भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 356

संन्यास और कर्मयोग ३११ अपना समाधान कर लेना पड़ा है, कि 'कर्मयोगो विशिष्यते' - कर्मयोगकी योग्यता विशेष है - यह वचन कर्मयोगकी पोची प्रशंसा करनेके लिये यानी अर्थवादात्मक है और वास्तवमें भगवानके मतसेभी संन्यासमार्गही श्रेष्ठ है (गी. शां. भा. ५. २; ६. १, २; १८. ११) शांकरभाष्यमेंही क्यों, रामानुजभाष्यमेंभी यह श्लोक कर्मयोगकी केवल प्रशंसा करनेवाला - अर्थवादात्मकही - माना गया है (गी. रा. भा. ५. १)। रामानुजाचार्य यद्यपि अद्वैती न थे, तोभी उनके मतमें भक्तिही मुख्य साध्यवस्तु है, इसलिये कर्मयोग ज्ञानयुक्त भक्तिका साधनही हो जाता है (गीता रा. भा. ३. १)। मूल ग्रंथसे टीकाकारोंका संप्रदाय भिन्न है, परंतु टीकाकार यदि इस दृढ समझसे उस ग्रंथकी टीका करने लगे, कि हमारा मार्ग या संप्रदायही मूल ग्रंथमें वर्णित है, तो पाठकही देखें, कि उससे मूलग्रंथकी कैसी खींचातानी होती है। भगवान् श्रीकृष्ण या व्यास संस्कृत भाषामें स्पष्ट शब्दोंके द्वारा क्या यह कह नहीं सकते थे, कि "अर्जुन ! तेरा प्रश्न ठीक नहीं है?" परंतु ऐसा न करके जब कि अनेक स्थलोंपर स्पष्ट रीतिसे यही कहा है, कि "कर्मयोगही विशेष योग्यताका है"; तब कहना पड़ता है, कि सांप्रदायिक टीकाकारोंका उल्लेखित अर्थ सरल नहीं है; और पूर्वापर संदर्भ देखनेसेभी यही अनुमान दृढ़ होता है। क्योंकि गीतामेंही अनेक स्थानोंमें ऐसा वर्णन है, कि ज्ञानी पुरुष कर्मका संन्यास न कर ज्ञानप्राप्तिके अनंतरभी अनासक्त बुद्धिसे अपने सब व्यवहार किया करता है (गीता २. ६४; ३. १९; ३. २५; १८. ९) इन स्थानों- पर श्रीशंकराचार्यने अपने भाष्यमें पहले यह प्रश्न किया है, कि ज्ञानसे मोक्ष मिलता है, या ज्ञान और कर्मके समुच्चयसे ? और फिर यह गीतार्थ किया है, कि केवल ज्ञानसेही सब कर्म दग्ध होकर मोक्षप्राप्ति होती है; मोक्षप्राप्तिके लिये कर्मकी आवश्यकता नहीं है। इससे आगे यह अनुमान निकाला है, कि "जब गीताकी दृष्टिसेभी मोक्षके लिये कर्मकी आवश्यकता नहीं है, तब चित्तशुद्धि हो जानेपर सब कर्म निरर्थक हैंही; और वे स्वभावसेही बंधक अर्थात् ज्ञानविरुद्ध हैं। इसलिये ज्ञानप्राप्तिके अनंतर ज्ञानी पुरुषको कर्म छोड़ देना चाहिये" - और कहना पड़ता है कि यहो मत भगवानकोभी गीतामें ग्राह्य है। "ज्ञानके अनंतर ज्ञानी पुरुषकोभी कर्म करने चाहिये।" इस मतको 'ज्ञानकर्मसमुच्चयपक्ष' कहते हैं; और श्रीशंकराचार्यका उपर्युक्त युक्तिवादही उस पक्षके विरुद्ध मुख्य आक्षेप है। ऐसाही युक्तिवाद मध्वा- चार्यनेभी स्वीकृत किया है (गी. मभा. ३. ३१)। हमारी रायमें यह युक्तिवाद समाधानकारक अथवा निरुत्तरभी नहीं है। क्योंकि, (१) यद्यपि काम्य कर्म बंधक होकर ज्ञानके विरुद्ध हैं, तथापि यह न्याय निष्काम कर्मको लागू नहीं है। और (२) ज्ञानप्राप्तिके अनंतर मोक्षके लिये कर्म अनावश्यक भलेही हुआ करें; परंतु उससे यह सिद्ध करनेमें कोई बाधा नहीं पहुँचती, कि "अन्य सबल कारणोंसे ज्ञानी पुरुषको ज्ञानके साथही कर्म करना आवश्यक है।" मुमुक्षुका सिर्फ़ चित्त शुद्ध करनेके लियेही संसारमें कर्मका उपयोग नहीं है; और न इसीलिये कर्म उत्पन्नही हुए हैं। इसलिये