भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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कर्म श्रेष्ठ है (गीता ३. ८)। "इसलिये तू कर्मही कर" (गीता ४. १५) अथवा "योगमातिष्ठोत्तिष्ठ" (गीता ४. ४२) - कर्मयोगका अंगीकार कर युद्धके लिये खड़ा हो। (योगी) "ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः" - ज्ञानमार्गवाले (संन्यासी) की अपेक्षा कर्मयोगीकी योग्यता अधिक है। "तस्माद्योगी भवार्जुन" (गीता ६. ४६)। - इसलिये, हे अर्जुन ! तू (कर्म-) योगी हो। अथवा "मामनु- स्मर युध्य च" (गीता ८. ७) - मनमें मेरा स्मरण रखकर युद्ध कर; इत्यादि अनेक वचनोंसे गीतामें अर्जुनको स्थान स्थानपर जो उपदेश दिया गया है, उसमेंभी संन्यास या अकर्मकी अपेक्षा कर्मयोगकी अधिक योग्यता दिखलानेके लिये 'ज्याय:', 'अधिक:' और 'विशिष्यते' इत्यादि पद स्पष्ट हैं। अठारहवें अध्यायके उपसंहारमेंभी भगवानने फिर कहा है, कि "नियत कर्मोंका संन्यास करना उचित नहीं है। आसक्ति- विरहित सब काम सदा करने चाहिये - यही मेरा निश्चित और उत्तम मत है" (गीता १८. ६, ७)। इससे निर्विवाद सिद्ध होता है, कि गीतामें संन्यासमार्गकी अपेक्षा कर्मयोगकोही श्रेष्ठता दी गई है। परंतु, जिनका सांप्रदायिक मत है, कि संन्यास या भक्तिही अंतिम और श्रेष्ठ कर्तव्य है; कर्म तो केवल चित्तशुद्धिका साधन है; वह मुख्य साध्य या कर्तव्य नहीं हो सकता, उन्हें गीताका यह सिद्धान्त कैसे पसंद होगा ? यह नहीं कहा जा सकता, कि उनके ध्यानमें यह बात आईही न होगी, कि गीतामें संन्यासमार्गकी अपेक्षा कर्मयोगको स्पष्ट रीतिसे अधिक महत्त्व दिया गया है; परंतु यदि यह बात मान ली जाती, तो यह प्रकटही है, कि उनके संप्रदायको योग्यता कम हो जाती। इसीसे पाँचवे अध्यायके आरंभमें अर्जुनके प्रश्न और भगवानके उत्तर दोनों सरल, सयुक्तिक और स्पष्टार्थक रहनेपरभी, सांप्रदायिक टीकाकार इस चक्करमें पड़ गये हैं, कि उनका अर्थ कैसे और क्या किया जाय ? पहली अडचन यह थी, कि 'संन्यास और कर्मयोग इन दोनों मार्गोंमें श्रेष्ठ कौन है ?" यह प्रश्नही दोनों मार्गोंको स्वतंत्र माने बिना उपस्थित हो नहीं सकता। क्योंकि इन टीकाकारोंके कथनानुसार कर्मयोग यदि ज्ञानका सिर्फ़ पूर्वांग हो, तो यह बात स्वयंसिद्ध है, कि पूर्वांग गौण है; और ज्ञान अथवा संन्यासही श्रेष्ठ है और फिर प्रश्न करनेके लिये गुंजाइशही कहाँ रही ? अच्छा; यदि प्रश्नको उचित मान लें, तो यह स्वीकार करना पड़ता है, कि ये दोनों मार्ग स्वतंत्र हैं। और तब तो यह स्वीकृति इस कथनका विरोध करेगी, कि केवल हमारा संप्रदायही मोक्षका मार्ग है। इस अडचनको दूर करनेके लिये इन टीकाकारोंने पहले तो यह तुर्रा दिया है, कि अर्जुनका प्रश्नही ठीक नहीं है; और फिर यह दिखलानेका प्रयत्न किया है, कि भगवानके उत्तरका तात्पर्यभी वैसाही है। परंतु इतना गोलमाल करनेपरभी भगवानके इस स्पष्ट उत्तर - "कर्मयोगकी योग्यता अथवा श्रेष्ठता विशेष है" (गीता ५.२) का अर्थ ठीक ठीक फिरभी लगाही नहीं ! तब अंतमें पूर्वापार-संदर्भके विरुद्ध, अपने मनका दूसरा यह तुर्रा लगा कर इन टीकाकारोंने ज्यों त्यों कर