भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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३१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उद्दालक ऋषिको (छां. ५. ११-२४) और काशिराज अजातशत्रुने गार्ग्य बालाकीको (बृ. २. १) ब्रह्मज्ञान सिखाया था। परंतु यह वर्णन कहीं नहीं मिलता, कि अश्वपति या जनकने राजपाट छोड़कर कर्मत्यागरूप संन्यास ले लिया। इसके विपरीत, जनक-सुलभा-संवादमें जनकने स्वयं अपने विषयमें कहा है, कि "हम मुक्तसंग होकर-आसक्ति छोड़कर-राज्य करते हैं और यदि हमारे एक हाथमें चंदन लगाया और दूसरेको छील डाला; तोभी उसका सुख और दुःख हमें एकसाही है।" अपनी स्थितिका इस प्रकार वर्णनकर (मभा. शां. ३२०. २६) जनकने आगे सुलभासे कहा है :- मोक्षे हि विविधा निष्ठा दृष्टाऽन्यैर्मोक्षवित्तमैः । ज्ञानं लोकोत्तरं यच्च सर्वत्यागश्च कर्मणाम् ॥ ज्ञाननिष्ठां वदन्त्येके मोक्षशास्त्रविदो जनाः । कर्मनिष्ठां तथैवान्ये यतयः सूक्ष्मदर्शिनः ॥ प्रहायोभयमप्येवं ज्ञानं कर्म च केवलम् । तृतीयेयं समाख्याता निष्ठा तेन महात्मना ॥ "मोक्षशास्त्रके ज्ञाता मोक्षप्राप्तिके लिये तीन प्रकारकी निष्ठाएँ बतलाते हैं :- (१) ज्ञान प्राप्तकर सब कर्मोंका त्याग कर देना-इसीको कुछ मोक्षशास्त्रज्ञ ज्ञाननिष्ठा कहते हैं; (२) इसी प्रकार दूसरे सूक्ष्मदर्शी लोग कर्मनिष्ठा बतलाते हैं, परंतु केवल ज्ञान और केवल कर्म-इन दोनों निष्ठाओंको छोड़कर (३) यह तीसरीही (अर्थात् ज्ञानसे आसक्तिका क्षय कर कर्म करनेकी) निष्ठा (मुझे) उस महात्माने (पंचशिख) बतलाई है" (मभा. शां. ३२०. ३८-४०)। निष्ठा शब्दका सामान्य अर्थ अंतिम स्थिति, आधार या अवस्था है। परंतु इस स्थानपर और गीतामेंभी निष्ठा शब्दका अर्थ है- "मनुष्यके जीवनका वह मार्ग, ढंग, रीति या उपाय है, जिससे आयु बितानेपर अंतमें मोक्षकी प्राप्ति होती है।" गीतापर जो शांकरभाष्य है, उसमेंभी निष्ठा = अनुष्ठेयतात्पर्यम् - अर्थात् आयुष्य या जीवनमें जो कुछ अनुष्ठेय (आचरण करने योग्य) हो, उसमें तत्परता (निमग्न रहना)-यही अर्थ किया है। आयुष्यक्रम या जीवनक्रमके इन मार्गोंमेंसे जैमिनि जैसे प्रमुख मीमांसकोंने ज्ञानको महत्त्व नहीं दिया है; किंतु यह कहा है, कि यज्ञयाग आदि कर्म करनेसेही मोक्षकी प्राप्ति होती है :- ईजाना बहुभिः यज्ञैः ब्राह्मणा वेदपारगाः । शास्त्राणि चेत्प्रमाणं स्युः प्राप्तास्ते परमां गतिम् ॥ क्योंकि, ऐसा न माननेसे शास्त्रकी अर्थात् वेदकी आज्ञा व्यर्थ हो जावेगी (जै. सू. ५. २. २९ पर शांकरभाष्य देखो) और उपनिषदकार तथा बादरायणाचार्यने, यह निश्चय कर कि यज्ञ-याग आदि सभी कर्म गौण हैं, सिद्धान्त किया है, कि मोक्षकी