भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 956 में से

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संन्यास और कर्मयोग ३०९ किया; और हिरण्यगर्भसे तथा अन्य देवताओंसे कहा, कि इसे निरंतर जारी रखो (मभा. शां. ३४०. ४४-७५; ३३९. ६६, ६७ देखो) ; इससे निर्विवाद सिद्ध होता है, कि सांख्य और योग ये दोनों मार्ग आरंभसेही स्वतंत्र हैं। इससे यहभी दीख पड़ता है कि गीताके सांप्रदायिक टीकाकारोंने कर्मयोग-मार्गको गौणत्व देनेका जो प्रयत्न किया है, वह केवल सांप्रदायिक आग्रहका परिणाम है। और इन टीकाओंमें स्थान स्थान पर यह जो तुर्रा लगा रहता है, कि कर्मयोग, ज्ञानप्राप्ति अथवा संन्यासका केवल साधनमात्र है, वह इनकी मनगढ़ंत है। वास्तवमें गीताका सच्चा भावार्थ वैसा नहीं है। गीतापर जो संन्यासमार्गीय टीकाएँ हैं, उनमें हमारे मतसे यही मुख्य दोष है। और टीकाकारोंके इस सांप्रदायिक आग्रहसे छूटे बिना गीताके वास्तविक रहस्यका बोध हो जाना कभी संभव नहीं है। यदि यह निश्चय करें, कि कर्मसंन्यास और कर्मयोग, दोनों स्वतंत्र रीतिसे मोक्षदायक हैं - एक दूसरेका पूर्वांग नहीं - तोभी पूरा निर्वाह नहीं होता। क्योंकि, यदि दोनों मार्ग एकहीसे मोक्षदायक हैं, तो कहना पड़ेगा, कि इनमेंसे जो मार्ग हमें पसंद होगा, उसे हम स्वीकार करें। और फिर यह सिद्ध न हो कर - कि अर्जुनको युद्धही करना चाहिये, - ये दोनों पक्ष संभव होते हैं, कि भगवान्‌के उपदेशसे परमे- श्वरका ज्ञान होनेपरभी, चाहे वह अपनी रुचिके अनुसार युद्ध करे अथवा लड़ना- मरना छोड़कर संन्यास ग्रहणकर ले। इसीलिये अर्जुनने स्वाभाविक रीतिमे यह सरल प्रश्न किया है, कि "इन दोनों मार्गोंमेंसे जो अधिक प्रशस्त हो, वह एकही मार्ग निश्चय करके मुझे बतलाओ", (गीता ५. १) जिससे उसके अनुसार आचरण करनेमे कोई गड़बड़ न हो। गीताके पाँचवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनके इस प्रकार प्रश्नकर चुकनेपर अगले श्लोकमेंही भगवान्‌ने उसका स्पष्ट उत्तर दिया है, कि "संन्यास और कर्मयोग ये दोनों मार्ग निःश्रेयस्कर अर्थात् मोक्षदायक हैं; अथवा मोक्षदृष्टिसे एकसी योग्यताके हैं; तोभी इन दोनोंमें कर्मयोगकी श्रेष्ठता या योग्यता विशेष है ( विशिष्यते )" (गीता. ५. २); और यही श्लोक हमने इस प्रकरणके आरंभमें लिखा है। कर्मयोगकी श्रेष्ठताके संबंधमें गीतामें यह एकही वचन नहीं है, किंतु ऐसे अनेक वचन हैं, जैसे - "तस्माद्योगाय युज्यस्व" (गीता. २. ५०) - इसलिये तू कर्मयोगकाही स्वीकार कर। "मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि" (गीता २. ४७) कर्म न करनेका आग्रह मत कर। यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ कर्मोंको छोड़नेके झगड़ेमें न पड़कर "इंद्रियोंको मनमे रोककर अनासक्त बुद्धिके द्वारा कर्मेंद्रियोंसे कर्म करनेवालेकी योग्यता 'विशिष्यते' अर्थात् विशेष है" (गीता ३. ७) । क्योंकि, कभी क्यों न हो, "कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः" अकर्मकी - अपेक्षा

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