भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 360

संन्यास और कर्मयोग ३१५ चर्यं चरन्ति " ( बृ. ४. ४. २२ ; ३. ५. १ ) - प्राचीन ज्ञानी पुरुषोंको पुत्र आदिकी इच्छा न थी; और यह समझकर, कि जब समस्त लोकही हमारा आत्मा हो गया है, तब हमें ( दूसरी ) संतान किस लिये चाहिये ? - वे लोग संतति, संपत्ति और स्वर्ग आदिमेंसे किसीकीभी 'एषणा' अर्थात् चाह नहीं करते थे; किंतु उससे निवृत्त होकर वे ज्ञानी पुरुष स्वेच्छासे भिक्षाटन करते हुए घूमा करते थे; अथवा “ इस रीतिसे जो लोग विरक्त हो जाते हैं, उन्हींको मोक्ष मिलता है” ( मुं. १. २. ११ ) । या अंतमें “ यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत् ” ( जाबा. ४ ) - जिस दिन बुद्धि विरक्त हो, उसी दिन संन्यास लेलें । इस प्रकार वेदकी आज्ञा द्विविध अर्थात् दो प्रकारकी होनेसे ( मभा. शां. २४०. ६ ) प्रवृत्ति और निवृत्ति या कर्मयोग और सांख्य, इसमेंसे जो श्रेष्ठ मार्ग हो, उसका निर्णय करनेके लिये, यह देखना आवश्यक है, कि कोई दूसरा उपाय है या नहीं ? आचार अर्थात् शिष्ट लोगोंके व्यवहार या रीति-भांतिको देखकर इस प्रश्नका निर्णय हो सकता था, परंतु इस संबंधमें शिष्टाचारभी उभयविध अर्थात् दो प्रकारका है। इतिहाससे प्रकट होता है, कि शुक और याज्ञवल्क्य प्रभृतिने संन्यासमार्गका तो जनक, श्रीकृष्ण और जंगी- षव्य आदि प्रमुख ज्ञानी पुरुषोंने कर्मयोगकाही अवलंबन किया था। इसी अभिप्रायसे सिद्धान्त पक्षके युक्तिवादमें बादरायणाचार्यने कहा है, कि “ तुल्यं तु दर्शनम् ” ( वे. सू. ३. ४. ९ ) - अर्थात् आचारकी दृष्टिसे ये दोनों पंथ समान बलवान् हैं। स्मृतिवचनभी* ऐसाही है :- विवेकी सर्वदा मुक्तः कुर्वता नास्ति कर्तृता । अलेपवादमाश्रित्य श्रीकृष्णजनकौ यथा ॥ “ पूर्ण ब्रह्मज्ञानी पुरुष सब कर्म करकेभी श्रीकृष्ण और जनकके समान अकर्ता, अलिप्त एवं सर्वदा मुक्तही रहता है।” ऐसेही भगवद्गीतामेंभी मनु, इक्ष्वाकु आदिके नाम कर्मयोगकी परंपरा बतलाते हुए कहा है, कि “ एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । ” ( गीता ५. १५ ) - ऐसा जानकर प्राचीन कालमें जनक आदि ज्ञानी पुरुषोंने कर्म किया। योगवासिष्ठ और भागवतमें जनकके सिवा इसी प्रकारके दूसरे बहुत-से उदाहरण दिये गये हैं ( यो. ५. ७५; भाग. २. ८. ४३ - ४५ )। यदि किसीको शंका हो, कि जनकआदि पूर्ण ब्रह्मज्ञानी न थे; तो योग- वासिष्ठमें स्पष्ट लिखा है, कि ये सब 'जीवन्मुक्त' थे। योगवासिष्ठमेंही क्यों, महा- भारतमेंभी कथा है, कि व्यासजीने अपने पुत्र शुकको मोक्षधर्मका पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेनेके लिये अंतमें जनकके यहाँ भेजा था ( मभा. शां. ३२५, यो. २. १ )। इसी प्रकार उपनिषदोंमेंभी जान-बूझकर ये कथाएँ हैं, कि अश्वपति कैकेय राजाने

  • इसे स्मृतिवचन मानकर आनंदगिरिने कठोपनिषदके ( कठ. २. १९ ) शांकरभाष्यकी टीकामें उद्धृत किया है। नहीं मालूम, यह कहाँका वचन है।