भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 358

संन्यास और कर्मयोग ३१३ प्राज्ञस्य मूर्खस्य च कार्ययोगे। समत्वमभ्येति तनुर्न बुद्धिः॥ “ज्ञानी और मूर्ख मनुष्योंके कर्म करनेमें शरीर तो एक-साही रहता है, परंतु बुद्धिमें भिन्नता रहती है” ( अविमार. ५. ५)। कुछ फुटकल संन्यासमार्गवालोंका इसपर यह और कथन है, कि “गीतामें अर्जुनको कर्म करनेका उपदेश तो दिया गया है; परंतु भगवान्ने यह उपदेश इस बातपर ध्यान दे कर किया है कि अज्ञानी अर्जुनको चित्तशुद्धिके लिये कर्म करनेकाही अधिकार था। सिद्धावस्थामें भगवान्के मतसेभी कर्मयोगही श्रेष्ठ है।” इस युक्ति- वादका सरल भावार्थ यही दीख पड़ता है, कि यदि भगवान् यह कह देते, कि “अर्जुन ! तू अज्ञानी है,” तो वह उसी प्रकार पूर्ण ज्ञानकी प्राप्तिके लिये आग्रह करता, जिस प्रकार कि कठोपनिषदमें नचिकेताने किया था; और फिर तो उसे पूर्ण ज्ञान बतलानाही पड़ता; एवं यदि वैसा पूर्ण ज्ञान उसे बतलाया जाता, तो वह युद्ध छोड़कर संन्यास ले लेता और और तब तो भगवानका भारतीय युद्धसंबंधी सारा उद्देश्यही विफल हो जाता — इसी भयसे अपने अत्यंत प्रिय भक्तको धोखा देनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णने गीताका उपदेश किया है ! इस प्रकार जो लोग सिर्फ अपने संप्रदायका समर्थन करनेके लिये, भगवान्के मतसेभी अत्यंत प्रिय भक्तको धोखा देनेका निंद्यकर्म मढ़नेके लिये प्रवृत्त हो गये, उनके साथ किसीभी प्रकारका वाद न करनाही अच्छा है। परंतु सामान्य लोग इन भ्रामक युक्तियोंमें कहीं फंस न जावें; इसलिये इतनाही कह देते हैं, कि श्रीकृष्णको अर्जुनसे स्पष्ट शब्दोंमें यह कह देनेके लिये डरनेका कोई कारण न था, “कि तू अज्ञानी है, इसलिये कर्म कर।” और इतनेपरभी यदि अर्जुन कुछ गड़बड़ करता, तो उसे अज्ञानी रखकरही उससे प्रकृतिधर्मके अनुसार युद्ध करानेकी सामर्थ्य श्रीकृष्णमें थी ही ( गीता १८. ५९, ६१)। परंतु ऐसा न कर, बार बार 'ज्ञान' और 'विज्ञान' बतलाकरही ( गीता ३. २; ९. १; १० १; १३. २; १४. १) पंद्रहवें अध्यायके अंतमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है, कि “इस शास्त्रको समझ लेनेसे मनुष्य ज्ञाता और कृतार्थ हो जाता है” ( गीता १५. २०)। इस प्रकार भगवान्ने उसे पूर्ण ज्ञानी बना कर, उसकी इच्छासेही उससे युद्ध करवाया है ( गीता १८. ६३)। इससे भगवान्का यह अभिप्राय स्पष्ट रीतिसे सिद्ध होता है, कि ज्ञाता पुरुषको, ज्ञानप्राप्तिके पश्चात्भी, निष्काम कर्म करतेही रहना चाहिये, और यही सर्वोत्तम पक्ष है। इसके अतिरिक्त, यदि एक बार मानभी लिया जाय, कि अर्जुन अज्ञानी था; तथापि उसको किये हुए उपदेशके समर्थनमें जिन जनक प्रभृति प्राचीन कर्मयोगियोंका और आगे भगवान्ने स्वयं अपनाभी उदाहरण दिया है, उन सभीको कदापि अज्ञानी नहीं कह सकते। इसीसे कहना पड़ता है, कि सांप्रदायिक आग्रहका यह कोरा युक्तिवाद सर्वथा त्याज्य और अनुचित है; तथा गीतामें ज्ञान- युक्त कर्मयोगकाही उपदेश किया गया है।