भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 364

संन्यास और कर्मयोग ३१९ रहती; केवल मनको शुद्ध और सम करके फलाशा छोड़ देनेसेही सब काम हो जाते हैं। तात्पर्य यह, कि यद्यपि ज्ञान और काम्यकर्मका विरोध हो, तथापि निष्काम कर्म और ज्ञानके बीच कोईभी विरोध हो नहीं सकता। इसीमे अनुगीतामें 'तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति' - अतएव कर्म नही करते - इस वाक्यके बदले - तस्मात्कर्मसु निःस्नेहा ये केचित्पारदर्शिनः । "इससे पारदर्शी कर्ममें आसक्ति नहीं रखते" (अश्व. ५१. ३३), यह वाक्य आया है। इससे पहले, कर्मयोगका स्पष्ट प्रतिपादन इस प्रकार किया गया है, कि :- कुर्वते ये तु कर्माणि श्रद्दधाना विपश्चितः । अनाशीर्योगसंयुक्तास्ते धीराः साधुदर्शिनः ॥ "जो ज्ञानी पुरुष श्रद्धासे फलाशा न रखकर (कर्म-) योग-मार्गका अवलंब करके कर्म करते हैं, वेही साधुदर्शी हैं" (अश्व. ५०. ६, ७) । इसी प्रकार :- यदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च । इस पूर्वार्धमें जुड़ा हुआही, वनपर्वमें, युधिष्ठिरको शौनकका, यह उपदेश है, कि :- तस्माद्धर्म्मानिमान् सर्वान्नाभिमानात् समाचरेत् । "वेदमें कर्म करने और छोड़नेकीभी आज्ञा है; इसलिये (कर्तृत्वका) अभिमान छोड़कर हमें अपने सब कर्म करने चाहिये" (वन. २. ७३) । शुकानुप्रश्नमेंभी व्यासजीने शुकसे दो बार स्पष्ट कहा है कि :- एषा पूर्वतरा वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते । ज्ञानवानेव कर्माणि कुर्वन् सर्वत्र सिध्यति ॥ "ब्राह्मणकी पूर्वकी, पुरानी (पूर्वतर) वृत्ति यही है, कि ज्ञानवान होकर, सब काम करकेही सिद्धि प्राप्त करे" (मभा. शां. २३७. १; २३४. २९)। यहीभी प्रकट है, कि यहाँ 'ज्ञानवानेव' पदसे ज्ञानोत्तर और ज्ञानयुक्त कर्मही विवक्षित है। अब यदि दोनों पक्षोंके उक्त सब वचनोंका निराग्रह बुद्धिसे विचार किया जाय, तो मालूम होगा, कि "कर्मणा बध्यते जन्तुः" इस युक्तिवादसे कर्मत्यागविषयक यह सिर्फ एकही अनुमान निष्पन्न नही होता, कि 'तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति' - इससे काम नहीं करते - किंतु उसी युक्तिवादसे यह निष्काम कर्मयोगविषयक दूसरा अनुमानभी उतनीही योग्यताका सिद्ध होता है, कि "तस्मात्कर्मसु निःस्नेहाः" - इससे कर्ममें आसक्ति नहीं रखते। सिर्फ हमही इस प्रकारके दो अनुमान नहीं करते; बल्कि व्यासजीनेभी यही अर्थ शुकानुप्रश्नके निम्न श्लोकमें स्पष्टतया बतलाया है :- द्वाविमावथ पंथानौ यस्मिन् वेदाः प्रतिष्ठिताः । प्रवृत्तिलक्षणो धर्मः निवृत्तिक्ष विभाषितः ॥*

  • इस अंतिम चरणके "निवृत्तिश्च सुभाषितः" और "निवृत्तिश्च विभा- वितः" ऐसे पाठभेदभी हैं। पाठभेद कुछभी हो; पर प्रथम 'द्वाविमौ' यह अवश्य है; जिससे इतना तो निर्विवाद सिद्ध होता है, कि दोनो पंथ स्वतंत्र हैं !
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक) · पृष्ठ 364, कुल 956 में से · BharatKosha