भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 353

३०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्म करनेसेही मोक्ष मिलता है। परंतु मीमांसकोंका यह पक्ष गीताको मान्य नहीं है (गीता २. ४२)। (२) दूसरा अर्थ यह है, कि चित्तशुद्धिके लिये कर्म करनेकी (कर्मयोग) आवश्यकता है, इसलिये केवल चित्तशुद्धिके निमित्तही कर्म करना। इस अर्थके अनुसार कर्मयोग संन्यासमार्गका पूर्वांग हो जाता है; परंतु यह गीतामें वर्णित कर्मयोग नहीं है। (३) जो जानता है, कि अपने आत्माका कल्याण किसमें है, वह ज्ञानी पुरुष स्वधर्मोक्त युद्धादि सांसारिक कर्म मृत्युपर्यंत करे या न करे? यही गीताका मुख्य प्रश्न है और उसका उत्तर यही है, कि ज्ञानी पुरुषकोभी चातुर्वर्ण्यमें सब कर्म निष्काम बुद्धिसे करनेही चाहिये (गीता ३. २५)। यही 'कर्मयोग' शब्दका तीसरा अर्थ है; और गीतामें यही कर्मयोग प्रतिपादित किया गया है। यह कर्मयोग संन्यासमार्गका पूर्वांग कदापि नहीं हो सकता, क्योंकि इस मार्गमें कर्म कभी छूटते ही नहीं। अब प्रश्न है केवल मोक्ष-प्राप्तिके विषयका। इसपर गीतामें स्पष्ट कहा है, कि ज्ञानप्राप्तिके हो जानेसे निष्काम कर्म बंधक नहीं हो सकते; प्रत्युत संन्याससे जो मोक्ष प्राप्त करना है वही इस कर्मयोगसेभी प्राप्त होता है (गीता ५. ५)। इसलिये गीताका कर्मयोग संन्यासमार्गका पूर्वांग नहीं है, किंतु ज्ञानोत्तर ये दोनों मार्ग मोक्षदृष्टिसे स्वतंत्र अर्थात् तुल्यबल हैं (गीता ५. २) – गीताके “लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा” (गीता ३. ३) वाक्यका यही अर्थ करना चाहिये और इसी हेतु भगवान्ने अगले चरणमें – "ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेण योगिनाम्" – इस प्रकार, इन दोनों मार्गोंका पृथक् पृथक् स्पष्टीकरण किया है और आगे चलकर तेरहवें अध्यायके : “अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेण चापरे ” (गीता १३. २४) इस श्लोकके – 'अन्ये' (एक) और 'अपरे' (दूसरे) – ये पद उक्त दोनों मार्गोंको स्वतंत्र माने बिना अन्वर्थक नहीं हो सकते। इसके सिवा जिस नारायणीय धर्मका प्रवृत्तिमार्ग (योग) गीतामें प्रतिपादित है, महाभारतमें उसका इतिहास देखनेसे यही सिद्धान्त दृढ़ होता है। सृष्टीके आरंभमें भगवान्ने हिरण्य- गर्भ अर्थात् ब्रह्माको सृष्टि-रचनेकी आज्ञा दी, तब इनसे मरीचि आदि सात मानस- पुत्र हुए। सृष्टिधर्मको अच्छे प्रकार, आरंभके लिये उन्होंने योग अर्थात् कर्म- मय प्रवृत्तिमार्गका अवलंबन किया। ब्रह्माके सनत्कुमार और कपिल प्रभृति दूसरे सात मानसपुत्रोंने उत्पन्न होतेही निवृत्तिमार्ग अर्थात् सांख्यका अवलंबन किया – इस प्रकार इन दोनों मार्गोंकी उत्पत्ति बतलाकर आगे स्पष्ट कहा है, कि ये दोनों मार्ग मोक्षदृष्टिसे तुल्यबल अर्थात् वासुदेवस्वरूपी एकही परमेश्वरकी प्राप्ति करा देनेवाले, भिन्न भिन्न और स्वतंत्र हैं (महा. शा. ३४८. ३८; ३४९. ६३-७३)। इसी प्रकार यहभी भेद किया गया है कि योग अर्थात् प्रवृत्तिमार्गके प्रवर्तक हिरण्यगर्भ हैं, और सांख्यमार्गके मूल प्रवर्तक कपिल हैं; परंतु यह कहीं नहीं कहा है, कि आगे हिरण्यगर्भने कर्मोंका त्यागकर दिया। इसके विपरीत ऐसा वर्णन है, कि भगवान्ने सृष्टिके व्यवहार अच्छी तरहसे चलते रहनेके लिये कर्मरूपी यज्ञचक्रको उत्पन्न