श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 352, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंन्यास और कर्मयोग ३०७ पहनना अथवा बस्तीसे बाहर विरक्त हो कर रहनाही कभी कभी विशेष मुभीतेका होता है। क्योंकि फिर कुटुंबके भरण-पोषणकी झंझट अपने पीछे न रहनेके कारण, अपना सारा समय और परिश्रम लोक-कार्योंमें लगा देनेके लिये कुछभी अड़चन नहीं रहती। ऐसे पुरुष भेषसे संन्यासी हों, तो भी वे तत्त्वदृष्टिसे कर्मयोगीही हैं। परंतु विपरीत पक्षमें – अर्थात् जो लोग इस संसारके समस्त व्यवहारोंको निस्सार समझ उनका त्याग करके चुपचाप बैठे रहते हैं – उन्हींको संन्यासी कहना चाहिये, फिर चाहे उन्होंने प्रत्यक्ष चौथा आश्रम ग्रहण किया हो या न किया हो। सारांश, गीताका कटाक्ष भगवे अथवा सफ़ेद कपड़ोंपर अथवा विवाह या ब्रह्मचर्यपर नहीं है; प्रत्युत इसी एक बातपर नज़र रखकर गीतामें संन्यास और कर्मयोग, इन दोनों मार्गोंका त्रिभेद किया गया है, कि ज्ञानी पुरुष जगत्के व्यवहार करता है या नहीं ? शेष बातें गीताधर्ममें तो महत्त्वकी नहीं हैं। संन्यास या चतुर्थाश्रम शब्दोंकी अपेक्षा कर्मसंन्यास अथवा कर्मत्याग, ये शब्द यहाँ अधिक अन्वर्थक और निःसंदिग्ध हैं। परंतु इन दोनोंकी अपेक्षा केवल संन्यास शब्दके व्यवहारकीही अधिक रीतिके कारण उसके पारिभाषिक अर्थका यहाँ विवरण किया गया है। जिन्हें इस संसारके व्यवहार निःसार प्रतीत होते हैं, वे उससे निवृत्त हो अरण्यमें जाकर स्मृतिधर्मा- नुसार चतुर्थाश्रममें प्रवेश करते हैं, इससे कर्मत्यागके इस मार्गको संन्यास कहते हैं। परंतु इसमें प्रधान भाग कर्मत्यागही है, गेरुए कपड़े नहीं। यद्यपि इस प्रकार इन दोनों पक्षोंका प्रचार है, कि पूर्ण ज्ञान होनेपर आगे कर्म करें ( कर्मयोग ) या कर्म छोड़ दें, ( कर्मसंन्यास ), तथापि गीताके सांप्रदायिक टीकाकारोंने अब यहाँ यह प्रश्न छेड़ा है, कि क्या अंतमें मोक्षप्राप्ति करा देनेके लिये दोनों मार्ग स्वतंत्र अर्थात् एक-से समर्थ हैं? अथवा कर्मयोग केवल पूर्वांग यानी पहली सीढ़ी है; और अंतमें मोक्षकी प्राप्तिके लिये कर्म छोड़ कर संन्यासही लेना चाहिये ? गीताके दूसरे और तीसरे अध्यायोंमें जो वर्णन है, उससे जान पड़ता है, कि ये दोनों मार्ग स्वतंत्र हैं। परंतु जिन टीकाकारोंका यह मत है, कि संन्यास आश्रमको अंगीकार कर समस्त सांसारिक कर्मोंको छोड़े बिना कभीभी मोक्ष नहीं मिल कि सकता – और जो लोग इसी बुद्धिसे गीताकी टीका करनेमें प्रवृत्त हुए हैं, यही मत गीतामें प्रतिपादित किया गया है – वे गीताका यह तात्पर्य निकालते हैं, कि “कर्मयोग स्वतंत्र रीतिसे मोक्षप्राप्तिका मार्ग नहीं है, पहले चित्तकी शुद्धिके लिये कर्मकर अंतमें संन्यासही लेना चाहिये; संन्यासही अंतिम अर्थात् मुख्य निष्ठा है।” परंतु इस अर्थको स्वीकारकर लेनेसे भगवानने जो यह कहा है, कि “सांख्य ( संन्यास ) और योग ( कर्मयोग ) ये द्विविध अर्थात् दो प्रकार की निष्ठाएँ इस संसारमें हैं” ( गीता ३. ३.), उस द्विविध पदका स्वारस्य सर्वथा नष्ट हो जाता है। 'कर्मयोग' शब्दके तीन अर्थ हो सकते हैं – (१) पहला अर्थ यह है, कि ज्ञान हो या न हो; चातुर्वर्ण्यके यज्ञयाग आदि कर्म अथवा श्रुति-स्मृति-वर्णित