भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 362

संन्यास और कर्मयोग ३१७ प्राप्ति ज्ञानमे ही होती है, ज्ञानके सिवा और किसीसेभी मोक्षका मिलना शक्य नहीं है (वे. सू. ३. ४. १, २)। परंतु जनक कहते हैं, कि इन दोनों निष्ठाओंको छोड़- कर आसक्ति-विरहित कर्म करनेकी एक तीसरीही निष्ठा पंचशिखने (स्वयं सांख्य- मार्गी हो करभी) हमें बतलाई है। “दोनों निष्ठाओंको छोड़ कर” इन शब्दोंसे प्रकट होता है, कि यह तीसरी निष्ठा, पहली दो निष्ठाओंमेंसे किसीभी निष्ठाका अंग नहीं है - प्रत्युत स्वतंत्र रीतिसे वर्णित है। वेदान्तसूत्रमेंभी (वे. सू. ३. ४. ३०-३५) जनककी इस तीसरी निष्ठाका अंतमें उल्लेख किया गया है; और भगवद्- गीतामें जनककी उसी तीसरी निष्ठाका - उसीमें भक्तिका नया योग करके - वर्णन किया गया है। परंतु गीताका तो यह सिद्धान्त है, कि मीमांसकोंका केवल कर्मयोग अर्थात् ज्ञानविरहित कर्मयोग मोक्षदायक नहीं है, वह केवल स्वर्गप्रदही है (गीता २. ४२-४४; ९. २१); इसलिये जो मार्ग मोक्षप्रद नहीं है, उसे 'निष्ठा' नामही नहीं दिया जा सकता। क्योंकि, यह व्याख्या सभीको स्वीकृत है, कि जिससे अंतमें मोक्ष मिले, उसी मार्गको 'निष्ठा' कहना चाहिये। अतएव, सब मतोंका सामान्य विवेचन करते समय, यद्यपि जनकने तीन निष्ठाएँ बतलाई हैं, तथापि मीमांसकोंका केवल (अर्थात् ज्ञानविरहित) कर्ममार्ग 'निष्ठा'मेसे पृथक् कर सिद्धान्तपक्षमे स्थिर होनेवाली दो निष्ठाएँही गीताके तीसरे अध्यायके आरंभमें कही गई है (गीता ३. ३)। केवल ज्ञान (सांख्य) और ज्ञानयुक्त निष्काम कर्म (योग), येही वे दो निष्ठाएं हैं। और सिद्धान्तपक्षीय इन दोनों निष्ठाओंमेंसे दूसरी (अर्थात् जनकके कथनानुसार तीसरी) निष्ठाके समर्थनार्थ यह प्राचीन उदाहरण दिया गया है, कि “कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः” (गीता ३. २०) - जनक प्रभृतिने इस प्रकार “कर्म करकेही सिद्धि पाई है।” जनक आदिक क्षत्रिय राजाओंकी बात छोड़ दें; तोभी यह सर्वश्रुत हैही, कि व्यासने विचित्रवीर्यके वंशकी रक्षाके लिये धृतराष्ट्र और पांडु, ये दो क्षेत्रज पुत्र निर्माण किये थे और तीन वर्ष तक निरंतर परि- श्रम करके संसारके उद्धारके निमित्त उन्होंने महाभारतभी लिखा है। एवं कलियुगमें स्मार्त अर्थात् संन्यासमार्गके प्रवर्तक श्रीशंकराचार्यनेभी अपने अलौकिक ज्ञान तथा उद्योगसे धर्म-संस्थापना का कार्य किया था। कहाँ तक कहें? जबसे स्वयं ब्रह्मदेव कर्म करनेके लिये प्रवृत्त हुए, तभीसे सृष्टिका आरंभ हुआ है। मूलतः ब्रह्मदेवसेही मरीचि प्रभृति सात मानसपुत्रोंने उत्पन्न होकर, संन्यास न ले, सृष्टिक्रमको जारी रखनेके लिये मरणपर्यंत प्रवृत्तिमार्गकाही अंगीकार किया; और सनत्कुमार प्रभृति दूसरे सात मानसपुत्र जन्मसेही विरक्त अर्थात् निवृत्ति-पंथी हुए - पहले कह चुके हैं कि, इस कथाका उल्लेख महाभारतमें वर्णित नारायणीय धर्मनिरूपणमें है (मभा. शां. ३३९, ३४०)। ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंने या ब्रह्मदेवनेभी, कर्म करते रहनेके इस प्रवृत्तिमार्गका क्यों अंगीकार किया? - इसकी उपपत्ति वेदान्तसूत्रमें इस प्रकार दी है: “यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिणाम्” (वे. सू. ३. ३. ३२) -