श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र जिसका जो ईश्वरनिर्मित अधिकार है, उसके पूरे होनेतक कार्योंसे छुट्टी नहीं मिलती। इस उपपत्तिकी जाँच आगे की जावेगी। उपपत्ति कुछभी क्यों न हो, पर यह बात निर्विवाद है, कि प्रवृत्ति और निवृत्ति, ये दोनों पंथ ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंमें संसारके आरंभसे प्रचलित हैं। इससे यहभी प्रकट है, कि उनमेंसे किसीकी श्रेष्ठताका निर्माण सिर्फ आचारकीही ओर ध्यान देकर नहीं किया जा सकता। इस प्रकार, पूर्वाचार द्विविध होनेके कारण, केवल आचारसेही यद्यपि यह निर्णय नहीं हो सकता, कि निवृत्ति श्रेष्ठ है या प्रवृत्ति, तथापि संन्यासमार्गके लोगोंका यह दूसरा युक्तिवाद है, कि यदि यह निर्विवाद है, कि विना कर्मबंधसे छूटे मोक्ष नहीं होता, तो ज्ञानप्राप्ति हो जानेपर तृष्णामूलक कर्मोंका झगड़ा, जितनी जल्दी हो सके, तोडनेमेंही श्रेय है। महाभारतके शुकानुशासनमें - इसीको 'शुकानुप्रश्न'भी कहते हैं, - संन्यासमार्गकाही प्रतिपादन है। वहाँ शुकने व्यासजीसे पूछा है :- यदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च । कां दिशं विद्यया यान्ति कां च गच्छन्ति कर्मणा ॥ “ वेद, कर्म करनेके लियेभी कहता है और छोडनेके लियेभी; तो अब मुझे बतला- इये, कि विद्यासे अर्थात् कर्मरहित ज्ञानसे और केवल कर्मसे कौन-सी गति मिलती है?” (मभा. शां. २४०. १) इसके उत्तरमें व्यासजीने कहा है :- कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते । तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः ॥ “ कर्मसे प्राणी बंधा जाता है; और विद्यासे मुक्त हो जाता है। इसीसे पारदर्शी यति अथवा संन्यासी कर्म नहीं करते” (मभा. शां. २४०. ७)। इस श्लोकके पहले चरणका विवेचन हम पिछले प्रकरणमें कर चुके हैं। “कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते” इस सिद्धान्तपर कुछ वाद नहीं है। परंतु स्मरण रहे, कि वहाँ यह दिखलाया है, कि 'कर्मणा बध्यते' का विचार करनेसे सिद्ध होता है, कि जड़ अथवा अचेतन कर्म किसीको न तो बाँध सकता है और न छोड़ सकता है; मनुष्य फलाशासे अथवा अपनी आसक्तिसे कर्मोंमें बँध जाता है। इस आसक्तिसे अलग होकर वह यदि केवल बाह्य इंद्रियोंसे कर्म करे, तबभी वह मुक्तही है। रामचंद्रजी, इसी अर्थको मनमें लाकर, अध्यात्म रामायणमें (अ. रा. २. ४. ४२) में लक्ष्मणसे कहते हैं, कि :- प्रवाहपतितः कार्यं कुर्वन्नपि न लिप्यते । बाह्ये सर्वत्र कर्तृत्वमावहन्नपि राघव ॥ “ कर्ममय संसारके प्रवाहमें पड़ा हुआ मनुष्य बाहरी सब प्रकारके कर्तव्य-कर्म करकेभी अलिप्त रहता है।” अध्यात्मशास्त्रके इस सिद्धान्तपर ध्यान देनेसे दीख पड़ता है, कि कर्मोंको दुःखमय मानकर उनके त्यागनेकी आवश्यकताही नहीं