श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 359, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ें३१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अबतक यह बतलाया गया, कि ज्ञानोत्तर सिद्धावस्थाके व्यवहारके विषयमेंभी कर्मत्याग (सांख्य) और कर्मयोग (योग), ये दोनों मार्ग न केवल हमारेही देशमें, वरन् अन्य देशोंमेंभी प्राचीन समयसे प्रचलित पाये जाते हैं। अनंतर, इस विषयमें गीताशास्त्रके दो मुख्य सिद्धान्त बतलाये गये :- (१) ये दोनों मार्ग स्वतंत्र अर्थात् मोक्षकी दृष्टिसे परस्पर-निरपेक्ष और तुल्यबल हैं, एक दूसरेका अंग नहीं और (२) उनमें कर्मयोगही अधिक प्रशस्त है। और इन दोनों सिद्धान्तोंके अत्यंत स्पष्ट होते हुएभी सांप्रदायिक टीकाकारोंने इनका विपर्यास किस प्रकार और क्यों किया ? इसी बातको दिखलानेके लिये यह सारी प्रस्तावना लिखनी पड़ी। अब गीतामें दिये हुए उन कारणोंका निरूपण किया जायगा, जो प्रस्तुत प्रकरणकी इस मुख्य बातको सिद्ध करते हैं, कि सिद्धावस्थामेंभी कर्मत्यागकी अपेक्षा निष्काम बुद्धिसे आमरण कर्म करते रहनेका मार्ग अर्थात् कर्मयोगही अधिक श्रेयस्कर है। इनमेंसे कुछ बातोंका स्पष्टीकरण तो 'सुख-दुःख-विवेक' नामक प्रकरणमें पहलेही हो चुका है। परंतु वह विवेचन था सिर्फ सुख-दुःखका, इसलिये वहाँ इस विषयकी पूरी चर्चा नहीं की जा सकी। अतएव इस विषयकी चर्चाके लियेही यह स्वतंत्र प्रकरण लिखा गया है। वैदिक धर्मके दो भाग हैं: कर्मकांड और ज्ञानकांड। पिछले प्रकरणमें उनके भेद बतला दिये गये हैं। कर्मकांडमें अर्थात् ब्राह्मण आदि श्रौत ग्रंथोंमें और अंशतः उपनिषदोंमेंभी ऐसे स्पष्ट वचन हैं, कि प्रत्येक गृहस्थको फिर चाहे वह ब्राह्मण हो या क्षत्रिय - अग्निहोत्र करके यथाधिकार ज्योतिष्टोम आदिक यज्ञयाग करने चाहिये और विवाह करके वंश बढ़ानाभी हरएकका कर्तव्य है। उदाहरणार्थ, “एतद्वै जरामयं सत्रं यदग्निहोत्रम्” इस अग्निहोत्ररूपको मरणपर्यंत जारी रखना चाहिये (श. ब्रा. १२. ४. १. १); प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः।” वंशके धागेको टूटने न दो (तै. उ. १. ११. १) अथवा “ईशावास्यमिदं सर्वम्” - संसारमें जो कुछ है, उसे परमेश्वरमें अधिष्ठित करे - अर्थात् ऐसा समझे, कि मेरा कुछ नहीं, उसीका है। और इस निष्काम बुद्धिसे - कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ “कर्म करते रहकरही सौ वर्ष अर्थात् आयुष्यकी मर्यादाके अंततक जीनेकी इच्छा रखे, एवं ऐसी ईशावास्य बुद्धिसे कर्म करेगा, तो उन कर्मोंका तुझे (पुरुषको) लेप (बंधन) नहीं लगेगा, इसके अतिरिक्त (लेप अथवा बंधनसे बचनेके लिये) दूसरा मार्ग नहीं है” (ईश. १. २) परंतु जब हम, कर्मकांडसे ज्ञानकांडमें जातें हैं, तब वैदिक ग्रंथोंमेंही अनेक विरुद्धपक्षीय वचनभी मिलते हैं। जैसे “ब्रह्मविदाप्नोति परम्” (तै. २. १. १) - ब्रह्मज्ञानसे मोक्ष प्राप्त होता है। “नान्यः पंथा विद्यतेऽयनाय” (श्वे. ३. ८) - (बिना ज्ञानके) मोक्षप्राप्तिका दूसरा मार्ग नहीं है। “पूर्वे विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते। किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं लोक इति ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाय भिक्षा-