श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र “ इन दोनों मार्गोंको वेदोंका (एक-सा) आधार है-एक मार्ग प्रवृत्तिविषयक धर्मका और दूसरा निवृत्ति अर्थात् संन्यास लेनेका है” (महा. शां. २४०. ६) । वह पहलेही लिख चुके हैं, कि इसी प्रकार नारायणीय धर्ममेंभी इन दोनों पंथोंका पृथक् पृथक् स्वतंत्र रीतिसे, एवं सृष्टिके आरंभमें प्रचलित होनेका वर्णन किया गया है। परंतु स्मरण रहे, कि महाभारतमें प्रसंगानुसार इन दोनों पंथोंका वर्णन पाया जाता है, इसलिये प्रवृत्तिमार्गके साथही निवृत्तिमार्गके समर्थक वचनभी उसी महा- भारतमें पाये जाते हैं। गीताकी संन्यासमार्गीय टीकाओंमें निवृत्तिमार्गके इन वचनों- कोही मुख्य समझ कर, ऐसा प्रतिपादन करनेका प्रयत्न किया गया है, मानों इसके सिवा और दूसरा पंथही नहीं है; और यदि होभी, तो वह गौण है अर्थात् संन्यास मार्गका केवल अंग है। परंतु यह प्रतिपादन साम्प्रदायिक आग्रहका है; और इसीसे गीताका अर्थ सरल एवं स्पष्ट रहनेपरभी, आजकल बहुतोंको दुर्बोध हो गया है। वह गीताके “लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा” (गीता ३. ३) इस श्लोककी बराबरी- काही “द्वाविमावथ पंथानो” यह श्लोक है; इससे प्रकट होता है, कि इस स्थानपर दो समान-बलवाले मार्ग बतलानेका हेतु है। परंतु इस स्पष्ट अर्थकी ओर अथवा पूर्वापर संदर्भकी ओर ध्यान न देकर, कुछ लोग इसी श्लोकमें, यह दिखलानेका यत्न किया करते हैं, कि दोनों मार्गोंके बदले एकही मार्ग प्रतिपाद्य है। इस प्रकार यह सिद्ध हो गया, कि कर्मसंन्यास (सांख्य) और निष्काम कर्म (योग), दोनों वैदिक धर्मके स्वतंत्र मार्ग हैं और उनके विषयमें गीताका यह निश्चित सिद्धान्त है, कि वे वैकल्पिक नहीं हैं, किंतु “संन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगकी योग्यता विशेष है।” अब कर्मयोगकी श्रेष्ठताके संबंधमें गीतामें आगे कहा है, कि जिस संसारमें हम रहते हैं, वह संसार और उसमें हमारा क्षणभर जीवित रहनाभी जब कर्म ही है; तब कर्म छोड़कर जावें कहां? और यदि इस संसारमें अर्थात् कर्मभूमिमेंही रहना हो, तो कर्म छूटेंगेही कैसे ? हम यह प्रत्यक्ष देखते हैं, कि जब- तक देह है, तबतक भूख और प्यास जैसे विकार नहीं छूटते हैं (गीता ५. ८, ९) और उनके निवारणार्थ भिक्षा मांगने जैसा लज्जित कर्म करनेके लियेभी संन्यासमार्गके अनुसार यदि स्वतंत्रता है तो अनासक्तबुद्धि से अन्य व्यावहारिक शास्त्रोक्त कर्म करनेके लिये ही प्रत्यवाय कौन-सा है? यदि कोई इस डरसे अन्य कर्मोंका त्याग करता हो, कि कर्म करनेसे कर्मपाशमें फंसकर ब्रह्मानन्दसे वंचित रहूँगा; अथवा ब्रह्मा- त्मैक्य रूप अद्वैतबुद्धि विचलित हो जायगी; तो कहना चाहिये, कि अबतक उनका मनोनिग्रह कच्चा है और मनोनिग्रहके कच्चे रहते हुए किया हुआ कर्मत्याग, गीताके अनुसार, मोहका अर्थात् तामस् अथवा मिथ्याचरण है (गीता १८. ७; ३. ६)। ऐसी अवस्थामें यह अर्थ आप-ही-आप प्रकट होता है, कि ऐसे कच्चे मनोनिग्रहको चित्त- शुद्धिके द्वारा पूर्ण करनेके लिये निष्कामबुद्धि बढ़ानेवाले यज्ञ, दान प्रभृति गृहस्था- श्रमके श्रौत या स्मार्त कर्मही इस मनुष्यको करने चाहिये । सारांश, ऐसा कर्मत्याग