श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कहा जा सकता है, कि मोक्षके अतिरिक्त अन्य कारणोंके लिये स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले कर्मसृष्टिके समस्त व्यवहार निष्कामबुद्धिसे करतेही रहनेकी ज्ञानी पुरुष- कोभी जरूरत है। इस प्रकरणमें आगे विस्तारसहित विचार किया गया है, कि ये अन्य कारण कौन-से हैं। यहाँ इतनाही कह देते हैं, कि संन्यास लेनेके लिये प्रवृत्त अर्जुनको ये कारण बतलानेके निमित्तही गीताशास्त्रकी प्रवृत्ति हुई है; और ऐसा अनुमान नहीं किया जा सकता, कि चित्तकी शुद्धिके पश्चात् मोक्षके लिये कर्मोंकी अनावश्यकता बतलाकर गीतामें संन्यासमार्गहीका प्रतिपादन किया गया है। शांकरसंप्रदायका यह मत है सही, कि ज्ञानप्राप्तिके अनंतर संन्यासाश्रम लेकर कर्मोंको छोड़ही देना चाहिये। परंतु उसमे यह सिद्ध नहीं होता, कि गीताका तात्पर्यभी वही होना चाहिये, और न यही बात सिद्ध होती है, कि अकेले शांकरसंप्रदायको या अन्य किसी संप्रदायको 'धर्म' मानकर उसीके अनुकूल गीताका किसी प्रकार अर्थ लगा लेना चाहिये । गीताका तो यही स्थिर सिद्धान्त है, कि ज्ञानके पश्चात्भी संन्यासमार्ग ग्रहण करनेकी अपेक्षा कर्मयोगको स्वीकार करनाही उत्तम पक्ष है। फिर उसे चाहे निराला संप्रदाय कहो या और कुछ उसका नाम रखो। परंतु इस बातपरभी ध्यान देना चाहिये, कि यद्यपि गीताको कर्मयोगही श्रेष्ठ जान पड़ता है, तथापि अन्य परमत-असहिष्णु संप्रदायोंकी भांति उसका यह आग्रह नहीं, कि संन्यासमार्गको सर्वथा त्याज्य मानना चाहिये । गीतामें संन्यासमार्गके संबंधमें कहींभी अनादरभाव नहीं दिखलाया गया है। इसके विरुद्ध भगवानने स्पष्ट कहा है, कि संन्यास और कर्मयोग दोनों मार्ग एकसेही निःश्रेयस्कर-मोक्षदायक - अथवा मोक्षदृष्टिसे समान मूल्यवान् हैं। और आगे इस प्रकारकी युक्तियोंसे इन दो भिन्न भिन्न मार्गोंकी एकरूपताभी कर दिखलाई हे, कि "एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति" (गीता ५. ५) - जिसे यह मालूम हो गया, कि ये दोनों मार्ग एकही हैं - अर्थात् समान-बलवाले हैं - उसेही सच्चा तत्वज्ञान हुआ; या 'कर्मयोग'मेंभी तो फलाशाका संन्यास करनाही पड़ता है - "न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो दोगी भवति कश्चन" (गीता ६. २)। यद्यपि ज्ञानप्राप्तिके अनंतर (पहलेही नहीं) कर्मका संन्यास करना या कर्मयोग स्वीकार करना दोनों मार्ग मोक्षदृष्टिसे एक-सीही योग्यताके हैं, तथापि लोकव्यवहारकी दृष्टिसे विचारनेपर यही मार्ग सर्वश्रेष्ठ है, कि बुद्धिमें सन्यास रख कर - अर्थात् निष्काम बुद्धिसे देहेंद्रियोंकेद्वारा जीवनपर्यंत लोकसंग्रहकारक सब कार्य किये जायें। क्योंकि भगवान्का निश्चित उपदेश है, कि इस उपायसे संन्यास और कर्म, दोनों स्थिर रहते हैं। एवं तदनुसारही फिर अर्जुन युद्धके लिये प्रवृत्त हुआ है। ज्ञानी और अज्ञानीमें यही तो भेद है। केवल शारीर अर्थात् देहेंद्रियोंके कर्म देखें, तो दोनोंके एक-से होंगेही; परंतु अज्ञानी मनुष्य उन्हें आसक्त बुद्धिसे और ज्ञानी मनुष्य अनासक्त बुद्धिसे किया करता है (गीता ३. २५) । भास कविने गीताके इसी सिद्धान्तका वर्णन अपने नाटकमें इस प्रकार किया है :-