैं, कि यहाँ 'सांख्य' और 'योग' शब्दोंसे तात्पर्य क्रमशः कापिल-सांख्य और पातंजल योगसे नहीं है; परंतु 'संन्यास' शब्दभी कुछ संदिग्ध है, इसलिये उसके अर्थका कुछ अधिक विवरण करना यहाँ आवश्यक है। 'संन्यास' शब्दका सिर्फ 'विवाह न करना' और यदि किया हो, तो "बाल-बच्चोंको छोड़ भगवे कपडे रंग लेना' अथवा 'केवल चौथे आश्रमका ग्रहण करना" इतनाही अर्थ यहाँ विवक्षित नहीं है। क्योंकि विवाह न करन परभी भीष्मपितामह मरते दमतक राज्यकार्योंके उद्योगमें लगे रहे; और श्रीमत् शंकराचार्यने ब्रह्मचर्यसे एकदम चौथा आश्रम ग्रहण कर, या महाराष्ट्र देशमें -श्रीसमर्थ रामदासने मृत्यूपर्यंत ब्रह्मचारी-गोस्वामी-रहकर, ज्ञानप्रचार करके संसारके उद्धारार्थ कर्म किये हैं। यहाँ पर मुख्य प्रश्न यही है, कि ज्ञानोत्तर संसारके व्यवहार केवल कर्तव्य समझकर लोक-कल्याणके लिये किये जावें अथवा मिथ्या समझ कर एकदम छोड़ दिये जावें ? इन व्यवहारों या कर्मोंको करनेवाला कर्मयोगी कहलाता है, फिर चाहे वह ब्याहा हो या क्वाँरा, भगवे कपड़े पहने या सफ़ेद । हाँ, यहभी कहा जा सकता है, कि ऐसे काम करनेके लिये विवाह न करना, भगवे कपड़े * कर्मयोग और कर्मत्याग (सांख्य या संन्यास), इन्हीं दो मार्गोंको सलीने अपने Pessimism नामक ग्रंथमें क्रमसे Optimism और Pessimism नाम दिये हैं; पर हमारी रायमें ये नाम ठीक नहीं हैं। Pessimism शब्दका अर्थ "उदास, निराशावादी या रोती सूरत" होता है। परंतु संसारको अनित्य समझ कर उसे छोड़ देनेवाले (संन्यासी) आनंदी रहते हैं और वे लोग संसारको आनंदसेही छोड़ते हैं; इसलिये हमारी रायमें, उनको Pessimist कहना ठीक नहीं हैं। इसके बदले कर्मयोगको Energism और सांख्य या संन्यास मार्गको Quietism कहना अधिक प्रशस्त होगा। वैदिक धर्मके अनुसार दोनों मार्गोंमें ब्रह्मज्ञान एकही-सा है, इसलिये दोनोंका आनंद और शांतिभी एकही-सी है। हम ऐसा भेद नहीं करते, कि एक मार्ग आनंदमय है और दूसरा दुःखमय है, अथवा एक आशावादी है, और दूसरा निराशावादी।

संन्यास और कर्मयोग ३०७ पहनना अथवा बस्तीसे बाहर विरक्त हो कर रहनाही कभी कभी विशेष मुभीतेका होता है। क्योंकि फिर कुटुंबके भरण-पोषणकी झंझट अपने पीछे न रहनेके कारण, अपना सारा समय और परिश्रम लोक-कार्योंमें लगा देनेके लिये कुछभी अड़चन नहीं रहती। ऐसे पुरुष भेषसे संन्यासी हों, तो भी वे तत्त्वदृष्टिसे कर्मयोगीही हैं। परंतु विपरीत पक्षमें – अर्थात् जो लोग इस संसारके समस्त व्यवहारोंको निस्सार समझ उनका त्याग करके चुपचाप बैठे रहते हैं – उन्हींको संन्यासी कहना चाहिये, फिर चाहे उन्होंने प्रत्यक्ष चौथा आश्रम ग्रहण किया हो या न किया हो। सारांश, गीताका कटाक्ष भगवे अथवा सफ़ेद कपड़ोंपर अथवा विवाह या ब्रह्मचर्यपर नहीं है; प्रत्युत इसी एक बातपर नज़र रखकर गीतामें संन्यास और कर्मयोग, इन दोनों मार्गोंका त्रिभेद किया गया है, कि ज्ञानी पुरुष जगत्के व्यवहार करता है या नहीं ? शेष बातें गीताधर्ममें तो महत्त्वकी नहीं हैं। संन्यास या चतुर्थाश्रम शब्दोंकी अपेक्षा कर्मसंन्यास अथवा कर्मत्याग, ये शब्द यहाँ अधिक अन्वर्थक और निःसंदिग्ध हैं। परंतु इन दोनोंकी अपेक्षा केवल संन्यास शब्दके व्यवहारकीही अधिक रीतिके कारण उसके पारिभाषिक अर्थका यहाँ विवरण किया गया है। जिन्हें इस संसारके व्यवहार निःसार प्रतीत होते हैं, वे उससे निवृत्त हो अरण्यमें जाकर स्मृतिधर्मा- नुसार चतुर्थाश्रममें प्रवेश करते हैं, इससे कर्मत्यागके इस मार्गको संन्यास कहते हैं। परंतु इसमें प्रधान भाग कर्मत्यागही है, गेरुए कपड़े नहीं। यद्यपि इस प्रकार इन दोनों पक्षोंका प्रचार है, कि पूर्ण ज्ञान होनेपर आगे कर्म करें ( कर्मयोग ) या कर्म छोड़ दें, ( कर्मसंन्यास ), तथापि गीताके सांप्रदायिक टीकाकारोंने अब यहाँ यह प्रश्न छेड़ा है, कि क्या अंतमें मोक्षप्राप्ति करा देनेके लिये दोनों मार्ग स्वतंत्र अर्थात् एक-से समर्थ हैं? अथवा कर्मयोग केवल पूर्वांग यानी पहली सीढ़ी है; और अंतमें मोक्षकी प्राप्तिके लिये कर्म छोड़ कर संन्यासही लेना चाहिये ? गीताके दूसरे और तीसरे अध्यायोंमें जो वर्णन है, उससे जान पड़ता है, कि ये दोनों मार्ग स्वतंत्र हैं। परंतु जिन टीकाकारोंका यह मत है, कि संन्यास आश्रमको अंगीकार कर समस्त सांसारिक कर्मोंको छोड़े बिना कभीभी मोक्ष नहीं मिल कि सकता – और जो लोग इसी बुद्धिसे गीताकी टीका करनेमें प्रवृत्त हुए हैं, यही मत गीतामें प्रतिपादित किया गया है – वे गीताका यह तात्पर्य निकालते हैं, कि “कर्मयोग स्वतंत्र रीतिसे मोक्षप्राप्तिका मार्ग नहीं है, पहले चित्तकी शुद्धिके लिये कर्मकर अंतमें संन्यासही लेना चाहिये; संन्यासही अंतिम अर्थात् मुख्य निष्ठा है।” परंतु इस अर्थको स्वीकारकर लेनेसे भगवानने जो यह कहा है, कि “सांख्य ( संन्यास ) और योग ( कर्मयोग ) ये द्विविध अर्थात् दो प्रकार की निष्ठाएँ इस संसारमें हैं” ( गीता ३. ३.), उस द्विविध पदका स्वारस्य सर्वथा नष्ट हो जाता है। 'कर्मयोग' शब्दके तीन अर्थ हो सकते हैं – (१) पहला अर्थ यह है, कि ज्ञान हो या न हो; चातुर्वर्ण्यके यज्ञयाग आदि कर्म अथवा श्रुति-स्मृति-वर्णित

३०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्म करनेसेही मोक्ष मिलता है। परंतु मीमांसकोंका यह पक्ष गीताको मान्य नहीं है (गीता २. ४२)। (२) दूसरा अर्थ यह है, कि चित्तशुद्धिके लिये कर्म करनेकी (कर्मयोग) आवश्यकता है, इसलिये केवल चित्तशुद्धिके निमित्तही कर्म करना। इस अर्थके अनुसार कर्मयोग संन्यासमार्गका पूर्वांग हो जाता है; परंतु यह गीतामें वर्णित कर्मयोग नहीं है। (३) जो जानता है, कि अपने आत्माका कल्याण किसमें है, वह ज्ञानी पुरुष स्वधर्मोक्त युद्धादि सांसारिक कर्म मृत्युपर्यंत करे या न करे? यही गीताका मुख्य प्रश्न है और उसका उत्तर यही है, कि ज्ञानी पुरुषकोभी चातुर्वर्ण्यमें सब कर्म निष्काम बुद्धिसे करनेही चाहिये (गीता ३. २५)। यही 'कर्मयोग' शब्दका तीसरा अर्थ है; और गीतामें यही कर्मयोग प्रतिपादित किया गया है। यह कर्मयोग संन्यासमार्गका पूर्वांग कदापि नहीं हो सकता, क्योंकि इस मार्गमें कर्म कभी छूटते ही नहीं। अब प्रश्न है केवल मोक्ष-प्राप्तिके विषयका। इसपर गीतामें स्पष्ट कहा है, कि ज्ञानप्राप्तिके हो जानेसे निष्काम कर्म बंधक नहीं हो सकते; प्रत्युत संन्याससे जो मोक्ष प्राप्त करना है वही इस कर्मयोगसेभी प्राप्त होता है (गीता ५. ५)। इसलिये गीताका कर्मयोग संन्यासमार्गका पूर्वांग नहीं है, किंतु ज्ञानोत्तर ये दोनों मार्ग मोक्षदृष्टिसे स्वतंत्र अर्थात् तुल्यबल हैं (गीता ५. २) – गीताके “लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा” (गीता ३. ३) वाक्यका यही अर्थ करना चाहिये और इसी हेतु भगवान्ने अगले चरणमें – "ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेण योगिनाम्" – इस प्रकार, इन दोनों मार्गोंका पृथक् पृथक् स्पष्टीकरण किया है और आगे चलकर तेरहवें अध्यायके : “अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेण चापरे ” (गीता १३. २४) इस श्लोकके – 'अन्ये' (एक) और 'अपरे' (दूसरे) – ये पद उक्त दोनों मार्गोंको स्वतंत्र माने बिना अन्वर्थक नहीं हो सकते। इसके सिवा जिस नारायणीय धर्मका प्रवृत्तिमार्ग (योग) गीतामें प्रतिपादित है, महाभारतमें उसका इतिहास देखनेसे यही सिद्धान्त दृढ़ होता है। सृष्टीके आरंभमें भगवान्ने हिरण्य- गर्भ अर्थात् ब्रह्माको सृष्टि-रचनेकी आज्ञा दी, तब इनसे मरीचि आदि सात मानस- पुत्र हुए। सृष्टिधर्मको अच्छे प्रकार, आरंभके लिये उन्होंने योग अर्थात् कर्म- मय प्रवृत्तिमार्गका अवलंबन किया। ब्रह्माके सनत्कुमार और कपिल प्रभृति दूसरे सात मानसपुत्रोंने उत्पन्न होतेही निवृत्तिमार्ग अर्थात् सांख्यका अवलंबन किया – इस प्रकार इन दोनों मार्गोंकी उत्पत्ति बतलाकर आगे स्पष्ट कहा है, कि ये दोनों मार्ग मोक्षदृष्टिसे तुल्यबल अर्थात् वासुदेवस्वरूपी एकही परमेश्वरकी प्राप्ति करा देनेवाले, भिन्न भिन्न और स्वतंत्र हैं (महा. शा. ३४८. ३८; ३४९. ६३-७३)। इसी प्रकार यहभी भेद किया गया है कि योग अर्थात् प्रवृत्तिमार्गके प्रवर्तक हिरण्यगर्भ हैं, और सांख्यमार्गके मूल प्रवर्तक कपिल हैं; परंतु यह कहीं नहीं कहा है, कि आगे हिरण्यगर्भने कर्मोंका त्यागकर दिया। इसके विपरीत ऐसा वर्णन है, कि भगवान्ने सृष्टिके व्यवहार अच्छी तरहसे चलते रहनेके लिये कर्मरूपी यज्ञचक्रको उत्पन्न

संन्यास और कर्मयोग ३०९ किया; और हिरण्यगर्भसे तथा अन्य देवताओंसे कहा, कि इसे निरंतर जारी रखो (मभा. शां. ३४०. ४४-७५; ३३९. ६६, ६७ देखो) ; इससे निर्विवाद सिद्ध होता है, कि सांख्य और योग ये दोनों मार्ग आरंभसेही स्वतंत्र हैं। इससे यहभी दीख पड़ता है कि गीताके सांप्रदायिक टीकाकारोंने कर्मयोग-मार्गको गौणत्व देनेका जो प्रयत्न किया है, वह केवल सांप्रदायिक आग्रहका परिणाम है। और इन टीकाओंमें स्थान स्थान पर यह जो तुर्रा लगा रहता है, कि कर्मयोग, ज्ञानप्राप्ति अथवा संन्यासका केवल साधनमात्र है, वह इनकी मनगढ़ंत है। वास्तवमें गीताका सच्चा भावार्थ वैसा नहीं है। गीतापर जो संन्यासमार्गीय टीकाएँ हैं, उनमें हमारे मतसे यही मुख्य दोष है। और टीकाकारोंके इस सांप्रदायिक आग्रहसे छूटे बिना गीताके वास्तविक रहस्यका बोध हो जाना कभी संभव नहीं है। यदि यह निश्चय करें, कि कर्मसंन्यास और कर्मयोग, दोनों स्वतंत्र रीतिसे मोक्षदायक हैं - एक दूसरेका पूर्वांग नहीं - तोभी पूरा निर्वाह नहीं होता। क्योंकि, यदि दोनों मार्ग एकहीसे मोक्षदायक हैं, तो कहना पड़ेगा, कि इनमेंसे जो मार्ग हमें पसंद होगा, उसे हम स्वीकार करें। और फिर यह सिद्ध न हो कर - कि अर्जुनको युद्धही करना चाहिये, - ये दोनों पक्ष संभव होते हैं, कि भगवान्‌के उपदेशसे परमे- श्वरका ज्ञान होनेपरभी, चाहे वह अपनी रुचिके अनुसार युद्ध करे अथवा लड़ना- मरना छोड़कर संन्यास ग्रहणकर ले। इसीलिये अर्जुनने स्वाभाविक रीतिमे यह सरल प्रश्न किया है, कि "इन दोनों मार्गोंमेंसे जो अधिक प्रशस्त हो, वह एकही मार्ग निश्चय करके मुझे बतलाओ", (गीता ५. १) जिससे उसके अनुसार आचरण करनेमे कोई गड़बड़ न हो। गीताके पाँचवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनके इस प्रकार प्रश्नकर चुकनेपर अगले श्लोकमेंही भगवान्‌ने उसका स्पष्ट उत्तर दिया है, कि "संन्यास और कर्मयोग ये दोनों मार्ग निःश्रेयस्कर अर्थात् मोक्षदायक हैं; अथवा मोक्षदृष्टिसे एकसी योग्यताके हैं; तोभी इन दोनोंमें कर्मयोगकी श्रेष्ठता या योग्यता विशेष है ( विशिष्यते )" (गीता. ५. २); और यही श्लोक हमने इस प्रकरणके आरंभमें लिखा है। कर्मयोगकी श्रेष्ठताके संबंधमें गीतामें यह एकही वचन नहीं है, किंतु ऐसे अनेक वचन हैं, जैसे - "तस्माद्योगाय युज्यस्व" (गीता. २. ५०) - इसलिये तू कर्मयोगकाही स्वीकार कर। "मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि" (गीता २. ४७) कर्म न करनेका आग्रह मत कर। यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ कर्मोंको छोड़नेके झगड़ेमें न पड़कर "इंद्रियोंको मनमे रोककर अनासक्त बुद्धिके द्वारा कर्मेंद्रियोंसे कर्म करनेवालेकी योग्यता 'विशिष्यते' अर्थात् विशेष है" (गीता ३. ७) । क्योंकि, कभी क्यों न हो, "कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः" अकर्मकी - अपेक्षा

कर्म श्रेष्ठ है (गीता ३. ८)। "इसलिये तू कर्मही कर" (गीता ४. १५) अथवा "योगमातिष्ठोत्तिष्ठ" (गीता ४. ४२) - कर्मयोगका अंगीकार कर युद्धके लिये खड़ा हो। (योगी) "ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः" - ज्ञानमार्गवाले (संन्यासी) की अपेक्षा कर्मयोगीकी योग्यता अधिक है। "तस्माद्योगी भवार्जुन" (गीता ६. ४६)। - इसलिये, हे अर्जुन ! तू (कर्म-) योगी हो। अथवा "मामनु- स्मर युध्य च" (गीता ८. ७) - मनमें मेरा स्मरण रखकर युद्ध कर; इत्यादि अनेक वचनोंसे गीतामें अर्जुनको स्थान स्थानपर जो उपदेश दिया गया है, उसमेंभी संन्यास या अकर्मकी अपेक्षा कर्मयोगकी अधिक योग्यता दिखलानेके लिये 'ज्याय:', 'अधिक:' और 'विशिष्यते' इत्यादि पद स्पष्ट हैं। अठारहवें अध्यायके उपसंहारमेंभी भगवानने फिर कहा है, कि "नियत कर्मोंका संन्यास करना उचित नहीं है। आसक्ति- विरहित सब काम सदा करने चाहिये - यही मेरा निश्चित और उत्तम मत है" (गीता १८. ६, ७)। इससे निर्विवाद सिद्ध होता है, कि गीतामें संन्यासमार्गकी अपेक्षा कर्मयोगकोही श्रेष्ठता दी गई है। परंतु, जिनका सांप्रदायिक मत है, कि संन्यास या भक्तिही अंतिम और श्रेष्ठ कर्तव्य है; कर्म तो केवल चित्तशुद्धिका साधन है; वह मुख्य साध्य या कर्तव्य नहीं हो सकता, उन्हें गीताका यह सिद्धान्त कैसे पसंद होगा ? यह नहीं कहा जा सकता, कि उनके ध्यानमें यह बात आईही न होगी, कि गीतामें संन्यासमार्गकी अपेक्षा कर्मयोगको स्पष्ट रीतिसे अधिक महत्त्व दिया गया है; परंतु यदि यह बात मान ली जाती, तो यह प्रकटही है, कि उनके संप्रदायको योग्यता कम हो जाती। इसीसे पाँचवे अध्यायके आरंभमें अर्जुनके प्रश्न और भगवानके उत्तर दोनों सरल, सयुक्तिक और स्पष्टार्थक रहनेपरभी, सांप्रदायिक टीकाकार इस चक्करमें पड़ गये हैं, कि उनका अर्थ कैसे और क्या किया जाय ? पहली अडचन यह थी, कि 'संन्यास और कर्मयोग इन दोनों मार्गोंमें श्रेष्ठ कौन है ?" यह प्रश्नही दोनों मार्गोंको स्वतंत्र माने बिना उपस्थित हो नहीं सकता। क्योंकि इन टीकाकारोंके कथनानुसार कर्मयोग यदि ज्ञानका सिर्फ़ पूर्वांग हो, तो यह बात स्वयंसिद्ध है, कि पूर्वांग गौण है; और ज्ञान अथवा संन्यासही श्रेष्ठ है और फिर प्रश्न करनेके लिये गुंजाइशही कहाँ रही ? अच्छा; यदि प्रश्नको उचित मान लें, तो यह स्वीकार करना पड़ता है, कि ये दोनों मार्ग स्वतंत्र हैं। और तब तो यह स्वीकृति इस कथनका विरोध करेगी, कि केवल हमारा संप्रदायही मोक्षका मार्ग है। इस अडचनको दूर करनेके लिये इन टीकाकारोंने पहले तो यह तुर्रा दिया है, कि अर्जुनका प्रश्नही ठीक नहीं है; और फिर यह दिखलानेका प्रयत्न किया है, कि भगवानके उत्तरका तात्पर्यभी वैसाही है। परंतु इतना गोलमाल करनेपरभी भगवानके इस स्पष्ट उत्तर - "कर्मयोगकी योग्यता अथवा श्रेष्ठता विशेष है" (गीता ५.२) का अर्थ ठीक ठीक फिरभी लगाही नहीं ! तब अंतमें पूर्वापार-संदर्भके विरुद्ध, अपने मनका दूसरा यह तुर्रा लगा कर इन टीकाकारोंने ज्यों त्यों कर

संन्यास और कर्मयोग ३११ अपना समाधान कर लेना पड़ा है, कि 'कर्मयोगो विशिष्यते' - कर्मयोगकी योग्यता विशेष है - यह वचन कर्मयोगकी पोची प्रशंसा करनेके लिये यानी अर्थवादात्मक है और वास्तवमें भगवानके मतसेभी संन्यासमार्गही श्रेष्ठ है (गी. शां. भा. ५. २; ६. १, २; १८. ११) शांकरभाष्यमेंही क्यों, रामानुजभाष्यमेंभी यह श्लोक कर्मयोगकी केवल प्रशंसा करनेवाला - अर्थवादात्मकही - माना गया है (गी. रा. भा. ५. १)। रामानुजाचार्य यद्यपि अद्वैती न थे, तोभी उनके मतमें भक्तिही मुख्य साध्यवस्तु है, इसलिये कर्मयोग ज्ञानयुक्त भक्तिका साधनही हो जाता है (गीता रा. भा. ३. १)। मूल ग्रंथसे टीकाकारोंका संप्रदाय भिन्न है, परंतु टीकाकार यदि इस दृढ समझसे उस ग्रंथकी टीका करने लगे, कि हमारा मार्ग या संप्रदायही मूल ग्रंथमें वर्णित है, तो पाठकही देखें, कि उससे मूलग्रंथकी कैसी खींचातानी होती है। भगवान् श्रीकृष्ण या व्यास संस्कृत भाषामें स्पष्ट शब्दोंके द्वारा क्या यह कह नहीं सकते थे, कि "अर्जुन ! तेरा प्रश्न ठीक नहीं है?" परंतु ऐसा न करके जब कि अनेक स्थलोंपर स्पष्ट रीतिसे यही कहा है, कि "कर्मयोगही विशेष योग्यताका है"; तब कहना पड़ता है, कि सांप्रदायिक टीकाकारोंका उल्लेखित अर्थ सरल नहीं है; और पूर्वापर संदर्भ देखनेसेभी यही अनुमान दृढ़ होता है। क्योंकि गीतामेंही अनेक स्थानोंमें ऐसा वर्णन है, कि ज्ञानी पुरुष कर्मका संन्यास न कर ज्ञानप्राप्तिके अनंतरभी अनासक्त बुद्धिसे अपने सब व्यवहार किया करता है (गीता २. ६४; ३. १९; ३. २५; १८. ९) इन स्थानों- पर श्रीशंकराचार्यने अपने भाष्यमें पहले यह प्रश्न किया है, कि ज्ञानसे मोक्ष मिलता है, या ज्ञान और कर्मके समुच्चयसे ? और फिर यह गीतार्थ किया है, कि केवल ज्ञानसेही सब कर्म दग्ध होकर मोक्षप्राप्ति होती है; मोक्षप्राप्तिके लिये कर्मकी आवश्यकता नहीं है। इससे आगे यह अनुमान निकाला है, कि "जब गीताकी दृष्टिसेभी मोक्षके लिये कर्मकी आवश्यकता नहीं है, तब चित्तशुद्धि हो जानेपर सब कर्म निरर्थक हैंही; और वे स्वभावसेही बंधक अर्थात् ज्ञानविरुद्ध हैं। इसलिये ज्ञानप्राप्तिके अनंतर ज्ञानी पुरुषको कर्म छोड़ देना चाहिये" - और कहना पड़ता है कि यहो मत भगवानकोभी गीतामें ग्राह्य है। "ज्ञानके अनंतर ज्ञानी पुरुषकोभी कर्म करने चाहिये।" इस मतको 'ज्ञानकर्मसमुच्चयपक्ष' कहते हैं; और श्रीशंकराचार्यका उपर्युक्त युक्तिवादही उस पक्षके विरुद्ध मुख्य आक्षेप है। ऐसाही युक्तिवाद मध्वा- चार्यनेभी स्वीकृत किया है (गी. मभा. ३. ३१)। हमारी रायमें यह युक्तिवाद समाधानकारक अथवा निरुत्तरभी नहीं है। क्योंकि, (१) यद्यपि काम्य कर्म बंधक होकर ज्ञानके विरुद्ध हैं, तथापि यह न्याय निष्काम कर्मको लागू नहीं है। और (२) ज्ञानप्राप्तिके अनंतर मोक्षके लिये कर्म अनावश्यक भलेही हुआ करें; परंतु उससे यह सिद्ध करनेमें कोई बाधा नहीं पहुँचती, कि "अन्य सबल कारणोंसे ज्ञानी पुरुषको ज्ञानके साथही कर्म करना आवश्यक है।" मुमुक्षुका सिर्फ़ चित्त शुद्ध करनेके लियेही संसारमें कर्मका उपयोग नहीं है; और न इसीलिये कर्म उत्पन्नही हुए हैं। इसलिये

३१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कहा जा सकता है, कि मोक्षके अतिरिक्त अन्य कारणोंके लिये स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले कर्मसृष्टिके समस्त व्यवहार निष्कामबुद्धिसे करतेही रहनेकी ज्ञानी पुरुष- कोभी जरूरत है। इस प्रकरणमें आगे विस्तारसहित विचार किया गया है, कि ये अन्य कारण कौन-से हैं। यहाँ इतनाही कह देते हैं, कि संन्यास लेनेके लिये प्रवृत्त अर्जुनको ये कारण बतलानेके निमित्तही गीताशास्त्रकी प्रवृत्ति हुई है; और ऐसा अनुमान नहीं किया जा सकता, कि चित्तकी शुद्धिके पश्चात् मोक्षके लिये कर्मोंकी अनावश्यकता बतलाकर गीतामें संन्यासमार्गहीका प्रतिपादन किया गया है। शांकरसंप्रदायका यह मत है सही, कि ज्ञानप्राप्तिके अनंतर संन्यासाश्रम लेकर कर्मोंको छोड़ही देना चाहिये। परंतु उसमे यह सिद्ध नहीं होता, कि गीताका तात्पर्यभी वही होना चाहिये, और न यही बात सिद्ध होती है, कि अकेले शांकरसंप्रदायको या अन्य किसी संप्रदायको 'धर्म' मानकर उसीके अनुकूल गीताका किसी प्रकार अर्थ लगा लेना चाहिये । गीताका तो यही स्थिर सिद्धान्त है, कि ज्ञानके पश्चात्‌भी संन्यासमार्ग ग्रहण करनेकी अपेक्षा कर्मयोगको स्वीकार करनाही उत्तम पक्ष है। फिर उसे चाहे निराला संप्रदाय कहो या और कुछ उसका नाम रखो। परंतु इस बातपरभी ध्यान देना चाहिये, कि यद्यपि गीताको कर्मयोगही श्रेष्ठ जान पड़ता है, तथापि अन्य परमत-असहिष्णु संप्रदायोंकी भांति उसका यह आग्रह नहीं, कि संन्यासमार्गको सर्वथा त्याज्य मानना चाहिये । गीतामें संन्यासमार्गके संबंधमें कहींभी अनादरभाव नहीं दिखलाया गया है। इसके विरुद्ध भगवानने स्पष्ट कहा है, कि संन्यास और कर्मयोग दोनों मार्ग एकसेही निःश्रेयस्कर-मोक्षदायक - अथवा मोक्षदृष्टिसे समान मूल्यवान् हैं। और आगे इस प्रकारकी युक्तियोंसे इन दो भिन्न भिन्न मार्गोंकी एकरूपताभी कर दिखलाई हे, कि "एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति" (गीता ५. ५) - जिसे यह मालूम हो गया, कि ये दोनों मार्ग एकही हैं - अर्थात् समान-बलवाले हैं - उसेही सच्चा तत्वज्ञान हुआ; या 'कर्मयोग'मेंभी तो फलाशाका संन्यास करनाही पड़ता है - "न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो दोगी भवति कश्चन" (गीता ६. २)। यद्यपि ज्ञानप्राप्तिके अनंतर (पहलेही नहीं) कर्मका संन्यास करना या कर्मयोग स्वीकार करना दोनों मार्ग मोक्षदृष्टिसे एक-सीही योग्यताके हैं, तथापि लोकव्यवहारकी दृष्टिसे विचारनेपर यही मार्ग सर्वश्रेष्ठ है, कि बुद्धिमें सन्यास रख कर - अर्थात् निष्काम बुद्धिसे देहेंद्रियोंकेद्वारा जीवनपर्यंत लोकसंग्रहकारक सब कार्य किये जायें। क्योंकि भगवान्‌का निश्चित उपदेश है, कि इस उपायसे संन्यास और कर्म, दोनों स्थिर रहते हैं। एवं तदनुसारही फिर अर्जुन युद्धके लिये प्रवृत्त हुआ है। ज्ञानी और अज्ञानीमें यही तो भेद है। केवल शारीर अर्थात् देहेंद्रियोंके कर्म देखें, तो दोनोंके एक-से होंगेही; परंतु अज्ञानी मनुष्य उन्हें आसक्त बुद्धिसे और ज्ञानी मनुष्य अनासक्त बुद्धिसे किया करता है (गीता ३. २५) । भास कविने गीताके इसी सिद्धान्तका वर्णन अपने नाटकमें इस प्रकार किया है :-

संन्यास और कर्मयोग ३१३ प्राज्ञस्य मूर्खस्य च कार्ययोगे। समत्वमभ्येति तनुर्न बुद्धिः॥ “ज्ञानी और मूर्ख मनुष्योंके कर्म करनेमें शरीर तो एक-साही रहता है, परंतु बुद्धिमें भिन्नता रहती है” ( अविमार. ५. ५)। कुछ फुटकल संन्यासमार्गवालोंका इसपर यह और कथन है, कि “गीतामें अर्जुनको कर्म करनेका उपदेश तो दिया गया है; परंतु भगवान्ने यह उपदेश इस बातपर ध्यान दे कर किया है कि अज्ञानी अर्जुनको चित्तशुद्धिके लिये कर्म करनेकाही अधिकार था। सिद्धावस्थामें भगवान्के मतसेभी कर्मयोगही श्रेष्ठ है।” इस युक्ति- वादका सरल भावार्थ यही दीख पड़ता है, कि यदि भगवान् यह कह देते, कि “अर्जुन ! तू अज्ञानी है,” तो वह उसी प्रकार पूर्ण ज्ञानकी प्राप्तिके लिये आग्रह करता, जिस प्रकार कि कठोपनिषदमें नचिकेताने किया था; और फिर तो उसे पूर्ण ज्ञान बतलानाही पड़ता; एवं यदि वैसा पूर्ण ज्ञान उसे बतलाया जाता, तो वह युद्ध छोड़कर संन्यास ले लेता और और तब तो भगवानका भारतीय युद्धसंबंधी सारा उद्देश्यही विफल हो जाता — इसी भयसे अपने अत्यंत प्रिय भक्तको धोखा देनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णने गीताका उपदेश किया है ! इस प्रकार जो लोग सिर्फ अपने संप्रदायका समर्थन करनेके लिये, भगवान्के मतसेभी अत्यंत प्रिय भक्तको धोखा देनेका निंद्यकर्म मढ़नेके लिये प्रवृत्त हो गये, उनके साथ किसीभी प्रकारका वाद न करनाही अच्छा है। परंतु सामान्य लोग इन भ्रामक युक्तियोंमें कहीं फंस न जावें; इसलिये इतनाही कह देते हैं, कि श्रीकृष्णको अर्जुनसे स्पष्ट शब्दोंमें यह कह देनेके लिये डरनेका कोई कारण न था, “कि तू अज्ञानी है, इसलिये कर्म कर।” और इतनेपरभी यदि अर्जुन कुछ गड़बड़ करता, तो उसे अज्ञानी रखकरही उससे प्रकृतिधर्मके अनुसार युद्ध करानेकी सामर्थ्य श्रीकृष्णमें थी ही ( गीता १८. ५९, ६१)। परंतु ऐसा न कर, बार बार 'ज्ञान' और 'विज्ञान' बतलाकरही ( गीता ३. २; ९. १; १० १; १३. २; १४. १) पंद्रहवें अध्यायके अंतमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है, कि “इस शास्त्रको समझ लेनेसे मनुष्य ज्ञाता और कृतार्थ हो जाता है” ( गीता १५. २०)। इस प्रकार भगवान्ने उसे पूर्ण ज्ञानी बना कर, उसकी इच्छासेही उससे युद्ध करवाया है ( गीता १८. ६३)। इससे भगवान्का यह अभिप्राय स्पष्ट रीतिसे सिद्ध होता है, कि ज्ञाता पुरुषको, ज्ञानप्राप्तिके पश्चात्भी, निष्काम कर्म करतेही रहना चाहिये, और यही सर्वोत्तम पक्ष है। इसके अतिरिक्त, यदि एक बार मानभी लिया जाय, कि अर्जुन अज्ञानी था; तथापि उसको किये हुए उपदेशके समर्थनमें जिन जनक प्रभृति प्राचीन कर्मयोगियोंका और आगे भगवान्ने स्वयं अपनाभी उदाहरण दिया है, उन सभीको कदापि अज्ञानी नहीं कह सकते। इसीसे कहना पड़ता है, कि सांप्रदायिक आग्रहका यह कोरा युक्तिवाद सर्वथा त्याज्य और अनुचित है; तथा गीतामें ज्ञान- युक्त कर्मयोगकाही उपदेश किया गया है।

३१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अबतक यह बतलाया गया, कि ज्ञानोत्तर सिद्धावस्थाके व्यवहारके विषयमेंभी कर्मत्याग (सांख्य) और कर्मयोग (योग), ये दोनों मार्ग न केवल हमारेही देशमें, वरन् अन्य देशोंमेंभी प्राचीन समयसे प्रचलित पाये जाते हैं। अनंतर, इस विषयमें गीताशास्त्रके दो मुख्य सिद्धान्त बतलाये गये :- (१) ये दोनों मार्ग स्वतंत्र अर्थात् मोक्षकी दृष्टिसे परस्पर-निरपेक्ष और तुल्यबल हैं, एक दूसरेका अंग नहीं और (२) उनमें कर्मयोगही अधिक प्रशस्त है। और इन दोनों सिद्धान्तोंके अत्यंत स्पष्ट होते हुएभी सांप्रदायिक टीकाकारोंने इनका विपर्यास किस प्रकार और क्यों किया ? इसी बातको दिखलानेके लिये यह सारी प्रस्तावना लिखनी पड़ी। अब गीतामें दिये हुए उन कारणोंका निरूपण किया जायगा, जो प्रस्तुत प्रकरणकी इस मुख्य बातको सिद्ध करते हैं, कि सिद्धावस्थामेंभी कर्मत्यागकी अपेक्षा निष्काम बुद्धिसे आमरण कर्म करते रहनेका मार्ग अर्थात् कर्मयोगही अधिक श्रेयस्कर है। इनमेंसे कुछ बातोंका स्पष्टीकरण तो 'सुख-दुःख-विवेक' नामक प्रकरणमें पहलेही हो चुका है। परंतु वह विवेचन था सिर्फ सुख-दुःखका, इसलिये वहाँ इस विषयकी पूरी चर्चा नहीं की जा सकी। अतएव इस विषयकी चर्चाके लियेही यह स्वतंत्र प्रकरण लिखा गया है। वैदिक धर्मके दो भाग हैं: कर्मकांड और ज्ञानकांड। पिछले प्रकरणमें उनके भेद बतला दिये गये हैं। कर्मकांडमें अर्थात् ब्राह्मण आदि श्रौत ग्रंथोंमें और अंशतः उपनिषदोंमेंभी ऐसे स्पष्ट वचन हैं, कि प्रत्येक गृहस्थको फिर चाहे वह ब्राह्मण हो या क्षत्रिय - अग्निहोत्र करके यथाधिकार ज्योतिष्टोम आदिक यज्ञयाग करने चाहिये और विवाह करके वंश बढ़ानाभी हरएकका कर्तव्य है। उदाहरणार्थ, “एतद्वै जरामयं सत्रं यदग्निहोत्रम्” इस अग्निहोत्ररूपको मरणपर्यंत जारी रखना चाहिये (श. ब्रा. १२. ४. १. १); प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः।” वंशके धागेको टूटने न दो (तै. उ. १. ११. १) अथवा “ईशावास्यमिदं सर्वम्” - संसारमें जो कुछ है, उसे परमेश्वरमें अधिष्ठित करे - अर्थात् ऐसा समझे, कि मेरा कुछ नहीं, उसीका है। और इस निष्काम बुद्धिसे - कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ “कर्म करते रहकरही सौ वर्ष अर्थात् आयुष्यकी मर्यादाके अंततक जीनेकी इच्छा रखे, एवं ऐसी ईशावास्य बुद्धिसे कर्म करेगा, तो उन कर्मोंका तुझे (पुरुषको) लेप (बंधन) नहीं लगेगा, इसके अतिरिक्त (लेप अथवा बंधनसे बचनेके लिये) दूसरा मार्ग नहीं है” (ईश. १. २) परंतु जब हम, कर्मकांडसे ज्ञानकांडमें जातें हैं, तब वैदिक ग्रंथोंमेंही अनेक विरुद्धपक्षीय वचनभी मिलते हैं। जैसे “ब्रह्मविदाप्नोति परम्” (तै. २. १. १) - ब्रह्मज्ञानसे मोक्ष प्राप्त होता है। “नान्यः पंथा विद्यतेऽयनाय” (श्वे. ३. ८) - (बिना ज्ञानके) मोक्षप्राप्तिका दूसरा मार्ग नहीं है। “पूर्वे विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते। किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं लोक इति ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाय भिक्षा-

संन्यास और कर्मयोग ३१५ चर्यं चरन्ति " ( बृ. ४. ४. २२ ; ३. ५. १ ) - प्राचीन ज्ञानी पुरुषोंको पुत्र आदिकी इच्छा न थी; और यह समझकर, कि जब समस्त लोकही हमारा आत्मा हो गया है, तब हमें ( दूसरी ) संतान किस लिये चाहिये ? - वे लोग संतति, संपत्ति और स्वर्ग आदिमेंसे किसीकीभी 'एषणा' अर्थात् चाह नहीं करते थे; किंतु उससे निवृत्त होकर वे ज्ञानी पुरुष स्वेच्छासे भिक्षाटन करते हुए घूमा करते थे; अथवा “ इस रीतिसे जो लोग विरक्त हो जाते हैं, उन्हींको मोक्ष मिलता है” ( मुं. १. २. ११ ) । या अंतमें “ यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत् ” ( जाबा. ४ ) - जिस दिन बुद्धि विरक्त हो, उसी दिन संन्यास लेलें । इस प्रकार वेदकी आज्ञा द्विविध अर्थात् दो प्रकारकी होनेसे ( मभा. शां. २४०. ६ ) प्रवृत्ति और निवृत्ति या कर्मयोग और सांख्य, इसमेंसे जो श्रेष्ठ मार्ग हो, उसका निर्णय करनेके लिये, यह देखना आवश्यक है, कि कोई दूसरा उपाय है या नहीं ? आचार अर्थात् शिष्ट लोगोंके व्यवहार या रीति-भांतिको देखकर इस प्रश्नका निर्णय हो सकता था, परंतु इस संबंधमें शिष्टाचारभी उभयविध अर्थात् दो प्रकारका है। इतिहाससे प्रकट होता है, कि शुक और याज्ञवल्क्य प्रभृतिने संन्यासमार्गका तो जनक, श्रीकृष्ण और जंगी- षव्य आदि प्रमुख ज्ञानी पुरुषोंने कर्मयोगकाही अवलंबन किया था। इसी अभिप्रायसे सिद्धान्त पक्षके युक्तिवादमें बादरायणाचार्यने कहा है, कि “ तुल्यं तु दर्शनम् ” ( वे. सू. ३. ४. ९ ) - अर्थात् आचारकी दृष्टिसे ये दोनों पंथ समान बलवान् हैं। स्मृतिवचनभी* ऐसाही है :- विवेकी सर्वदा मुक्तः कुर्वता नास्ति कर्तृता । अलेपवादमाश्रित्य श्रीकृष्णजनकौ यथा ॥ “ पूर्ण ब्रह्मज्ञानी पुरुष सब कर्म करकेभी श्रीकृष्ण और जनकके समान अकर्ता, अलिप्त एवं सर्वदा मुक्तही रहता है।” ऐसेही भगवद्गीतामेंभी मनु, इक्ष्वाकु आदिके नाम कर्मयोगकी परंपरा बतलाते हुए कहा है, कि “ एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । ” ( गीता ५. १५ ) - ऐसा जानकर प्राचीन कालमें जनक आदि ज्ञानी पुरुषोंने कर्म किया। योगवासिष्ठ और भागवतमें जनकके सिवा इसी प्रकारके दूसरे बहुत-से उदाहरण दिये गये हैं ( यो. ५. ७५; भाग. २. ८. ४३ - ४५ )। यदि किसीको शंका हो, कि जनकआदि पूर्ण ब्रह्मज्ञानी न थे; तो योग- वासिष्ठमें स्पष्ट लिखा है, कि ये सब 'जीवन्मुक्त' थे। योगवासिष्ठमेंही क्यों, महा- भारतमेंभी कथा है, कि व्यासजीने अपने पुत्र शुकको मोक्षधर्मका पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेनेके लिये अंतमें जनकके यहाँ भेजा था ( मभा. शां. ३२५, यो. २. १ )। इसी प्रकार उपनिषदोंमेंभी जान-बूझकर ये कथाएँ हैं, कि अश्वपति कैकेय राजाने

  • इसे स्मृतिवचन मानकर आनंदगिरिने कठोपनिषदके ( कठ. २. १९ ) शांकरभाष्यकी टीकामें उद्धृत किया है। नहीं मालूम, यह कहाँका वचन है।

३१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उद्दालक ऋषिको (छां. ५. ११-२४) और काशिराज अजातशत्रुने गार्ग्य बालाकीको (बृ. २. १) ब्रह्मज्ञान सिखाया था। परंतु यह वर्णन कहीं नहीं मिलता, कि अश्वपति या जनकने राजपाट छोड़कर कर्मत्यागरूप संन्यास ले लिया। इसके विपरीत, जनक-सुलभा-संवादमें जनकने स्वयं अपने विषयमें कहा है, कि "हम मुक्तसंग होकर-आसक्ति छोड़कर-राज्य करते हैं और यदि हमारे एक हाथमें चंदन लगाया और दूसरेको छील डाला; तोभी उसका सुख और दुःख हमें एकसाही है।" अपनी स्थितिका इस प्रकार वर्णनकर (मभा. शां. ३२०. २६) जनकने आगे सुलभासे कहा है :- मोक्षे हि विविधा निष्ठा दृष्टाऽन्यैर्मोक्षवित्तमैः । ज्ञानं लोकोत्तरं यच्च सर्वत्यागश्च कर्मणाम् ॥ ज्ञाननिष्ठां वदन्त्येके मोक्षशास्त्रविदो जनाः । कर्मनिष्ठां तथैवान्ये यतयः सूक्ष्मदर्शिनः ॥ प्रहायोभयमप्येवं ज्ञानं कर्म च केवलम् । तृतीयेयं समाख्याता निष्ठा तेन महात्मना ॥ "मोक्षशास्त्रके ज्ञाता मोक्षप्राप्तिके लिये तीन प्रकारकी निष्ठाएँ बतलाते हैं :- (१) ज्ञान प्राप्तकर सब कर्मोंका त्याग कर देना-इसीको कुछ मोक्षशास्त्रज्ञ ज्ञाननिष्ठा कहते हैं; (२) इसी प्रकार दूसरे सूक्ष्मदर्शी लोग कर्मनिष्ठा बतलाते हैं, परंतु केवल ज्ञान और केवल कर्म-इन दोनों निष्ठाओंको छोड़कर (३) यह तीसरीही (अर्थात् ज्ञानसे आसक्तिका क्षय कर कर्म करनेकी) निष्ठा (मुझे) उस महात्माने (पंचशिख) बतलाई है" (मभा. शां. ३२०. ३८-४०)। निष्ठा शब्दका सामान्य अर्थ अंतिम स्थिति, आधार या अवस्था है। परंतु इस स्थानपर और गीतामेंभी निष्ठा शब्दका अर्थ है- "मनुष्यके जीवनका वह मार्ग, ढंग, रीति या उपाय है, जिससे आयु बितानेपर अंतमें मोक्षकी प्राप्ति होती है।" गीतापर जो शांकरभाष्य है, उसमेंभी निष्ठा = अनुष्ठेयतात्पर्यम् - अर्थात् आयुष्य या जीवनमें जो कुछ अनुष्ठेय (आचरण करने योग्य) हो, उसमें तत्परता (निमग्न रहना)-यही अर्थ किया है। आयुष्यक्रम या जीवनक्रमके इन मार्गोंमेंसे जैमिनि जैसे प्रमुख मीमांसकोंने ज्ञानको महत्त्व नहीं दिया है; किंतु यह कहा है, कि यज्ञयाग आदि कर्म करनेसेही मोक्षकी प्राप्ति होती है :- ईजाना बहुभिः यज्ञैः ब्राह्मणा वेदपारगाः । शास्त्राणि चेत्प्रमाणं स्युः प्राप्तास्ते परमां गतिम् ॥ क्योंकि, ऐसा न माननेसे शास्त्रकी अर्थात् वेदकी आज्ञा व्यर्थ हो जावेगी (जै. सू. ५. २. २९ पर शांकरभाष्य देखो) और उपनिषदकार तथा बादरायणाचार्यने, यह निश्चय कर कि यज्ञ-याग आदि सभी कर्म गौण हैं, सिद्धान्त किया है, कि मोक्षकी

संन्यास और कर्मयोग ३१७ प्राप्ति ज्ञानमे ही होती है, ज्ञानके सिवा और किसीसेभी मोक्षका मिलना शक्य नहीं है (वे. सू. ३. ४. १, २)। परंतु जनक कहते हैं, कि इन दोनों निष्ठाओंको छोड़- कर आसक्ति-विरहित कर्म करनेकी एक तीसरीही निष्ठा पंचशिखने (स्वयं सांख्य- मार्गी हो करभी) हमें बतलाई है। “दोनों निष्ठाओंको छोड़ कर” इन शब्दोंसे प्रकट होता है, कि यह तीसरी निष्ठा, पहली दो निष्ठाओंमेंसे किसीभी निष्ठाका अंग नहीं है - प्रत्युत स्वतंत्र रीतिसे वर्णित है। वेदान्तसूत्रमेंभी (वे. सू. ३. ४. ३०-३५) जनककी इस तीसरी निष्ठाका अंतमें उल्लेख किया गया है; और भगवद्- गीतामें जनककी उसी तीसरी निष्ठाका - उसीमें भक्तिका नया योग करके - वर्णन किया गया है। परंतु गीताका तो यह सिद्धान्त है, कि मीमांसकोंका केवल कर्मयोग अर्थात् ज्ञानविरहित कर्मयोग मोक्षदायक नहीं है, वह केवल स्वर्गप्रदही है (गीता २. ४२-४४; ९. २१); इसलिये जो मार्ग मोक्षप्रद नहीं है, उसे 'निष्ठा' नामही नहीं दिया जा सकता। क्योंकि, यह व्याख्या सभीको स्वीकृत है, कि जिससे अंतमें मोक्ष मिले, उसी मार्गको 'निष्ठा' कहना चाहिये। अतएव, सब मतोंका सामान्य विवेचन करते समय, यद्यपि जनकने तीन निष्ठाएँ बतलाई हैं, तथापि मीमांसकोंका केवल (अर्थात् ज्ञानविरहित) कर्ममार्ग 'निष्ठा'मेसे पृथक् कर सिद्धान्तपक्षमे स्थिर होनेवाली दो निष्ठाएँही गीताके तीसरे अध्यायके आरंभमें कही गई है (गीता ३. ३)। केवल ज्ञान (सांख्य) और ज्ञानयुक्त निष्काम कर्म (योग), येही वे दो निष्ठाएं हैं। और सिद्धान्तपक्षीय इन दोनों निष्ठाओंमेंसे दूसरी (अर्थात् जनकके कथनानुसार तीसरी) निष्ठाके समर्थनार्थ यह प्राचीन उदाहरण दिया गया है, कि “कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः” (गीता ३. २०) - जनक प्रभृतिने इस प्रकार “कर्म करकेही सिद्धि पाई है।” जनक आदिक क्षत्रिय राजाओंकी बात छोड़ दें; तोभी यह सर्वश्रुत हैही, कि व्यासने विचित्रवीर्यके वंशकी रक्षाके लिये धृतराष्ट्र और पांडु, ये दो क्षेत्रज पुत्र निर्माण किये थे और तीन वर्ष तक निरंतर परि- श्रम करके संसारके उद्धारके निमित्त उन्होंने महाभारतभी लिखा है। एवं कलियुगमें स्मार्त अर्थात् संन्यासमार्गके प्रवर्तक श्रीशंकराचार्यनेभी अपने अलौकिक ज्ञान तथा उद्योगसे धर्म-संस्थापना का कार्य किया था। कहाँ तक कहें? जबसे स्वयं ब्रह्मदेव कर्म करनेके लिये प्रवृत्त हुए, तभीसे सृष्टिका आरंभ हुआ है। मूलतः ब्रह्मदेवसेही मरीचि प्रभृति सात मानसपुत्रोंने उत्पन्न होकर, संन्यास न ले, सृष्टिक्रमको जारी रखनेके लिये मरणपर्यंत प्रवृत्तिमार्गकाही अंगीकार किया; और सनत्कुमार प्रभृति दूसरे सात मानसपुत्र जन्मसेही विरक्त अर्थात् निवृत्ति-पंथी हुए - पहले कह चुके हैं कि, इस कथाका उल्लेख महाभारतमें वर्णित नारायणीय धर्मनिरूपणमें है (मभा. शां. ३३९, ३४०)। ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंने या ब्रह्मदेवनेभी, कर्म करते रहनेके इस प्रवृत्तिमार्गका क्यों अंगीकार किया? - इसकी उपपत्ति वेदान्तसूत्रमें इस प्रकार दी है: “यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिणाम्” (वे. सू. ३. ३. ३२) -

३१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र जिसका जो ईश्वरनिर्मित अधिकार है, उसके पूरे होनेतक कार्योंसे छुट्टी नहीं मिलती। इस उपपत्तिकी जाँच आगे की जावेगी। उपपत्ति कुछभी क्यों न हो, पर यह बात निर्विवाद है, कि प्रवृत्ति और निवृत्ति, ये दोनों पंथ ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंमें संसारके आरंभसे प्रचलित हैं। इससे यहभी प्रकट है, कि उनमेंसे किसीकी श्रेष्ठताका निर्माण सिर्फ आचारकीही ओर ध्यान देकर नहीं किया जा सकता। इस प्रकार, पूर्वाचार द्विविध होनेके कारण, केवल आचारसेही यद्यपि यह निर्णय नहीं हो सकता, कि निवृत्ति श्रेष्ठ है या प्रवृत्ति, तथापि संन्यासमार्गके लोगोंका यह दूसरा युक्तिवाद है, कि यदि यह निर्विवाद है, कि विना कर्मबंधसे छूटे मोक्ष नहीं होता, तो ज्ञानप्राप्ति हो जानेपर तृष्णामूलक कर्मोंका झगड़ा, जितनी जल्दी हो सके, तोडनेमेंही श्रेय है। महाभारतके शुकानुशासनमें - इसीको 'शुकानुप्रश्न'भी कहते हैं, - संन्यासमार्गकाही प्रतिपादन है। वहाँ शुकने व्यासजीसे पूछा है :- यदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च । कां दिशं विद्यया यान्ति कां च गच्छन्ति कर्मणा ॥ “ वेद, कर्म करनेके लियेभी कहता है और छोडनेके लियेभी; तो अब मुझे बतला- इये, कि विद्यासे अर्थात् कर्मरहित ज्ञानसे और केवल कर्मसे कौन-सी गति मिलती है?” (मभा. शां. २४०. १) इसके उत्तरमें व्यासजीने कहा है :- कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते । तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः ॥ “ कर्मसे प्राणी बंधा जाता है; और विद्यासे मुक्त हो जाता है। इसीसे पारदर्शी यति अथवा संन्यासी कर्म नहीं करते” (मभा. शां. २४०. ७)। इस श्लोकके पहले चरणका विवेचन हम पिछले प्रकरणमें कर चुके हैं। “कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते” इस सिद्धान्तपर कुछ वाद नहीं है। परंतु स्मरण रहे, कि वहाँ यह दिखलाया है, कि 'कर्मणा बध्यते' का विचार करनेसे सिद्ध होता है, कि जड़ अथवा अचेतन कर्म किसीको न तो बाँध सकता है और न छोड़ सकता है; मनुष्य फलाशासे अथवा अपनी आसक्तिसे कर्मोंमें बँध जाता है। इस आसक्तिसे अलग होकर वह यदि केवल बाह्य इंद्रियोंसे कर्म करे, तबभी वह मुक्तही है। रामचंद्रजी, इसी अर्थको मनमें लाकर, अध्यात्म रामायणमें (अ. रा. २. ४. ४२) में लक्ष्मणसे कहते हैं, कि :- प्रवाहपतितः कार्यं कुर्वन्नपि न लिप्यते । बाह्ये सर्वत्र कर्तृत्वमावहन्नपि राघव ॥ “ कर्ममय संसारके प्रवाहमें पड़ा हुआ मनुष्य बाहरी सब प्रकारके कर्तव्य-कर्म करकेभी अलिप्त रहता है।” अध्यात्मशास्त्रके इस सिद्धान्तपर ध्यान देनेसे दीख पड़ता है, कि कर्मोंको दुःखमय मानकर उनके त्यागनेकी आवश्यकताही नहीं

संन्यास और कर्मयोग ३१९ रहती; केवल मनको शुद्ध और सम करके फलाशा छोड़ देनेसेही सब काम हो जाते हैं। तात्पर्य यह, कि यद्यपि ज्ञान और काम्यकर्मका विरोध हो, तथापि निष्काम कर्म और ज्ञानके बीच कोईभी विरोध हो नहीं सकता। इसीमे अनुगीतामें 'तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति' - अतएव कर्म नही करते - इस वाक्यके बदले - तस्मात्कर्मसु निःस्नेहा ये केचित्पारदर्शिनः । "इससे पारदर्शी कर्ममें आसक्ति नहीं रखते" (अश्व. ५१. ३३), यह वाक्य आया है। इससे पहले, कर्मयोगका स्पष्ट प्रतिपादन इस प्रकार किया गया है, कि :- कुर्वते ये तु कर्माणि श्रद्दधाना विपश्चितः । अनाशीर्योगसंयुक्तास्ते धीराः साधुदर्शिनः ॥ "जो ज्ञानी पुरुष श्रद्धासे फलाशा न रखकर (कर्म-) योग-मार्गका अवलंब करके कर्म करते हैं, वेही साधुदर्शी हैं" (अश्व. ५०. ६, ७) । इसी प्रकार :- यदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च । इस पूर्वार्धमें जुड़ा हुआही, वनपर्वमें, युधिष्ठिरको शौनकका, यह उपदेश है, कि :- तस्माद्धर्म्मानिमान् सर्वान्नाभिमानात् समाचरेत् । "वेदमें कर्म करने और छोड़नेकीभी आज्ञा है; इसलिये (कर्तृत्वका) अभिमान छोड़कर हमें अपने सब कर्म करने चाहिये" (वन. २. ७३) । शुकानुप्रश्नमेंभी व्यासजीने शुकसे दो बार स्पष्ट कहा है कि :- एषा पूर्वतरा वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते । ज्ञानवानेव कर्माणि कुर्वन् सर्वत्र सिध्यति ॥ "ब्राह्मणकी पूर्वकी, पुरानी (पूर्वतर) वृत्ति यही है, कि ज्ञानवान होकर, सब काम करकेही सिद्धि प्राप्त करे" (मभा. शां. २३७. १; २३४. २९)। यहीभी प्रकट है, कि यहाँ 'ज्ञानवानेव' पदसे ज्ञानोत्तर और ज्ञानयुक्त कर्मही विवक्षित है। अब यदि दोनों पक्षोंके उक्त सब वचनोंका निराग्रह बुद्धिसे विचार किया जाय, तो मालूम होगा, कि "कर्मणा बध्यते जन्तुः" इस युक्तिवादसे कर्मत्यागविषयक यह सिर्फ एकही अनुमान निष्पन्न नही होता, कि 'तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति' - इससे काम नहीं करते - किंतु उसी युक्तिवादसे यह निष्काम कर्मयोगविषयक दूसरा अनुमानभी उतनीही योग्यताका सिद्ध होता है, कि "तस्मात्कर्मसु निःस्नेहाः" - इससे कर्ममें आसक्ति नहीं रखते। सिर्फ हमही इस प्रकारके दो अनुमान नहीं करते; बल्कि व्यासजीनेभी यही अर्थ शुकानुप्रश्नके निम्न श्लोकमें स्पष्टतया बतलाया है :- द्वाविमावथ पंथानौ यस्मिन् वेदाः प्रतिष्ठिताः । प्रवृत्तिलक्षणो धर्मः निवृत्तिक्ष विभाषितः ॥*

  • इस अंतिम चरणके "निवृत्तिश्च सुभाषितः" और "निवृत्तिश्च विभा- वितः" ऐसे पाठभेदभी हैं। पाठभेद कुछभी हो; पर प्रथम 'द्वाविमौ' यह अवश्य है; जिससे इतना तो निर्विवाद सिद्ध होता है, कि दोनो पंथ स्वतंत्र हैं !

३२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र “ इन दोनों मार्गोंको वेदोंका (एक-सा) आधार है-एक मार्ग प्रवृत्तिविषयक धर्मका और दूसरा निवृत्ति अर्थात् संन्यास लेनेका है” (महा. शां. २४०. ६) । वह पहलेही लिख चुके हैं, कि इसी प्रकार नारायणीय धर्ममेंभी इन दोनों पंथोंका पृथक् पृथक् स्वतंत्र रीतिसे, एवं सृष्टिके आरंभमें प्रचलित होनेका वर्णन किया गया है। परंतु स्मरण रहे, कि महाभारतमें प्रसंगानुसार इन दोनों पंथोंका वर्णन पाया जाता है, इसलिये प्रवृत्तिमार्गके साथही निवृत्तिमार्गके समर्थक वचनभी उसी महा- भारतमें पाये जाते हैं। गीताकी संन्यासमार्गीय टीकाओंमें निवृत्तिमार्गके इन वचनों- कोही मुख्य समझ कर, ऐसा प्रतिपादन करनेका प्रयत्न किया गया है, मानों इसके सिवा और दूसरा पंथही नहीं है; और यदि होभी, तो वह गौण है अर्थात् संन्यास मार्गका केवल अंग है। परंतु यह प्रतिपादन साम्प्रदायिक आग्रहका है; और इसीसे गीताका अर्थ सरल एवं स्पष्ट रहनेपरभी, आजकल बहुतोंको दुर्बोध हो गया है। वह गीताके “लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा” (गीता ३. ३) इस श्लोककी बराबरी- काही “द्वाविमावथ पंथानो” यह श्लोक है; इससे प्रकट होता है, कि इस स्थानपर दो समान-बलवाले मार्ग बतलानेका हेतु है। परंतु इस स्पष्ट अर्थकी ओर अथवा पूर्वापर संदर्भकी ओर ध्यान न देकर, कुछ लोग इसी श्लोकमें, यह दिखलानेका यत्न किया करते हैं, कि दोनों मार्गोंके बदले एकही मार्ग प्रतिपाद्य है। इस प्रकार यह सिद्ध हो गया, कि कर्मसंन्यास (सांख्य) और निष्काम कर्म (योग), दोनों वैदिक धर्मके स्वतंत्र मार्ग हैं और उनके विषयमें गीताका यह निश्चित सिद्धान्त है, कि वे वैकल्पिक नहीं हैं, किंतु “संन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगकी योग्यता विशेष है।” अब कर्मयोगकी श्रेष्ठताके संबंधमें गीतामें आगे कहा है, कि जिस संसारमें हम रहते हैं, वह संसार और उसमें हमारा क्षणभर जीवित रहनाभी जब कर्म ही है; तब कर्म छोड़कर जावें कहां? और यदि इस संसारमें अर्थात् कर्मभूमिमेंही रहना हो, तो कर्म छूटेंगेही कैसे ? हम यह प्रत्यक्ष देखते हैं, कि जब- तक देह है, तबतक भूख और प्यास जैसे विकार नहीं छूटते हैं (गीता ५. ८, ९) और उनके निवारणार्थ भिक्षा मांगने जैसा लज्जित कर्म करनेके लियेभी संन्यासमार्गके अनुसार यदि स्वतंत्रता है तो अनासक्तबुद्धि से अन्य व्यावहारिक शास्त्रोक्त कर्म करनेके लिये ही प्रत्यवाय कौन-सा है? यदि कोई इस डरसे अन्य कर्मोंका त्याग करता हो, कि कर्म करनेसे कर्मपाशमें फंसकर ब्रह्मानन्दसे वंचित रहूँगा; अथवा ब्रह्मा- त्मैक्य रूप अद्वैतबुद्धि विचलित हो जायगी; तो कहना चाहिये, कि अबतक उनका मनोनिग्रह कच्चा है और मनोनिग्रहके कच्चे रहते हुए किया हुआ कर्मत्याग, गीताके अनुसार, मोहका अर्थात् तामस् अथवा मिथ्याचरण है (गीता १८. ७; ३. ६)। ऐसी अवस्थामें यह अर्थ आप-ही-आप प्रकट होता है, कि ऐसे कच्चे मनोनिग्रहको चित्त- शुद्धिके द्वारा पूर्ण करनेके लिये निष्कामबुद्धि बढ़ानेवाले यज्ञ, दान प्रभृति गृहस्था- श्रमके श्रौत या स्मार्त कर्मही इस मनुष्यको करने चाहिये । सारांश, ऐसा कर्मत्याग

संन्यास और कर्मयोग ३२१ कभी श्रेयस्कर नहीं होता । यदि कहें, कि मन निर्विषय है और मनुष्यके अधीन है; तो फिर उसे कर्मका डरही किसलिये है ? अथवा कर्मोंके न करनेका व्यर्थ आग्रहही वह क्यों करे ? बरसाती छतेकी परीक्षा जिस प्रकार वर्षामेंही होती है, उसी प्रकार या - विकारहेतौ सति विक्रियन्ते, येषां न चेतांसि त एव धीराः । "जिन कारणोंसे विकार उत्पन्न होता है, वे कारण अथवा विषय दृष्टिके आगे रहनेपरभी जिनका अंतःकरण मोहके पंजेमें नहीं फँसता, वेही पुरुष धैर्यशाली कहे जाते हैं" ( कुमार १. ५९) - कालिदासके इस व्यापक न्यायसे कर्मोंके द्वाराही मनोनिग्रहकी जाँच हुआ करती है; और स्वयं कर्ताको तथा और लोगोंकोभी ज्ञात हो जाता है, कि मनोनिग्रह पूर्ण हुआ या नहीं। इस दृष्टिसेभी यही सिद्ध होता है, कि शास्त्रसे प्राप्त (अर्थात् प्रवाहपतित) कर्म करनेही चाहिये (गीता १८. ६)। अच्छा; यदि कहें कि "मन वशमें है; और यह डरभी नहीं, कि जो चित्तशुद्धि प्राप्त हो चुकी है, वह कर्म करनेसे बिगड़ जावेगी; परंतु ऐसे व्यर्थ कर्म करके शरीरको कष्ट देना नहीं चाहते, कि जो मोक्षप्राप्तिके लिये अनावश्यक है" तो यह कर्मत्याग 'राजस' कहलावेगा, क्योंकि यह काय-क्लेशका भय करके केवल इस क्षुद्र बुद्धिसे किया गया है, कि देहको कष्ट होगा और इसलिये त्यागसे जो फल मिलना चाहिये, वह ऐसे 'राजस' कर्मत्यागीको नहीं मिलता ( गीता १८. ८)। फिर यही प्रश्न है, कि कर्म छोड़ेंही क्यों ? यदि कोई कहे, कि "सब कर्म मायासृष्टिके हैं; अत- एव अनित्य हैं, इससे ब्रह्मसृष्टिके नित्य आत्माको इन कर्मोंकी झंझटमें पड़ जाना उचित नहीं; " तो यहभी ठीक नहीं है। क्योंकि जब स्वयं परब्रह्मही मायासे आच्छादित है, तब यदि मनुष्यभी उसीके अनुसार मायामें व्यवहार करे, तो क्या हानि है ? मायासृष्टि और ब्रह्मसृष्टिके भेदसे जिस प्रकार इस जगत्केभी दोन भाग किये गये हैं, उसी प्रकार आत्मा और देहेंद्रियोंके भेदसे मनुष्यकेभी दो भाग होते हैं। इनमेंसे आत्मा और ब्रह्मका संयोग करके ब्रह्ममें आत्माका लयकर दो और इस ब्रह्मात्मैक्य- ज्ञानसे बुद्धिको निःसंग रखकर केवल मायिक देहेंद्रियोंद्वारा मायासृष्टिके व्यवहार किया करो । बस; इस प्रकार बर्ताव करनेसे मोक्षमें कोई प्रतिबंध न आवेगा । और उक्त दोनों भागोंका जोड़ा आपसमें मिल जानेसे सृष्टिके किसीभी भागकी उपेक्षा या विच्छेद करनेका दोषभी न लगेगा; तथा ब्रह्मसृष्टि एवं मायासृष्टि - परलोक और इहलोक - दोनोंके कर्तव्यपालनका श्रेयभी मिल जायगा । ईशोपनिषद्में इसी तत्त्वका प्रतिपादन है ( ईश. ११) इन श्रुतिवचनोंका आगे विस्तारसहित विचार किया जावेगा । यहाँ इतनाही कह देते हैं, कि गीतामें जो कहा है, कि "ब्रह्मात्मैक्यके अनुभवी ज्ञानी पुरुष मायासृष्टिके व्यवहार केवल शरीर अथवा केवल इंद्रियोंसेही करते हैं" ( गीता ४ २१; ५. १२ ), उसका तात्पर्यभी यही है; और इसी उद्देश्यसे गी. र. २१

३२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अठारहवें अध्यायमें यह सिद्धान्त किया है, कि “निस्संग-बुद्धिसे, फलाशा छोड़कर, केवल कर्तव्य समझकर, कर्म करनाही सच्चा 'सात्त्विक' कर्मत्याग है”-कर्म छोड़ना सच्चा कर्मत्याग नहीं है (गीता १८. ९)। कर्म मायासृष्टिकेही क्यों न हों, परंतु किसी अगम्य उद्देश्यसे परमेश्वरनेही तो उन्हें बनाया है और उनको बंद करना मनुष्यके अधिकारकी बात नहीं, वह परमेश्वरके अधीन है। अतएव यह बात निर्विवाद है, कि बुद्धिको निःसंग रखकर केवल शरीर-कर्म करनेसे, वे मोक्षके बाधक नहीं होते। तब चित्तको विरक्त कर केवल इंद्रियोंसे शास्त्रसिद्ध कर्म करनेमें हानिही क्या है? गीतामें कहाही है, कि-“नहि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्” (गीता ३. ५; १८. ११)।-इस जगत्में कोई एक क्षणभरभी बिना कर्मके रह नहीं सकता। और अनुगीतामें कहा है कि, “नैष्कर्म्यं नच लोकेऽस्मिन् मुहूर्तमपि लभ्यते” (अश्व. २०. ७) - इस लोकमें (किसीसेभी) घड़ीभरके लियेभी कर्म नहीं छूटते। मनुष्योंकी तो बिसातही क्या ! सूर्य-चंद्र प्रभृतिभी निरंतर कर्मही करते रहते हैं ! अधिक क्या कहें? यह निश्चित सिद्धान्त है, कि कर्मही सृष्टि और सृष्टिही कर्म है। इसीलिये हम प्रत्यक्ष देखते हैं, कि सृष्टिकी घटनाओंको (अथवा कर्मको) क्षणभरके लियेभी विश्राम नहीं मिलता। देखिये; एक ओर भगवान् गीतामें कहते हैं- “कर्म छोड़नेसे खानेकोभी न मिलेगा” (गीता. ३. ८); तो दूसरी ओर वनपर्वमें द्रौपदी युधिष्ठिरसे कहती है, कि “अकर्मणां वै भूतानां वृत्तिः स्यान्नहि काचन” (वन. ३२. ८) अर्थात् कर्मके बिना प्राणिमात्रका निर्वाह नहीं; और इसी प्रकार दासबोधमेंभी पहले ब्रह्मज्ञान बतलाकर श्रीसमर्थ रामदास- स्वामीभी कहते हैं, “यदि प्रपंच छोड़कर परमार्थ करोगे, तो खानेके लिये अन्नभी न मिलेगा” (दास. १२. १. ३)। अच्छा; भगवानकाही चरित्र देखो तो मालूम होगा, कि आप प्रत्येक युगमें भिन्न भिन्न अवतार लेकर इस मायिक जगतमें साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंका विनाशरूप कर्म करते आ रहे हैं (गीता ४. ८ मभा. शां. ३३९. १०३)। और उन्होंनेही गीतामें कहा है, कि यदि मैं येही कर्म न करूँ, तो संसार उजड़कर नष्ट हो जावेगा (गीता. ३. २४)। इससे सिद्ध होता है, कि जब स्वयं भगवान् जगतके धारणार्थ कर्म करते हैं, तब इस कथनसे क्या प्रयोजन है, कि ज्ञानो- त्तर कर्म निरर्थक हैं? अतएव यः क्रियावान् स पंडितः” (मभा. वन. ३१२. १०८)

  • जो क्रियावान् है, वही पंडित है-इस न्यायके अनुसार अर्जुनको निमित्त कर भगवान् सबको उपदेश करते हैं, कि इस जगतमें कर्म किसीसे छूट नहीं सकते, अतः कर्मोंकी बाधासे बचनेके लिये मनुष्य अपने धर्मानुसार प्राप्त कर्तव्यको फलाशा त्यागकर अर्थात् निष्काम बुद्धिसे सदा करता रहे-यही एक मार्ग (योग) मनुष्यके अधिकारमें है; और यही उत्तमभी है। प्रकृति तो अपने व्यवहार सदैवही करती रहेगी; परंतु उसमेंसे कर्तृत्वके अभिमानकी बुद्धि छोड़ देनेसे मनुष्य मुक्तही है (गीता. ३. २७; १३. २९; १४. १९; १८. १६) । मुक्तिके लिये कर्म छोड़नेकी